योगसूत्र महर्षि पतंजलि की वह रचना है, जिसमें योग का पूरा मार्ग अत्यंत संक्षिप्त सूत्रों में समाया है। यह ग्रंथ चार पादों में बँटा है और हर पाद योग-यात्रा का एक अलग चरण समझाता है। समाधि पाद योग का स्वरूप बताता है, साधन पाद साधना का मार्ग दिखाता है और विभूति पाद धारणा, ध्यान, समाधि तथा संयम की शक्तियों का वर्णन करता है।
चौथा और अंतिम पाद कैवल्य पाद है, जिसमें 34 सूत्र हैं। इसमें पतंजलि कर्म, वासना और संस्कारों की निरंतरता समझाते हैं। वे वस्तु और चित्त के संबंध तथा पुरुष और चित्त के भेद पर विचार करते हैं और विवेकख्याति की भूमिका बताते हैं। अंतिम सूत्र में वे कैवल्य को गुणों के प्रतिप्रसव और चितिशक्ति के अपने स्वरूप में स्थित होने के रूप में परिभाषित करते हैं।
इस लेख में कैवल्य पाद के सभी 34 सूत्र शुद्ध संस्कृत में, सरल हिंदी अर्थ और भावार्थ सहित दिए गए हैं।
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| शांत जल में स्थिर प्रतिबिंब की तरह चेतना अपने स्वरूप में स्थित होती है। |
विषय सूची
सिद्धियाँ और निर्मित चित्त (सूत्र 4.1 से 4.6)
- 4.1 सिद्धियों के पाँच स्रोत
- 4.2 जात्यंतर परिणाम
- 4.3 निमित्त की भूमिका
- 4.4 निर्माणचित्त
- 4.5 प्रेरक चित्त
- 4.6 ध्यानजन्य चित्त
कर्म, वासना और संस्कार (सूत्र 4.7 से 4.11)
- 4.7 कर्म के प्रकार
- 4.8 कर्मफल के अनुरूप वासनाएँ
- 4.9 स्मृति और संस्कार की निरंतरता
- 4.10 वासनाओं की अनादिता
- 4.11 वासनाओं के आधार
वस्तु, काल और चित्त का संबंध (सूत्र 4.12 से 4.17)
- 4.12 अतीत और अनागत
- 4.13 धर्मों का स्वरूप
- 4.14 वस्तु की एकता
- 4.15 वस्तु एक, चित्त अनेक
- 4.16 वस्तु और चित्त
- 4.17 ज्ञात और अज्ञात वस्तु
चित्त, पुरुष और ज्ञान (सूत्र 4.18 से 4.24)
- 4.18 चित्तवृत्तियों का ज्ञाता
- 4.19 चित्त दृश्य है
- 4.20 एक साथ दोनों का ग्रहण नहीं
- 4.21 अनवस्था का तर्क
- 4.22 चेतना और बुद्धि का बोध
- 4.23 सर्वार्थ चित्त
- 4.24 परार्थ चित्त
विवेक और कैवल्य (सूत्र 4.25 से 4.34)
- 4.25 विशेषदर्शी की स्थिति
- 4.26 कैवल्य की ओर झुका चित्त
- 4.27 बीच के अंतराल
- 4.28 संस्कारों का हान
- 4.29 धर्ममेघ समाधि
- 4.30 क्लेश-कर्म की निवृत्ति
- 4.31 ज्ञान की अनंतता
- 4.32 गुणों के क्रम की समाप्ति
- 4.33 क्रम का स्वरूप
- 4.34 कैवल्य
सार और प्रश्न
सिद्धियाँ और निर्मित चित्त (सूत्र 4.1 से 4.6)
सूत्र 4.1 – सिद्धियों के पाँच स्रोत
जन्मौषधिमन्त्रतपःसमाधिजाः सिद्धयः ॥१॥
अर्थ: सिद्धियाँ जन्म, औषधि, मंत्र, तप और समाधि से उत्पन्न होती हैं।
भावार्थ: यहाँ पतंजलि सिद्धियों के पाँच संभावित स्रोत गिनाते हैं। कुछ विशेष क्षमताएँ पूर्वजन्म के संस्कारों के कारण जन्म के साथ दिखाई देती हैं। कुछ का संबंध औषधि से बताया गया है, कुछ मंत्र-साधना से और कुछ कठोर तप से। पाँचवाँ स्रोत समाधि है, जो योग का अपना मार्ग है। इस पाद में आगे चित्त, कर्म और कैवल्य की चर्चा होनी है, इसलिए यह सूत्र भूमिका का काम करता है। सिद्धियों का विस्तृत वर्णन विभूति पाद में दिया गया है।
सूत्र 4.2 – जात्यंतर परिणाम
जात्यन्तरपरिणामः प्रकृत्यापूरात् ॥२॥
अर्थ: एक जाति (जन्म-रूप) से दूसरी जाति में परिवर्तन प्रकृति के आपूरण से होता है।
