योग अभ्यास का सही क्रम (Right Sequence of Yoga) स्वस्थ, सुरक्षित और प्रभावी योगाभ्यास के लिए अत्यंत आवश्यक है। आज के समय में लोग आसन, प्राणायाम और ध्यान का अभ्यास तो करते हैं, लेकिन अधिकतर लोग इन्हें बिना सही क्रम के करने लगते हैं। परिणामस्वरूप योग का पूर्ण लाभ नहीं मिल पाता।
योग का उद्देश्य केवल शरीर को स्वस्थ रखना नहीं है, बल्कि श्वास और मन के माध्यम से आंतरिक संतुलन (Inner Balance) स्थापित करना भी है। यही कारण है कि महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र में योगाभ्यास का एक स्पष्ट और वैज्ञानिक क्रम बताया है।
इस लेख में हम विस्तार से जानेंगे कि योग का सही क्रम क्या है, आसन, प्राणायाम और ध्यान को किस क्रम में करना चाहिए, तथा सही क्रम से किया गया योग क्यों अधिक लाभकारी होता है।
You can also read the English version of this article — **Right Sequence of Yoga (English Article)**.
विषय सूची (Table of Contents)
- आसन क्या है?
- पतंजलि के अनुसार आसन
- आसन अभ्यास में सावधानियाँ
- आसन का सही क्रम
- खड़े होकर किए जाने वाले आसन
- बैठकर किए जाने वाले आसन
- पेट के बल किए जाने वाले आसन
- पीठ के बल किए जाने वाले आसन
- अभ्यास के अंत में शवासन
- प्राणायाम का सही क्रम
- प्राणायाम अभ्यास में सावधानियाँ
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| योगाभ्यास का सही क्रम शरीर, श्वास और मन के संतुलन के लिए आवश्यक है। |
योग का सही क्रम क्या है? | Right Sequence of Yoga
आधुनिक समय में स्वास्थ्य और मानसिक शांति के लिए आसन, प्राणायाम और ध्यान का अभ्यास किया जाता है। ये तीनों योग के महत्वपूर्ण अंग हैं।
- आसन शरीर को सुदृढ़ और लचीला बनाते हैं
- प्राणायाम श्वसन तंत्र को मजबूत कर शरीर को ऊर्जावान बनाता है
- ध्यान मानसिक शांति और एकाग्रता प्रदान करता है
योगाभ्यास में ये तीनों क्रियाएँ आवश्यक हैं, लेकिन इनका अभ्यास सही क्रम से होना अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस क्रम को समझने के लिए हमें पतंजलि के अष्टांगयोग को समझना होगा, जिसका वर्णन योगसूत्र में विस्तार से किया गया है।
पतंजलि योगसूत्र के अनुसार सही क्रम
- आसन
- प्राणायाम
- ध्यान (Meditation)
योगाभ्यास का पहला क्रम – आसन | First Stage of Yoga Practice – Asana
वास्तव में योग एक आध्यात्मिक साधना है और ध्यान (Meditation) इसका मुख्य उद्देश्य है। ध्यान के लिए मन का शांत और एकाग्र होना आवश्यक है, और यह तभी संभव है जब शरीर स्वस्थ और स्थिर हो।
इसी कारण ऋषियों ने योगाभ्यास के पहले क्रम में आसन को रखा। आसन के अभ्यास से शरीर शुद्ध, सशक्त और ध्यान के लिए तैयार होता है।
आसन क्या है?