भावार्थ: योगदर्शन में शरीर और इंद्रियाँ प्रकृति के परिणाम माने गए हैं। जब एक जन्म-रूप दूसरे में बदलता है, तब प्रकृति के उपादान उस नए रूप में अनुप्रविष्ट होकर उसे पूर्ण करते हैं। "आपूर" का अर्थ है भर जाना या पूर्ण हो जाना। जैसे मिट्टी साँचे में भरकर नया आकार ले लेती है, वैसे ही प्रकृति नए रूप को भरकर पूर्ण करती है। सूत्र का केंद्र यह परंपरागत मान्यता है कि जात्यंतर परिवर्तन प्रकृति के परिणाम से ही संभव होता है।
सूत्र 4.3 – निमित्त की भूमिका
निमित्तमप्रयोजकं प्रकृतीनां वरणभेदस्तु ततः क्षेत्रिकवत् ॥३॥
अर्थ: निमित्त (धर्म आदि कारण) प्रकृतियों को प्रेरित नहीं करते। उनसे केवल बाधा का भेदन होता है, जैसे किसान खेत में बाधा हटाता है।
भावार्थ: किसान खेत में पानी पैदा नहीं करता। वह केवल मेड़ काट देता है और पानी स्वयं क्यारी में पहुँच जाता है। इसी प्रकार धर्म जैसे निमित्त प्रकृति के परिणाम को सीधे चलाते नहीं हैं। वे केवल उस आवरण को हटाते हैं जो विशेष परिणाम को रोक रहा था। यह उपमा प्रकृति के परिणाम के संदर्भ में है। आशय यह है कि निमित्त मार्ग खोलता है, जबकि परिणाम की शक्ति प्रकृति में ही रहती है।
सूत्र 4.4 – निर्माणचित्त
निर्माणचित्तान्यस्मितामात्रात् ॥४॥
अर्थ: निर्मित चित्त केवल अस्मिता से उत्पन्न होते हैं।
भावार्थ: परंपरागत मान्यता है कि सिद्ध योगी अनेक शरीर और उनके अनुरूप चित्त रच सकता है। पतंजलि इन निर्मित चित्तों का कारण बताते हैं: अस्मितामात्र, यानी "मैं हूँ" का भाव। जब अस्मिता में स्थित योगी अपनी साधना-शक्ति से अनेक रूप रचता है, तब उन सबका उपादान यही अस्मिता है। चित्त के निर्माण का मूल अस्मिता है, यही इस सूत्र का निष्कर्ष है।
सूत्र 4.5 – प्रेरक चित्त
प्रवृत्तिभेदे प्रयोजकं चित्तमेकमनेकेषाम् ॥५॥
अर्थ: अनेक चित्तों की प्रवृत्तियों में भेद होने पर भी उन सबका प्रयोजक (प्रेरक) चित्त एक होता है।
भावार्थ: निर्मित चित्त अलग-अलग कार्य कर सकते हैं, फिर भी उनकी प्रवृत्तियाँ अनियंत्रित नहीं होतीं, क्योंकि उन्हें प्रेरित करने वाला चित्त एक है। जैसे एक मुख्य अध्यापक की देखरेख में कई शिक्षक अलग-अलग कक्षाएँ पढ़ाते हैं, वैसे ही एक प्रयोजक चित्त के निर्देश में अनेक चित्त कार्य करते हैं। इस प्रकार निर्माणचित्तों की बहुलता में भी एक व्यवस्था बनी रहती है।
सूत्र 4.6 – ध्यानजन्य चित्त
तत्र ध्यानजमनाशयम् ॥६॥
अर्थ: उन (पाँच प्रकार के सिद्धि-जन्य चित्तों) में ध्यान से उत्पन्न चित्त आशय (कर्माशय) से रहित होता है।
भावार्थ: सूत्र 4.1 में बताए पाँच स्रोतों में केवल ध्यान से उत्पन्न चित्त के लिए "अनाशय" शब्द आया है। यहाँ "आशय" का अर्थ कर्माशय है, यानी पुण्य-पाप के रूप में संचित कर्म का संग्रह। व्यास-भाष्य के अनुसार ऐसे चित्त में राग आदि की धारा नहीं रहती, इसलिए उसमें नया कर्माशय नहीं बनता। इसी कारण योग-परंपरा में ध्यान योग को चित्त के परिष्कार का प्रमुख मार्ग माना गया है।
कर्म, वासना और संस्कार (सूत्र 4.7 से 4.11)
सूत्र 4.7 – कर्म के प्रकार
कर्माशुक्लाकृष्णं योगिनस्त्रिविधमितरेषाम् ॥७॥
अर्थ: योगी के कर्म अशुक्ल और अकृष्ण होते हैं। अन्य लोगों के कर्म तीन प्रकार के होते हैं।
भावार्थ: सामान्य व्यक्ति के कर्म शुक्ल (पुण्य), कृष्ण (पाप) या शुक्ल-कृष्ण मिश्रित होते हैं, और ये कर्माशय के रूप में संचित होते हैं। योगी के कर्म न शुक्ल कहे जाते हैं, न कृष्ण। परंपरागत भाष्य के अनुसार इसका कारण यह है कि उसके कर्म फल की आसक्ति से बँधकर नया संचय नहीं बनाते। कर्माशय की पृष्ठभूमि साधन पाद में मिलती है।
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| सूत्र 4.7 के अनुसार योगी के कर्म अशुक्ल-अकृष्ण होते हैं, जबकि अन्य लोगों के कर्म शुक्ल, कृष्ण या मिश्र होते हैं। |