आसन अष्टांगयोग का तीसरा चरण है। यम और नियम के बाद आसन का महत्वपूर्ण स्थान है। यह हमारे स्थूल शरीर (Physical Body) को सीधे प्रभावित करता है।
आसन एक शारीरिक अभ्यास है, जिसका नियमित अभ्यास शरीर को मजबूत करता है, अंगों को सक्रिय बनाए रखता है और स्थिरता प्रदान करता है। इसलिए योगाभ्यास की शुरुआत आसन से करना उचित माना गया है।
पतंजलि के अनुसार आसन
महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र में आसन को परिभाषित करते हुए कहा है —
“स्थिरसुखम् आसनम्” (योगसूत्र 2.46)
अर्थात जिस स्थिति में शरीर स्थिर और सुखपूर्वक ठहर सके, वही आसन है।
इसका अर्थ यह है कि आसन का अभ्यास सरलता, स्थिरता और सहजता के साथ किया जाना चाहिए, न कि बलपूर्वक।
आसन अभ्यास में सावधानियाँ
आसन का अभ्यास करते समय निम्न बातों का ध्यान रखना आवश्यक है:
1. सूक्ष्म व्यायाम
योगाभ्यास से पहले कुछ सूक्ष्म व्यायाम अवश्य करें। इससे शरीर वार्म-अप होता है और योगाभ्यास के लिए तैयार हो जाता है।
2. पूरक आसन
एक आसन के बाद उसका पूरक या विपरीत आसन अवश्य करें। इससे शरीर का संतुलन बना रहता है और आसन का पूरा लाभ मिलता है।
पूरक आसनों की सही जानकारी के लिए यह लेख पढ़ें — **पूरक आसन का अभ्यास और लाभ**।
3. विश्राम
एक आसन के बाद कुछ क्षण विश्राम करें। श्वासों को सामान्य करें और फिर अगला आसन करें।
4. सरलता और क्षमता
आसन का अभ्यास अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार करें। प्रारंभ में कठिन आसन न करें और शरीर पर अनावश्यक बल प्रयोग न करें।
आसन का सही क्रम | Right Sequence of Asana Practice
आसन का अभ्यास भी एक निश्चित क्रम में किया जाना चाहिए। गलत क्रम से किया गया अभ्यास कभी-कभी हानिकारक भी हो सकता है।
आसन का सही क्रम इस प्रकार है —
- खड़े होकर किए जाने वाले आसन
- बैठकर किए जाने वाले आसन
- पेट के बल लेटकर किए जाने वाले आसन
- पीठ के बल लेटकर किए जाने वाले आसन
- अंत में शवासन में विश्राम
इसी क्रम से किया गया आसन अभ्यास शरीर को संतुलित और सुरक्षित रूप से लाभ पहुँचाता है।
खड़े होकर किए जाने वाले आसन | Standing Asanas
मैट या कपड़े का आसन (सीट) बिछा कर खड़े हो जाएं और अभ्यास करने से पहले कुछ सूक्ष्म व्यायाम करें। सूक्ष्म व्यायाम करने के बाद नीचे बताए गए आसनों को इस क्रम से करें।

सूर्य नमस्कार से शरीर योगाभ्यास के लिए तैयार होता है।

1. सूर्य नमस्कार (Sun Salutation)
सूर्य नमस्कार योगाभ्यास की शुरुआत में सबसे महत्वपूर्ण क्रम माना जाता है।
यह खड़े होकर किए जाने वाला श्रृंखलाबद्ध अभ्यास है जिसमें शरीर की लगभग सभी मांसपेशियाँ सक्रिय होती हैं, और रक्त संचार व श्वसन क्रिया सुचारू रूप से संचालित होती है।
विधि:
- मैट पर खड़े होकर थोड़ा वार्म-अप करें
- 12 मुद्राओं वाली श्रृंखला को सहजता से करें
- प्रत्येक मुद्रा में श्वास का ध्यान रखें
- पूरा अभ्यास लयबद्ध और शांत तरीके से करें
2. त्रिकोण आसन + ताड़ासन (Trikonasana + Tadasana)
त्रिकोण आसन और ताड़ासन खड़े आसन का उत्तम संयोजन हैं।
पहले त्रिकोण आसन करें और उसके बाद ताड़ासन का अभ्यास करें।
त्रिकोण आसन विधि:
- दोनों पैरों को अधिकतम दूरी पर रखें
- दोनों हाथों को शरीर के दाएं-बाएं रखें
- कमर से झुकते हुए बारी-बारी दायां हाथ बाएं पैर के पंजे के पास और बायां हाथ दाएं पंजे के पास ले जाएं
- दूसरा हाथ पीठ के पीछे रखें
- यह क्रिया तीव्र गति से करें
- यथा शक्ति अभ्यास करने के बाद पैरों की दूरी सामान्य करके विश्राम करें
ताड़ासन विधि:
- कुछ सेकंड विश्राम के बाद दोनों पैर एक साथ रखते हुए दोनों हाथ ऊपर उठाएं
- श्वास भरें और हाथों को ऊपर की ओर खींचे
- हाथों व गर्दन को थोड़ा पीछे की ओर झुकाएं
- कुछ देर रुकने के बाद श्वास छोड़ते हुए वापस आ जाएं
- हाथों को नीचे ले आएं
- विश्राम की स्थिति में रुकें
दोनों आसन एक साथ करने से लाभ
पहले अभ्यास में कमर को आगे की तरफ झुकाया जाता है और दूसरे अभ्यास में कमर को सीधा करके हाथों तथा शरीर के ऊपरी भाग को ऊपर की ओर खिंचाव दिया जाता है। इस कारण आसन के लाभ में वृद्धि होती है। ये दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।
3. हस्तपाद आसन + अर्ध चक्रासन (Hasta Padasana + Ardha Chakrasana)
ये दोनों आसन एक दूसरे के विपरीत दिशा में होने के कारण एक अच्छा संयोजन बनाते हैं।
इनसे रीढ़ की लचकता बढ़ती है और कमर को संतुलन मिलता है।
विधि – हस्तपाद आसन:
- दोनों पैरों को मिलाएं
- एड़ी मिली और पंजे खुले रखें
- दोनों घुटने मिला कर रखें
- श्वास भरते हुए दोनों हाथ ऊपर उठाएं (ताड़ आसन)
- श्वास छोड़ते हुए कमर से आगे की ओर झुकें
- माथा घुटनों के पास ले जाने का प्रयास करें
- दोनों हथेलियां पैरों के पास ले जाने का प्रयास करें
- घुटनों को सीधा रखें
- यथा शक्ति रुकने के बाद धीरे-धीरे ऊपर उठें और विश्राम करें
सावधानी :-- सरलता से जितना झुक सकते हैं उतना ही झुकें। माथा घुटनों को टच नहीं होता है, तो अधिक प्रयास न करें। कमर या रीढ में कोई परेशानी है तो यह आसन न करें।
विधि – अर्ध चक्रासन:
- कुछ देर विश्राम के बाद अर्ध चक्रासन का अभ्यास करें
- दोनों पैरों को एक साथ रखें
- दोनों हाथों को ऊपर ले जाएं
- हाथों मे खिंचाव रखते हुए पीछे की ओर झुकाएं
- सरलता से जितना पीछे झुक सकते हैं उतना ही झुकें
- नए व्यक्ति केवल हाथों व गर्दन को हल्का सा पीछे की ओर झुकाएं
- क्षमता अनुसार कुछ देर रुकने के बाद सामान्य स्थिति में आ जाएं।
सावधानी : रीढ तथा गर्दन की परेशानी वाले व्यक्ति इस आसन को न करें।
लाभ : दोनों आसन एक साथ करने से
पहले आसन में रीढ़ को आगे की ओर तथा दूसरे आसन में रीढ़ को पीछे की ओर प्रभावित किया जाता है। ऐसा करने से रीढ़ में लचक (फ्लैक्सिबिलिटी) बनी रहती है। दोनों आसन एक दूसरे के विपरीत दिशा में किए जाते हैं। इसलिए ये अधिक लाभदायी होते हैं।
बैठकर किए जाने वाले आसन | Seated Asanas
खड़े हो कर आसन करने के बाद पैर फैला कर बैठ जाएं। दोनों हाथ पीछे की ओर टिकाएं। गर्दन को पीछे ढीला छोड़ कर कुछ सेकंड विश्राम करें। बैठ कर किये जाने वाले आसनों का इस क्रम से अभ्यास करें:
1. पश्चिमोत्तान आसन + पूर्वोत्तान आसन
इन दोनों आसनों का अच्छा कॉम्बिनेशन है। पश्चिमोत्तान आसन से पेट, पीठ, कमर तथा कमर से नीचे का भाग प्रभावित होता है। पूर्वोत्तान आसन से रीढ़ व कमर सीधी हो कर पूर्व स्थिति मे आ जाती है।
विधि - पश्चिमोत्तान आसन
- पैरों को सीधा करके बैठें
- दोनों हाथ घुटनों पर रखें
- रीढ़ को सीधा रखें
- श्वास भरते हुए दानों हाथ ऊपर उठाएं
- हाथों में खिंचाव रखें
- श्वास छोड़ते हुए कमर से आगे की तरफ झुकें
- माथा घुटनों से लगाने का प्रयास करें
- दोनों हाथों से पैर के पंजों को पकड़ने का प्रयास करें
- पूर्ण स्थिती में यथा शक्ति रुकें
- धीरे धीरे ऊपर उठें और पूर्व स्थिति में आ जाएं
- पैरों को सुविधा जनक स्थिति रखें
- हाथ पीछे टिका कर विश्राम करें