सूत्र 4.8 – कर्मफल के अनुरूप वासनाएँ
ततस्तद्विपाकानुगुणानामेवाभिव्यक्तिर्वासनानाम् ॥८॥
अर्थ: उन कर्मों से उनके फल के अनुकूल वासनाओं की ही अभिव्यक्ति होती है।
भावार्थ: चित्त में अनेक वासनाएँ संचित रहती हैं, पर हर समय सब प्रकट नहीं होतीं। जिस कर्म का जैसा विपाक (फल का पकना) होता है, उसके अनुकूल वासनाएँ ही उस समय प्रकट होती हैं। जैसे वर्षा ऋतु में वही बीज अंकुरित होते हैं जिनके लिए वह मौसम अनुकूल है। यह सूत्र कर्म, विपाक और वासना के आपसी संबंध को दिखाता है।
सूत्र 4.9 – स्मृति और संस्कार की निरंतरता
जातिदेशकालव्यवहितानामप्यानन्तर्यं स्मृतिसंस्कारयोरेकरूपत्वात् ॥९॥
अर्थ: जाति, देश और काल का व्यवधान होने पर भी वासनाओं में अव्यवहित क्रम बना रहता है, क्योंकि स्मृति और संस्कार एकरूप हैं।
भावार्थ: संस्कार अनुभव से बना सूक्ष्म बीज है और स्मृति उसी बीज का प्रकट रूप। दोनों का स्वभाव एक है, इसलिए बीच में दूसरा जन्म, दूसरा स्थान या लंबा समय आ जाए, तब भी वासना का कार्य-कारण क्रम नहीं टूटता। यह योगदर्शन का तर्क है, जिसका आशय है कि कर्म और वासना का संबंध स्थान और समय की दूरी से नष्ट नहीं होता।
सूत्र 4.10 – वासनाओं की अनादिता
तासामनादित्वं चाशिषो नित्यत्वात् ॥१०॥
अर्थ: उन वासनाओं का कोई आदि नहीं है, क्योंकि आशिष (जीवन की कामना) नित्य है।
भावार्थ: "मैं सदा बना रहूँ" यह कामना हर प्राणी में दिखाई देती है। पतंजलि इसी आधार पर तर्क देते हैं कि यह कामना किसी एक जन्म में नई नहीं बनी, इसलिए इससे जुड़ी वासनाओं की धारा भी अनादि है। यह पतंजलि का दार्शनिक तर्क है, जो पुनर्जन्म की मान्यता पर आधारित है। साधक के लिए इसका उपयोग यह है कि वासनाओं की गहराई समझकर वह उन्हें धैर्य से शांत करने का मार्ग चुनता है।
सूत्र 4.11 – वासनाओं के आधार
हेतुफलाश्रयालम्बनैः सङ्गृहीतत्वादेषामभावे तदभावः ॥११॥
अर्थ: वासनाएँ हेतु, फल, आश्रय और आलंबन से संगृहीत (जुड़ी हुई) हैं। इनके अभाव में वासनाओं का भी अभाव हो जाता है।
भावार्थ: व्यास-भाष्य के अनुसार वासनाएँ चार आधारों पर टिकी हैं। हेतु वे कारण हैं जो कर्म-चक्र को चलाते हैं: धर्म-अधर्म और राग-द्वेष, जिनकी जड़ में अविद्या है, जो साधन पाद में बताए पाँच क्लेशों में पहला है। फल सुख-दुःख का अनुभव है, आश्रय चित्त है और आलंबन विषय है। जैसे चार पायों की चौकी का आधार हटते ही वह खड़ी नहीं रह पाती, वैसे ही इन आधारों के क्षीण होने पर वासनाएँ टिक नहीं पातीं। इसलिए वासना के निवारण के लिए उसके कारणों पर ध्यान देना पड़ता है।
वस्तु, काल और चित्त का संबंध (सूत्र 4.12 से 4.17)
सूत्र 4.12 – अतीत और अनागत
अतीतानागतं स्वरूपतोऽस्त्यध्वभेदाद्धर्माणाम् ॥१२॥
अर्थ: अतीत और अनागत अपने स्वरूप से विद्यमान हैं, क्योंकि धर्मों के अध्वा (काल-मार्ग) भिन्न-भिन्न हैं।
भावार्थ: योगदर्शन में वस्तु के गुण-धर्म तीन कालगत अवस्थाओं में माने गए हैं: वर्तमान में प्रकट, अतीत में बीत चुके और अनागत में अभी अप्रकट। पतंजलि के अनुसार अतीत और अनागत शून्य नहीं हैं, वे अपने सूक्ष्म स्वरूप में रहते हैं। उदाहरण के लिए बीज में भावी वृक्ष का स्वरूप सूक्ष्म रूप से निहित रहता है। अंतर केवल इतना है कि वर्तमान धर्म प्रकट होता है, बीता हुआ लय हो चुका होता है और आने वाला प्रकट होने की प्रतीक्षा में रहता है।
सूत्र 4.13 – धर्मों का स्वरूप
ते व्यक्तसूक्ष्मा गुणात्मानः ॥१३॥
अर्थ: वे धर्म व्यक्त या सूक्ष्म रूप में होते हैं और गुणात्मक हैं।
भावार्थ: पिछले सूत्र में बताए तीनों कालों के धर्म दो रूपों में रहते हैं: प्रकट होने पर व्यक्त और अप्रकट होने पर सूक्ष्म। दोनों की रचना सत्त्व, रजस और तमस, इन तीन गुणों से हुई है। जैसे एक ही आटे से रोटी, पूरी या मठरी बन सकती है, वैसे ही गुणों के भिन्न संयोग से अनेक रूप प्रकट होते हैं। इसलिए दिखाई देने वाला और न दिखाई देने वाला, दोनों रूप प्रकृति के गुणों से ही बने हैं।
सूत्र 4.14 – वस्तु की एकता
परिणामैकत्वाद्वस्तुतत्त्वम् ॥१४॥
अर्थ: परिणाम की एकता से वस्तु का तत्त्व (यथार्थ स्वरूप) निश्चित होता है।
भावार्थ: गुण तीन हैं, पर जब वे मिलकर किसी एक परिणाम में बदलते हैं, तब हमें एक वस्तु का अनुभव होता है। मिट्टी का घड़ा इसका उदाहरण है। मिट्टी, जल और आकार के संयोग से बना परिणाम एक ही घड़ा है। इससे स्पष्ट होता है कि वस्तु का एक यथार्थ स्वरूप होता है और वह परिणाम की एकता से स्थापित होता है।
सूत्र 4.15 – वस्तु एक, चित्त अनेक
वस्तुसाम्ये चित्तभेदात्तयोर्विभक्तः पन्थाः ॥१५॥
अर्थ: वस्तु समान होने पर भी चित्तों के भेद के कारण उन दोनों (वस्तु और ज्ञान) का मार्ग अलग-अलग होता है।
भावार्थ: एक ही पर्वत को यात्री सुंदर दृश्य के रूप में देखता है, किसान उसे वर्षा का स्रोत मानता है और पर्वतारोही के लिए वही चुनौती है। पर्वत वही है, पर देखने वालों के संस्कार और दृष्टिकोण अलग हैं। इसी तरह एक वस्तु से अलग-अलग लोगों के अनुभव भिन्न हो सकते हैं। अनुभव की भिन्नता का कारण वस्तु में कम और चित्त की भिन्नता में अधिक है।
सूत्र 4.16 – वस्तु और चित्त
न चैकचित्ततन्त्रं वस्तु तदप्रमाणकं तदा किं स्यात् ॥१६॥
अर्थ: वस्तु किसी एक चित्त के अधीन नहीं है। यदि वह उस चित्त द्वारा प्रमाणित न हो, तब उसका क्या होगा?
भावार्थ: यहाँ पतंजलि उन विचारकों का खंडन करते हैं जो वस्तु को केवल एक चित्त की रचना मानते हैं। तर्क यह है कि यदि वस्तु किसी एक चित्त पर ही निर्भर होती, तो उस चित्त के निरुद्ध होने या उससे हट जाने पर वह किसी भी चित्त के ज्ञान का विषय नहीं रहती। पर वही वस्तु दूसरे चित्तों से जानी जाती है और बाद में उसी चित्त से भी फिर जानी जा सकती है। इसलिए वस्तु का अस्तित्व किसी एक चित्त पर निर्भर नहीं है। यह सांख्य-योग की यथार्थवादी दृष्टि है। मुक्ति का प्रश्न इस सूत्र का विषय नहीं है, उसकी चर्चा आगे सूत्र 4.34 में आती है।
सूत्र 4.17 – ज्ञात और अज्ञात वस्तु
तदुपरागापेक्षित्वाच्चित्तस्य वस्तु ज्ञाताज्ञातम् ॥१७॥
अर्थ: चित्त को वस्तु के उपराग (रंग) की अपेक्षा होने से वस्तु ज्ञात या अज्ञात होती है।
भावार्थ: चित्त दर्पण की तरह है। जब कोई वस्तु उसके सामने आती है और उसका रंग चित्त पर चढ़ता है, तभी वह ज्ञात होती है। इसलिए कमरे में रखी घड़ी तब तक अज्ञात रहती है जब तक ध्यान उस पर न जाए। इससे स्पष्ट होता है कि वस्तु का होना और उसका जाना जाना, दो अलग बातें हैं। ज्ञान तभी होता है जब चित्त उस वस्तु से रंगा हो।
चित्त, पुरुष और ज्ञान (सूत्र 4.18 से 4.24)
सूत्र 4.18 – चित्तवृत्तियों का ज्ञाता
सदा ज्ञाताश्चित्तवृत्तयस्तत्प्रभोः पुरुषस्यापरिणामित्वात् ॥१८॥
अर्थ: चित्त की वृत्तियाँ उसके स्वामी पुरुष को सदा ज्ञात रहती हैं, क्योंकि पुरुष अपरिणामी है।