सावधानी : यदि माथा घुटनों तक नहीं पहुंच सकता है और हाथ पंजों तक नहीं पहुंच रहे हैं, तो अधिक प्रयास न करें। सरलता से जितना झुक सकते हैं, उतना ही झुकें। शरीर के साथ अनावश्यक बल प्रयोग हानिकारक हो सकता है।
विधि: पूर्वोत्तान आसन
पश्चिमोत्तान आसन में आगे की तरफ झुकने से कमर व रीढ़ आगे की तरफ प्रभावित होती है। दूसरे आसन में कमर व रीढ़ को सीधा किया जाता है।
- दोनों पैर मिलाएं
- दोनों हाथ शरीर के पास दाएं-बाएं रखें
- एड़ी, पंजे व घुटने मिला कर रखें
- हाथों और एड़ी पर दबाव बनाते हुए शरीर का मध्य भाग ऊपर उठा दें
- पूरे शरीर का भार एड़ी व हाथों पर आने के बाद गर्दन को ढीला छोड़ कर सिर को धीरे से नीचे की ओर लटक जाने दें
- स्थिति मे कुछ देर रुकें
- पूर्व-स्थिति में आने के लिए शरीर के मध्य भाग को धीरे से नीचे टिकाएं
- हाथों को पीछे रख कर कुछ देर विश्राम करें
लाभ - दोनों आसन एक साथ करने से
ये दोनों आसन साथ-साथ करने से रीढ़ व कमर के झुकने का बैलेंस बना रहता है। दोनों का एक साथ अभ्यास करने से इनके लाभ और बढ़ जाते हैं।
2. अर्ध मत्स्येन्द्र आसन (Ardha Matsyendrasana)
बैठ कर किये जाने वाले आसनों में यह एक महत्वपूर्ण आसन है। आरम्भ में नए व्यक्तियों के लिए यह थोड़ा कठिन आसन है। लेकिन यह बहुत लाभकारी अभ्यास है। नए व्यक्ति यदि आसन की पूर्ण-स्थिति तक नहीं जा सकते हैं, तो जितना कर सकते हैं उतना करें। कम करने पर भी आसन का लाभ मिलेगा।
विधि - अर्ध मत्स्येंद्र आसन
- दोनों पैरों को सीधा करके बैठें
- दायां पैर मोड़ें और बाईं जंघा के नीचे रखें
- बाएं पैर को उठा कर दाईं जंघा के पास रखें
- बायां घुटना सीने (Chest) के पास रहे
- दोनों हाथों से घुटने को सीने की तरफ दबाएं
- दाएं हाथ से घुटने को सीने की ओर दबाव बनाते हुए पैर के पंजे को पकड़ें
- बायां हाथ पीठ की पीछे रखें
- गर्दन को बाईं तरफ घुमाएं
- यह आसन की पूर्ण स्थिति है
- पूर्ण स्थिति मे अपनी क्षमता के अनुसार रुकें
- यथा शक्ति रुकने के बाद धीरे-धीरे पूर्व स्थिति में आ जाएं
- पैरों को सीधा करें
- यह क्रिया दूसरी तरफ से दोहराएं
विश्राम : इस आसन का अभ्यास करने के बाद दोनों पैरों को सीधा करें। दोनों पैरों में सुविधा के अनुसार दूरी रखें। हाथों को पीछे टिका कर सहारा लें। गर्दन को ढीला छोड़ कर सिर को पीछे झुकाएं। कुछ देर इस स्थिति में विश्राम करें।
सावधानी : आसन को अपनी क्षमता के अनुसार करें। यदि आसन की पूर्ण स्थिति तक नही पहुंच सकते है तो बल प्रयोग न करे। सरलता से जितना कर सकते है उतना ही करें। आंत के रोगी तथा रीढ़ की परेशानी वाले व्यक्ति इस आसन को न करें। घुटने मोड़ने में परेशानी है या कोई सर्जरी हुई है तो यह आसन न करें।
अर्ध मत्स्येंद्रासन के लाभ, सावधानियाँ और अभ्यास विधि को विस्तार से समझने के लिए हमारा यह लेख पढ़ें — **अर्ध मत्स्येंद्रासन (Ardha Matsyendrasana)**।
3. उष्ट्रासन + शशांक आसन
ये दोनों आसन एक दूसरे के विपरीत दिशा में किये जाने वाले आसन हैं। दोनों आसन साथ-साथ करने से मिलने वाले लाभ में वृद्धि होती है। पहले उष्ट्रासन और उसके बाद शशांक आसन का अभ्यास करें।
उष्ट्रासन की विधि
- घुटने मोड़ कर वज्रासन की मुद्रा में बैठें
- घुटनों से ऊपर उठें, घुटनों में थोड़ा गैप रखें
- पंजे भी समान दूरी पर रखें
- दोनों हाथ कमर पर, अंगूठे रीढ की तरफ और उंगलियां कमर पर रखें
- गर्दन को पीछे की तरफ झुकाएं
(यदि आसन को पहली बार कर रहे व्यक्तियों को कोई परेशानी लगे, तो यहां से वापस आ जाएं।)