भावार्थ: वस्तुएँ कभी ज्ञात और कभी अज्ञात हो सकती हैं, पर चित्त की वृत्तियाँ (क्लिष्ट-अक्लिष्ट भेद) पुरुष के लिए हमेशा प्रकट रहती हैं। इसका कारण यह है कि पुरुष परिवर्तनशील नहीं है। वह चित्त की गतिविधि में हस्तक्षेप नहीं करता, केवल अपरिवर्तनशील द्रष्टा के रूप में रहता है। इसीलिए मन में चलने वाली हर वृत्ति उसके लिए ज्ञात बनी रहती है।
सूत्र 4.19 – चित्त दृश्य है
न तत्स्वाभासं दृश्यत्वात् ॥१९॥
अर्थ: वह चित्त स्वयं प्रकाशित नहीं होता, क्योंकि वह दृश्य है।
भावार्थ: जो वस्तु देखी जाती है, वह स्वयं द्रष्टा नहीं हो सकती। जैसे आँख सबको देखती है, पर अपने आपको सीधे नहीं देख सकती, वैसे ही चित्त भी दृश्य की श्रेणी में आता है। उसका ज्ञाता उससे अलग होना चाहिए। यह सूत्र उस मत का उत्तर देता है जो चित्त को ही अंतिम चेतना मानता है।
सूत्र 4.20 – एक साथ दोनों का ग्रहण नहीं
एकसमये चोभयानवधारणम् ॥२०॥
अर्थ: एक ही समय में (चित्त द्वारा) दोनों (स्वयं और विषय) का निश्चय नहीं होता।
भावार्थ: पिछले सूत्र के तर्क को आगे बढ़ाते हुए पतंजलि कहते हैं कि यदि चित्त ही स्वयं-प्रकाश होता, तो उसे एक ही क्षण में स्वयं को भी और विषय को भी जानना पड़ता। योगदर्शन के अनुसार चित्त ऐसा करने में समर्थ नहीं है। इसलिए चित्त को स्वतंत्र और अंतिम ज्ञाता नहीं माना जा सकता। उसके ऊपर कोई और द्रष्टा होना चाहिए। यह तर्क दर्शन के संदर्भ में है, आधुनिक मनोविज्ञान के दावे के रूप में नहीं।
सूत्र 4.21 – अनवस्था का तर्क
चित्तान्तरदृश्ये बुद्धिबुद्धेरतिप्रसङ्गः स्मृतिसङ्करश्च ॥२१॥
अर्थ: यदि एक चित्त को दूसरे चित्त का दृश्य माना जाए, तो बुद्धि की बुद्धि का अतिप्रसंग (अनंत शृंखला) होगा और स्मृतियों का संकर (मिश्रण) भी हो जाएगा।
भावार्थ: मान लें कि हमारे चित्त को देखने वाला कोई दूसरा चित्त है। तब उस दूसरे चित्त को देखने के लिए तीसरा चित्त चाहिए, फिर चौथा, और यह क्रम कभी समाप्त नहीं होगा। साथ ही स्मृतियों में भी गड़बड़ी होगी, क्योंकि यह पहचानना कठिन हो जाएगा कि कौन-सी स्मृति किस चित्त की है। इसीलिए योगदर्शन में चित्त को देखने के लिए अनंत चित्तों की शृंखला मानना उचित नहीं माना गया है।
सूत्र 4.22 – चेतना और बुद्धि का बोध
चितेरप्रतिसङ्क्रमायास्तदाकारापत्तौ स्वबुद्धिसंवेदनम् ॥२२॥
अर्थ: चिति (चेतना) संक्रमण नहीं करती, फिर भी उसके आकार को प्राप्त हुई बुद्धि में अपनी बुद्धि का संवेदन होता है।
भावार्थ: पुरुष स्थिर रहता है, वह चित्त में उतरकर बदलता नहीं। फिर भी जब बुद्धि में उसका प्रतिबिंब पड़ता है, तब बुद्धि स्वयं को चेतन की तरह अनुभव करती है। चंद्रमा आकाश में स्थिर रहता है, पर जल में उसका प्रतिबिंब हिलता हुआ दिखता है। यह उपमा केवल समझाने के लिए है। यहाँ योगदर्शन की यह मान्यता बताई गई है कि चित्त में अपने बोध की प्रतीति चेतना के सान्निध्य से होती है।
सूत्र 4.23 – सर्वार्थ चित्त
द्रष्टृदृश्योपरक्तं चित्तं सर्वार्थम् ॥२३॥
अर्थ: द्रष्टा और दृश्य दोनों से रंगा हुआ चित्त सर्वार्थ (सब विषयों को ग्रहण करने वाला) होता है।
भावार्थ: चित्त के एक ओर द्रष्टा पुरुष का सान्निध्य है और दूसरी ओर इंद्रियों के माध्यम से आने वाले विषय। दोनों का प्रभाव चित्त पर पड़ता है। इसी से चित्त विषयों को ग्रहण कर पाता है और पुरुष के सान्निध्य में उनका अनुभव संभव होता है। पारदर्शी काँच पर दोनों ओर के रंग दिखने जैसी यह स्थिति है। फिर भी चित्त को स्वतंत्र चेतना नहीं माना गया है। वह माध्यम है, चेतन स्वामी नहीं।
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| सूत्र 4.23: द्रष्टा और दृश्य, दोनों से रंगा हुआ चित्त सब विषयों को ग्रहण करता है। |