- धीरे-धीरे रीढ़ को पीछे की ओर झुकाएं
- रीढ़ पर धनुषाकार घुमाव आने के बाद दोनों हाथों को कमर से हटा कर एड़ियों पर रखें
- यह आसन की पूर्ण स्थिती है
- इस स्थिती मे कुछ देर रुकें
- आसन की स्थिति से वापस आने के लिए पहले दायां हाथ और उसके बाद बायां हाथ कमर पर ले आएं
- कमर को सीधा करें
- वज्रासन की मुद्रा मे बैठ जाएं
- विश्राम करें
सावधानी : रीढ़ की परेशानी वाले व्यक्ति इस आसन को न करें। नए व्यक्ति सावधानी से करें और बलपूर्वक पूर्ण स्थिति मे न जाएं।
शशांक आसन की विधि
- वज्रासन की मुद्रा में बैठें
- दोनों हाथ घुटनों पर रखें
- श्वास भरते हुए हाथों को ऊपर उठाएं
- हाथों को ऊपर की ओर खींचें
- श्वास छोड़ते हुए आगे की ओर झुकें
- दोनों हाथ सिर के दाएं-बांए रखें
- पहले हथेलियां, फिर कोहनियां और उसके बाद माथा जमीन से लगाएं
- श्वास सामान्य लेते-छोड़ते हुए स्थिति में रुकें
- वापसी के लिए श्वास भरते हुए ऊपर उठें
- श्वास छोड़ते हुए हाथों को घुटनों पर ले आएं
- विश्राम करें
| शशांक आसन शरीर के आंतरिक अंगों को सक्रिय करता है। |
लाभ - दोनों आसनों का
दोनों आसन रीढ़ के लिए उत्तम अभ्यास हैं। ये रीढ़ की फ्लेक्सिबिलिटी बढ़ने वाले आसन हैं। रीढ़ तथा पेट के लिए उत्तम आसन हैं।
वज्रासन में किए जाने वाले योग आसनों की पूरी जानकारी के लिए हमारा यह लेख अवश्य पढ़ें — **वज्रासन में किए जाने वाले योग आसन**।
पेट के बल किये जाने वाले आसन | Prone Asanas
पेट के बल लेट कर किये जाने वाले आसनों का सही क्रम क्या है? वज्रासन के बाद पेट के बल लेट जाएं और आगे का अभ्यास करें।
भुजंग आसन + शलभ आसन (Bhujangasana + Shalabhasana)
ये दोनो आसन एक दूसरे के सहायक आसन माने जाते हैं। इस लिए इनको साथ-साथ सही क्रम से करना चाहिए। भुजंग आसन से शरीर का उपरी भाग प्रभावित होता है। शलभ आसन करने से कमर के नीचे का भाग प्रभाव में आता है।
भुजंग आसन विधि:
- पेट के बल लेट जाएं, पैरों को सीधा रखें
- हाथों को कोहनियों से मोड़ कर हथेलियां सिर के दाएं-बाएं रखें। माथा नीचे टिका कर रखें
- धीरे से सिर को ऊपर उठाएं
- हाथों पर कम से कम दबाव डालते हुए रीढ के सहारे सीना ऊपर उठाएं
- अधिकतम ऊपर उठने के बाद रुक जाएं
- पूर्ण स्थिति मे कुछ देर रुकने के बाद धीरे-धीरे वापस आ जाएं
- पहले सीना और फिर माथा नीचे टिकाएं
शलभ आसन विधि:
- शलभ आसन के लिए पेट के बल आ जाएं
- दोनों हाथों की हथेलियों को दोनों जंघाओं के नीचे रखें
- ठोडी को नीचे लगाएं
- दोनों मिले हुए पैर, घुटने सीधे रखते हुए ऊपर उठाएं, स्थिती मे रुकें
- कुछ देर रुकने के बाद दोनो मिले हुए पैर धीरे से नीचे रखें और कुछ क्षण विश्राम करें
पीठ के बल लेटकर किए जाने वाले आसन | Supine Asanas
दायां हाथ ऊपर करते हुए, धीरे से करवट बदलें और पीठ के बल आ जाएं। कुछ आसन इस स्थिति में करें। लेट कर आसन आरम्भ करने से पहले हाथों को ऊपर ले जाकर ताड़ आसन का अभ्यास करें।
पीठ के बल लेट कर किये जाने वाले आसनों का सही क्रम इस प्रकार है :
1. सर्वांग आसन + मत्स्य आसन (Sarvangasana + Matsyasana)
ये दोनों आसन साथ-साथ किये जाने चाहिए। पहले सर्वांग आसन करें। सर्वांग आसन के बाद मत्स्य आसन करें। मत्स्य आसन सर्वांग आसन का पूरक आसन है।
सर्वांग आसन विधि:
- पीठ के बल सीधे लेट जाएं
- दोनों पैर मिला कर रखें
- हाथ दाएं-बाएं कमर के साथ रखें
- श्वास भरते हुए धीरे-धीरे दोनों पैर ऊपर उठाएं