सूत्र 4.24 – परार्थ चित्त
तदसङ्ख्येयवासनाभिश्चित्रमपि परार्थं संहत्यकारित्वात् ॥२४॥
अर्थ: वह चित्त असंख्य वासनाओं से विचित्र होने पर भी परार्थ (दूसरे के प्रयोजन के लिए) है, क्योंकि वह संहत होकर कार्य करता है।
भावार्थ: चित्त में अनगिनत वासनाएँ भरी हैं, फिर भी वह अपने लिए नहीं, पुरुष के प्रयोजन के लिए कार्य करता है। जो वस्तु अनेक अंगों को जोड़कर बनी होती है, वह किसी अन्य के प्रयोजन के लिए होती है। जैसे घर अनेक ईंटों को जोड़कर बनता है, पर रहने वाले के लिए होता है। यह सांख्य-योग का तर्क है कि चित्त के अनुभवों का प्रयोजन पुरुष के लिए भोग और अंततः अपवर्ग (मुक्ति) है।
विवेक और कैवल्य (सूत्र 4.25 से 4.34)
सूत्र 4.25 – विशेषदर्शी की स्थिति
विशेषदर्शिन आत्मभावभावनाविनिवृत्तिः ॥२५॥
अर्थ: विशेष को देखने वाले की आत्मभाव की भावना निवृत्त हो जाती है।
भावार्थ: जो साधक चित्त और पुरुष के भेद को साक्षात् देख लेता है, उसके मन में "मैं कौन हूँ, मैं किस रूप में हूँ" जैसी आत्मभाव की कल्पनाएँ शांत हो जाती हैं। रस्सी को साँप समझने वाले का भ्रम जैसे प्रकाश आने पर मिट जाता है, वैसे ही भेद का दर्शन होने पर आत्मभाव की भ्रांत धारणा समाप्त हो जाती है। यहाँ मुख्य बात भेद के विवेक से आत्मभाव की कल्पना का निरसन है।
सूत्र 4.26 – कैवल्य की ओर झुका चित्त
तदा विवेकनिम्नं कैवल्यप्राग्भारं चित्तम् ॥२६॥
अर्थ: तब चित्त विवेक की ओर ढलता हुआ और कैवल्य की ओर झुका हुआ हो जाता है।
भावार्थ: जैसे जल का स्वभाव ढलान की ओर बहना है, वैसे ही विवेक प्राप्त होने के बाद चित्त का झुकाव स्वाभाविक रूप से कैवल्य की ओर हो जाता है। पहले जो चित्त विषयों की ओर खिंचता था, अब वही विवेक की दिशा में सहज रूप से बहता है। इससे साधक को यह संकेत मिलता है कि साधना की एक अवस्था में प्रयत्न अधिक स्वाभाविक हो जाता है।
सूत्र 4.27 – बीच के अंतराल
तच्छिद्रेषु प्रत्ययान्तराणि संस्कारेभ्यः ॥२७॥
अर्थ: उसके अंतरालों (छिद्रों) में संस्कारों से अन्य प्रत्यय (विचार) उत्पन्न होते हैं।
भावार्थ: विवेक की धारा में कभी-कभी विच्छेद आ जाता है। उन अंतरालों में पुराने संस्कारों से "मैं यह हूँ" या "यह मेरा है" जैसे विचार उठ सकते हैं। इसका कारण यह है कि पुराने संस्कार अभी पूरी तरह क्षीण नहीं हुए होते। जैसे राख के नीचे दबी चिंगारी हवा मिलते ही चमक उठती है, वैसे ही संस्कार अवसर मिलते ही विचार के रूप में उठ जाते हैं।
सूत्र 4.28 – संस्कारों का हान
हानमेषां क्लेशवदुक्तम् ॥२८॥
अर्थ: इनका हान (त्याग) क्लेशों के समान ही कहा गया है।
भावार्थ: पतंजलि बताते हैं कि इन संस्कारों को हटाने की प्रक्रिया वही है जो क्लेशों के लिए पहले बताई जा चुकी है। साधन पाद में सूक्ष्म क्लेशों को प्रतिप्रसव (अपने कारण में लय) से और उनकी स्थूल वृत्तियों को ध्यान से क्षीण करने का क्रम बताया गया है। इन संस्कारों के लिए भी यही क्रम समझा जाता है। इसकी पृष्ठभूमि साधन पाद के सूत्र 2.10 और 2.11 में देखी जा सकती है।
सूत्र 4.29 – धर्ममेघ समाधि
प्रसङ्ख्यानेऽप्यकुसीदस्य सर्वथा विवेकख्यातेर्धर्ममेघः समाधिः ॥२९॥
अर्थ: प्रसंख्यान (उच्च विवेकज्ञान) में भी अकुसीद (लाभ की इच्छा न रखने वाले) साधक को सर्वथा विवेकख्याति से धर्ममेघ समाधि प्राप्त होती है।