- पैर ऊपर उठाते समय घुटने सीधे रखें
- पैर ऊपर उठने के बाद पंजों में खिंचाव देते हुए कुछ देर रुकें
- श्वास छोड़ते हुए पैरों को सिर की ओर ले जाएं
- हलासन की स्थिति मे कुछ देर रुकें
- श्वास भरते हुए धीरे-धीरे पैरों को बीच मे ले आएं
- आकाश की ओर पैरों को खींच कर रखें
- दोनों हाथों से पीठ को सहारा देते हुए मध्य- भाग ऊपर उठाएं
- पैरों को आकाश की ओर खींच कर रखें
- स्थिति मे कुछ देर रुकने के बाद कमर को धीरे-धीरे नीचे टिकाएं
- हाथों को कमर से हटा कर दाएं-बाएं रखें
- घुटने सीधे रखते हुए पैरों को नीचे ले कर आएं
- पैर नीचे आने के बाद श्वास सामान्य करते हुए विश्राम करें
सर्वांग आसन के बाद मत्स्य आसन अवश्य करें। यह इसका पूरक आसन है।
मत्स्य आसन विधि:
- आसन पर लेटे हुए दायां पैर बाईं जंघा पर, बायां पैर दाईं जंघा पर रखें (लेटे हुए पद्मासन की स्थिति)
- दोनों हाथों से पैरों के अंगूठे पकड़ें
- कोहनियों का सहारा ले कर शरीर का मध्य भाग ऊपर उठाएं
- स्थिति मे कुछ देर रुकने के बाद वापस आ जाएं
- पैर खोल कर विश्राम करें
दोनों आसन करने का लाभ :
ये दोनों एक दूसरे के विपरीत आसन हैं। सर्वांग आसन के बाद मत्स्य आसन करना लाभकारी होता है। इसलिए इन दोनों को इसी क्रम से किया जाना चाहिए।
2. पादोत्तान आसन + पवन मुक्त आसन :
ये दोनों आसन क्रमश: साथ-साथ किये जाने चाहिएं। पहले पादोत्तान आसन करें, उसके बाद पवन मुक्त आसन का अभ्यास करें।
- चटाई (मेट) पर लेट कर हाथों को ऊपर करें
- श्वास भरते हुए हाथों और पैरों में खिंचाव देते हुए ताड़ आसन करें
- दोनों मिले हुए पैर घुटने सीधे रखते हुए ऊपर उठाएं (जमीन से लगभग 60 डिग्री)
- कमर से ऊपर का भाग उठाते हुए हाथों को घुटनों के पास ले जाने का प्रयास करें
- स्थिति में कुछ देर रुकने के बाद वापिस आ जाएं
- धीरे से पैर नीचे टिकाएं
- हाथों को शरीर के बराबर में ले आएं
- पैर खोल कर विश्राम करें
यह आसन पहले किये गये आसन का सहायक आसन है। पहले किये गये आसन के लाभ को बढाता है। एकत्रित हुई दूषित वायु को बाहर निकालता है। इसलिए इसका नाम पवन मुक्त आसन है।
- दोनों पैर मोड़ कर दोनों हाथों से घुटनों को पेट की ओर दबाएं
- सिर ऊपर उठाते हुए नासिका घुटनों के पास ले जाने का प्रयास करें
- पूर्ण स्थिती मे कुछ देर रुकें
- कुछ देर रुकने के बाद वापस आ जाएं
- दोनों घुटनों को सीधा करें
- दोनों पैरों को धीरे से नीचे टिकाएं
- विश्राम करें
शवासन | Shavasana (Final Relaxation)
सभी आसनों के अंत में शवासन का अभ्यास करें। यह विश्राम करने का आसन है। सीधे लेट कर शरीर को पूरी तरह ढीला छोड़ दें। श्वास सामान्य करें। कुछ देर विश्राम करने के बाद उठ कर बैठ जाएं और प्राणायाम करें।
अभ्यास का दूसरा क्रम – प्राणायाम | Practice of Pranayama
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| प्राणायाम अभ्यास से श्वसन तंत्र सुदृढ़ होता है। |
आसन का अभ्यास करने के बाद कुछ देर विश्राम करना चाहिए। विश्राम के बाद ही प्राणायाम का अभ्यास करना उचित होता है। ऐसा करने से श्वसन तंत्र सहज रहता है और प्राणायाम का पूरा लाभ मिलता है।
प्राणायाम भी एक वैज्ञानिक अभ्यास है, इसलिए इसे सही क्रम में करना आवश्यक है। सही क्रम से किया गया प्राणायाम शरीर को ऊर्जावान बनाता है और मन को शांत करता है।
योगाभ्यास में प्राणायाम का सही क्रम | Right Sequence of Pranayama
प्राणायाम का अभ्यास शांत स्थान पर, स्थिर आसन में बैठकर करना चाहिए। पद्मासन सर्वोत्तम माना गया है, लेकिन यदि पद्मासन संभव न हो तो सुखासन में भी अभ्यास किया जा सकता है।