भावार्थ: इस सूत्र में दो बातें मुख्य हैं। पहली, साधक उच्च विवेकज्ञान के फल में भी आसक्त नहीं रहता। "कुसीद" का मूल अर्थ ब्याज है, इसलिए "अकुसीद" का आशय है, जो ज्ञान का भी कोई लाभ या फल नहीं चाहता। दूसरी, जब ऐसे साधक को सब प्रकार से विवेकख्याति प्राप्त होती है, तब उससे धर्ममेघ समाधि उत्पन्न होती है। परंपरा में "धर्ममेघ" का अर्थ धर्मों की वर्षा करने वाला मेघ बताया गया है। यह नाम इस समाधि की महत्ता दिखाता है। इस अवस्था को समझने के लिए अष्टांग योग के क्रम का स्मरण उपयोगी रहता है।
सूत्र 4.30 – क्लेश-कर्म की निवृत्ति
ततः क्लेशकर्मनिवृत्तिः ॥३०॥
अर्थ: उससे (धर्ममेघ समाधि से) क्लेश और कर्म की निवृत्ति होती है।
भावार्थ: पाँच क्लेश कर्म की जड़ हैं। जब धर्ममेघ समाधि में ये क्लेश समाप्त होते हैं, तब कर्म भी बंधन उत्पन्न करने की शक्ति खो देते हैं। जैसे जड़ कट जाने पर वृक्ष पर नए फल नहीं लगते, वैसे ही क्लेश के नष्ट होने पर कर्म का फलदायी चक्र रुक जाता है। सूत्र में क्लेश और कर्म, दोनों की निवृत्ति का एक साथ वर्णन है।
सूत्र 4.31 – ज्ञान की अनंतता
तदा सर्वावरणमलापेतस्य ज्ञानस्यानन्त्याज्ज्ञेयमल्पम् ॥३१॥
अर्थ: तब सब आवरणों और मलों से रहित ज्ञान की अनंतता के कारण ज्ञेय (जानने योग्य) अल्प हो जाता है।
भावार्थ: चित्त पर चढ़े आवरण और मल जब हट जाते हैं, तब ज्ञान सूर्य के प्रकाश की तरह व्यापक हो जाता है। उस विशाल प्रकाश के सामने जानने योग्य विषय बहुत थोड़े रह जाते हैं। जैसे विशाल आकाश के सामने कोई पक्षी छोटा दिखता है, वैसे ही अनंत ज्ञान के सामने ज्ञेय अल्प प्रतीत होता है। सूत्र ज्ञान की अनंतता और ज्ञेय के अल्प होने पर केंद्रित है।
सूत्र 4.32 – गुणों के क्रम की समाप्ति
ततः कृतार्थानां परिणामक्रमसमाप्तिर्गुणानाम् ॥३२॥
अर्थ: उसके बाद कृतार्थ (प्रयोजन पूर्ण कर चुके) गुणों के परिणाम-क्रम की समाप्ति हो जाती है।
भावार्थ: प्रकृति के तीनों गुण पुरुष को अनुभव कराने और फिर उसे विवेक देने के लिए कार्य करते हैं। जब साधक को विवेक प्राप्त हो जाता है, तब गुणों का यह प्रयोजन पूरा हो जाता है। जैसे विद्यार्थी की पढ़ाई पूरी होने पर विद्यालय की घंटी का उसके लिए कोई प्रयोजन नहीं रहता, वैसे ही उस साधक के लिए गुणों का परिणाम-क्रम समाप्त हो जाता है। योगदर्शन में कैवल्य और प्रकृति के गुणों के प्रयोजन को समझाने वाला यह महत्त्वपूर्ण सूत्र है।
सूत्र 4.33 – क्रम का स्वरूप
क्षणप्रतियोगी परिणामापरान्तनिर्ग्राह्यः क्रमः ॥३३॥
अर्थ: क्रम क्षण का प्रतियोगी (क्षणों से संबद्ध) है और परिणाम के अंतिम छोर पर ग्रहण किया जाता है।
भावार्थ: समय सूक्ष्म क्षणों के क्रम से चलता है, पर हम उस क्रम को सीधे नहीं पकड़ पाते। जब कोई परिवर्तन पूरा होकर परिणाम के अंतिम छोर पर पहुँचता है, तभी उसके क्रम को पहचान पाते हैं। नया वस्त्र एक दिन में पुराना नहीं होता, पर उसके जीर्ण होने पर हम बीते क्षणों के क्रम को अनुभव करते हैं। सूत्र में क्रम का संबंध क्षणों से और उसके ग्रहण का संबंध परिणाम की पूर्णता से बताया गया है।
सूत्र 4.34 – कैवल्य
पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तिरिति ॥३४॥
अर्थ: पुरुष के प्रयोजन से शून्य हुए गुणों का प्रतिप्रसव (अपने कारण में लय) कैवल्य है, अथवा चितिशक्ति की अपने स्वरूप में प्रतिष्ठा कैवल्य है।