प्राणायाम का सही क्रम इस प्रकार है:
1. श्वास-प्रश्वास (लम्बे-गहरे सांस लेना और छोड़ना)
प्राणायाम के आरम्भ में कुछ देर तक लम्बी और गहरी सांस लें तथा छोड़ें।
इससे फेफड़े सक्रिय होते हैं और शरीर आगामी प्राणायाम अभ्यास के लिए तैयार होता है।
2. कपालभाति प्राणायाम
श्वास-प्रश्वास के बाद कपालभाति का अभ्यास करें।
यह प्राणायाम कपाल (शीर्ष) भाग की शुद्धि करता है, श्वसन तंत्र को सुदृढ़ करता है, पेट के अंगों को सक्रिय करता है और शरीर को ऊर्जावान बनाता है।
3. अनुलोम-विलोम प्राणायाम
कपालभाति के बाद श्वास सामान्य करके अनुलोम-विलोम प्राणायाम करें।
कपालभाति के बाद अनुलोम-विलोम करना अधिक लाभकारी माना गया है। यह कपालभाति से प्राप्त होने वाली ऊर्जा को संतुलित करता है और मन को स्थिर करता है।
4. भ्रामरी प्राणायाम
अनुलोम-विलोम के बाद भ्रामरी प्राणायाम का अभ्यास करें।
यह मानसिक तनाव को कम करता है और ध्यान के लिए मन को एकाग्र करता है। यह अभ्यास स्मरण शक्ति और श्रवण शक्ति को सुदृढ़ करता है।
5. भस्त्रिका प्राणायाम (यदि सर्दी का मौसम हो)
यदि सर्दी का मौसम हो, तो भस्त्रिका प्राणायाम का अभ्यास किया जा सकता है।
यह शरीर में ऊष्मा उत्पन्न करता है और श्वसन तंत्र को सशक्त बनाता है। रक्तचाप को संतुलित करता है। यह अभ्यास गर्मी के मौसम में नहीं करना चाहिए।
6. शीतली प्राणायाम (यदि गर्मी का मौसम हो)
गर्मी के मौसम में शीतली या शीतकारी प्राणायाम का अभ्यास करना लाभदायक होता है।
यह शरीर को शीतलता प्रदान करता है और पित्त दोष को शांत करता है। यह अभ्यास सर्दी के मौसम में नहीं करना चाहिए।
7. नाड़ी शोधन प्राणायाम
प्राणायाम अभ्यास के अंत में नाड़ी शोधन प्राणायाम का अभ्यास करें।
यह अभ्यास शरीर की प्राणिक नाड़ियों की शुद्धि करता है और श्वसन तंत्र को मजबूत करता है। इसका नियमित अभ्यास हृदय को स्वस्थ रखने में सहायक होता है।
सभी प्राणायाम पूरे करने के बाद कुछ देर श्वास को सामान्य करें।
प्राणायाम अभ्यास में सावधानियाँ
- प्राणायाम का अभ्यास अपनी श्वास-क्षमता के अनुसार करें
- नए अभ्यासी और कमजोर श्वसन वाले व्यक्ति सरल प्राणायाम से शुरुआत करें
- श्वास रोकने के लिए बल प्रयोग न करें
- श्वसन रोगी और हृदय रोगी प्राणायाम का अभ्यास न करें
- किसी भी असुविधा की स्थिति में अभ्यास तुरंत रोक दें
अभ्यास का तीसरा क्रम - ध्यान (Meditation)
आसन और प्राणायाम का अभ्यास करने के बाद ध्यान का अभ्यास अवश्य करना चाहिए। यह एकाग्रता और मानसिक शांति देने वाला अभ्यास है।
विधि
- पद्मासन या सुखासन की स्थिति में बैठें
- हाथों को घुटनों पर ज्ञान मुद्रा में तथा रीढ़ को सीधा रखें
- आँखें कोमलता से बंद करें
- ध्यान को श्वासों पर केंद्रित करें
- आती-जाती सांस को अनुभव करें
- कुछ देर बाद ध्यान को आज्ञा चक्र में केंद्रित करें (माथे के बीच में आज्ञा चक्र की स्थिति है)
- इसके बाद कुछ देर निर्विचार (बिना किसी विचार के) स्थित में रुकें
- धीरे धीरे ध्यान अवस्था से वापस आ जाएं।
लेख का सारांश
योग का अभ्यास सही क्रम से किया जाना चाहिए। सही विधि व सही क्रम से किया गया अभ्यास लाभदायी होता है। इस क्रम में पहले आसन का अभ्यास करना चाहिए। आसन के बाद प्राणायाम और अंत में ध्यान का अभ्यास करें।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1. योग अभ्यास का सही क्रम क्या है?