भावार्थ: यह योगसूत्र का अंतिम सूत्र है और इसमें कैवल्य की दो परिभाषाएँ हैं। पहली प्रकृति की ओर से है: गुणों का प्रयोजन पूरा होने पर वे अपने मूल कारण में लीन हो जाते हैं। दूसरी चेतना की ओर से है: चितिशक्ति अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित हो जाती है। दोनों एक ही अवस्था के दो पक्ष हैं। समाधि पाद में वर्णित निरोध की उच्चतम अवस्था और इस कैवल्य को परंपरा में एक ही साधना-शृंखला के संदर्भ में समझा जाता है। इसी अवस्था को योग के चरम उद्देश्य के रूप में देखा जाता है। अधिक जानकारी के लिए योग का उद्देश्य लेख पढ़ें।
सारांश
कैवल्य पाद योगसूत्र का समापन अध्याय है। इसके मुख्य बिंदु ये हैं:
- सिद्धियाँ जन्म, औषधि, मंत्र, तप और समाधि से उत्पन्न बताई गई हैं। इनमें ध्यान से उत्पन्न चित्त कर्माशय से रहित बताया गया है।
- योगी के कर्म अशुक्ल-अकृष्ण कहे गए हैं, जबकि अन्य लोगों के कर्म शुक्ल, कृष्ण और मिश्रित, तीन प्रकार के होते हैं।
- वासनाएँ अनादि हैं, पर हेतु, फल, आश्रय और आलंबन के अभाव में उनका भी अभाव हो जाता है।
- सूत्र 4.16 की दार्शनिक व्याख्या के अनुसार वस्तु किसी एक चित्त के अधीन नहीं है। एक ही वस्तु अलग-अलग चित्तों को अलग रूप में दिखाई दे सकती है।
- चित्त दृश्य है और उसका स्वामी पुरुष चित्त से अलग, अपरिणामी द्रष्टा है।
- विशेषदर्शी साधक का चित्त विवेक की ओर ढलकर कैवल्य की ओर झुक जाता है।
- धर्ममेघ समाधि से क्लेश और कर्म की निवृत्ति होती है।
- कृतार्थ गुणों का प्रतिप्रसव और चितिशक्ति का स्वरूप में स्थित होना ही कैवल्य है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
कैवल्य पाद में कितने सूत्र हैं?
कैवल्य पाद में कुल 34 सूत्र हैं। यह योगसूत्र का चौथा और अंतिम पाद है।
कैवल्य का क्या अर्थ है?
कैवल्य का अर्थ है "केवल" या "अकेला" होना। योग में यह वह अवस्था है, जब व्यक्ति समझ लेता है कि वह मन, विचार और इच्छाओं से अलग, उन्हें देखने वाली चेतना है।
हम अक्सर कहते हैं "मैं दुखी हूँ" या "मैं क्रोधित हूँ", जबकि दुख और क्रोध मन की अवस्थाएँ हैं। यह भेद समझ आने पर मन का बंधन छूट जाता है। पतंजलि ने सूत्र 4.34 में इसी को कैवल्य कहा है।
धर्ममेघ समाधि क्या है?
धर्ममेघ समाधि वह अवस्था है जो उच्च विवेकज्ञान में भी आसक्ति न रखने वाले साधक को सर्वथा विवेकख्याति से प्राप्त होती है। इससे क्लेश और कर्म की निवृत्ति होती है (सूत्र 4.29 और 4.30)।
क्या कैवल्य और मोक्ष एक ही हैं?
सामान्य बोलचाल में दोनों का अर्थ मुक्ति लिया जाता है। योगसूत्र में कैवल्य शब्द का प्रयोग पुरुष और प्रकृति के भेद के संदर्भ में होता है। अलग-अलग भारतीय दर्शनों में मुक्ति की अवधारणा और उसकी व्याख्या भिन्न हो सकती है, इसलिए दोनों शब्दों को हर संदर्भ में समान नहीं मानना चाहिए।
क्या योगसूत्र के अनुसार संसार असत्य है?
नहीं। सूत्र 4.16 की व्याख्या में बताया गया है कि वस्तु किसी एक चित्त के अधीन नहीं है। योगदर्शन में जगत को यथार्थ माना गया है।
क्या सामान्य गृहस्थ को भी कैवल्य मिल सकता है?
योगसूत्र में कैवल्य की प्राप्ति के लिए गृहस्थ या संन्यासी होने की कोई स्पष्ट शर्त नहीं बताई गई है। पर इसे किसी के लिए निश्चित उपलब्धि भी नहीं कहा जा सकता। इसके लिए दीर्घकालीन और निरंतर साधना का मार्ग बताया गया है।
आगे पढ़ें
कैवल्य पाद के साथ योगसूत्र के चारों पाद पूर्ण होते हैं। साधना में प्राणायाम की भूमिका समझने के लिए योगसूत्र में प्राणायाम लेख पढ़ें, जिसमें सूत्र 2.49 से 2.51 की व्याख्या है।
अस्वीकरण
यह लेख शैक्षिक जानकारी के लिए है। यह चिकित्सा या मनोवैज्ञानिक सलाह का विकल्प नहीं है। साधना से जुड़ा कोई भी अभ्यास योग्य गुरु के मार्गदर्शन में करें।