उत्तर – योग अभ्यास का सही क्रम पहले आसन, उसके बाद प्राणायाम और अंत में ध्यान (Meditation) का अभ्यास करना चाहिए। पतंजलि योगसूत्र के अनुसार भी आसन के बाद प्राणायाम और फिर ध्यान का क्रम बताया गया है। यही क्रम शरीर और मन के लिए अधिक लाभकारी होता है।
प्रश्न 2. योगाभ्यास में आसन का सही क्रम क्या है?
उत्तर – आसन का अभ्यास भी एक निश्चित क्रम में करना चाहिए। सही क्रम इस प्रकार है — खड़े होकर किए जाने वाले आसन, बैठकर किए जाने वाले आसन, पेट के बल लेटकर किए जाने वाले आसन, पीठ के बल लेटकर किए जाने वाले आसन और अंत में शवासन में विश्राम। इस क्रम से किया गया आसन अभ्यास शरीर को संतुलित रूप से लाभ पहुंचाता है।
प्रश्न 3. प्राणायाम का सही क्रम क्या है?
उत्तर – प्राणायाम का अभ्यास शांत अवस्था में और सही क्रम से करना चाहिए। सही क्रम इस प्रकार है — श्वास-प्रश्वास, कपालभाति प्राणायाम, अनुलोम-विलोम प्राणायाम, भ्रामरी प्राणायाम, भस्त्रिका प्राणायाम (यदि सर्दी का मौसम हो), शीतली या शीतकारी प्राणायाम (यदि गर्मी का मौसम हो) और नाड़ी शोधन प्राणायाम। अंत में श्वास को सामान्य करना चाहिए।
प्रश्न 4. योगाभ्यास में ध्यान (Meditation) का क्या महत्व है?
उत्तर – ध्यान योगाभ्यास का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण चरण है। आसन शरीर को स्वस्थ बनाते हैं, प्राणायाम श्वसन तंत्र को सशक्त करता है, और ध्यान मन को शांत व एकाग्र बनाता है। नियमित ध्यान अभ्यास मानसिक शांति, एकाग्रता और आत्म-संतुलन प्रदान करता है।
प्रश्न 5. योग का अभ्यास सही क्रम से क्यों करना चाहिए?
उत्तर – योग का अभ्यास सही क्रम से करने पर शरीर और मन दोनों को अधिक लाभ मिलता है। गलत क्रम से किया गया अभ्यास कभी-कभी हानिकारक भी हो सकता है। सही क्रम से अभ्यास करने से शरीर पर अनावश्यक दबाव नहीं पड़ता और योग का वास्तविक उद्देश्य प्राप्त होता है।
प्रश्न 6. क्या सभी लोग योग का अभ्यास कर सकते हैं?
उत्तर – सामान्य रूप से स्वस्थ व्यक्ति ही योग का अभ्यास कर सकते हैं, लेकिन किसी रोग, श्वसन समस्या या हृदय रोग की स्थिति में योग अभ्यास से पहले चिकित्सक या योग्य योग शिक्षक की सलाह लेना आवश्यक है। गंभीर रोगी को यह अभ्यास नहीं करना चाहिए।
प्रश्न 7. योग अभ्यास के बाद विश्राम क्यों आवश्यक है?
उत्तर – योग अभ्यास के बाद विश्राम करने से शरीर को अभ्यास के लाभ ग्रहण करने का अवसर मिलता है। विश्राम से श्वास सामान्य होती है और शरीर पुनः संतुलित अवस्था में आ जाता है।
Disclaimer
यह लेख किसी प्रकार के रोग का उपचार करने के लिए नहीं है। किसी प्रकार के रोग से पीड़ित होने पर योग का अभ्यास न करें और चिकित्सक की सलाह लें। हमारा उद्देश्य आम लोगों को योग के प्रति जागरूक करना है। लेख में बताए गए अभ्यास केवल स्वस्थ व्यक्तियों के लिए हैं। क्षमता से अधिक किया गया अभ्यास हानिकारक हो सकता है।
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