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आज के समय में स्वास्थ्य के लिए योग एक उत्तम विधि माना गया है। यह सरल व सुरक्षित है, और हर व्यक्ति अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार इसे कर सकता है। नियमित योगाभ्यास — विशेषकर आसनप्राणायाम — हृदय को स्वस्थ रखने में सहायक माना गया है, और हृदय रोग के जोखिम को भी कम कर सकता है। लेकिन हृदय रोग हो चुकने पर योगाभ्यास सावधानी से करना चाहिए — हर आसन-प्राणायाम हर हृदय-रोगी के लिए उपयुक्त नहीं होता, इसलिए चिकित्सक की सलाह अवश्य लें।

इस लेख में हृदय रोग की अवस्था — आरम्भिकगम्भीर — के अनुसार उपयुक्त व वर्जित योग-क्रियाओं की जानकारी दी गई है। साथ ही यह भी बताया गया है कि अभ्यास के दौरान किन चेतावनी-संकेतों पर रुकना चाहिए, और चिकित्सक से सलाह कब अनिवार्य है।

हृदय रोगी के लिए ताड़ आसन का सुरक्षित अभ्यास
ताड़ आसन: संतुलन बनाए रखते हुए किया जाने वाला सरल अभ्यास, हृदय रोगी के लिए लाभकारी होता है।

हृदय रोग में योग कैसे सहायक है?

योगाभ्यास में आसन शरीर के अंगों को सक्रिय रखते हैं तथा रक्त-संचार को व्यवस्थित करते हैं। प्राणायाम श्वसनतंत्र को सुदृढ़ करते हैं और तंत्रिका तंत्र को शांत रखकर रक्तचाप को संतुलित बनाए रखने में सहायक होते हैं। धीमी व सजग श्वास प्रक्रियाएं पैरासिम्पेथेटिक तंत्रिका तंत्र (शरीर के विश्राम तंत्र) को सक्रिय करती हैं, जिससे तनाव-हार्मोन कम होते हैं और हृदय-गति अधिक संतुलित रहती है।

यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि योग हृदय रोग का उपचार नहीं है। यह चिकित्सा उपचार का विकल्प नहीं, बल्कि एक पूरक (सहायक) अभ्यास है। नियमित व सही क्रम से किया गया योगाभ्यास हृदय रोग से बचाव के लिए सहायक तो हो सकता है, लेकिन रोग हो चुकने पर अभ्यास सावधानी से और रोग की अवस्था के अनुसार करना चाहिए।

हृदय रोग से प्रभावित व्यक्ति योगाभ्यास कैसे करें, यह जानने के लिए हम इस विषय को दो श्रेणियों में विभाजित करके समझेंगे :

  1. आरम्भिक रोगी
  2. गम्भीर रोगी

आइए आगे इन दोनों को विस्तार से समझ लेते हैं।

आरम्भिक अवस्था में योग

रोग की आरम्भिक अवस्था में योग सहायक हो सकता है। योगाभ्यास में आसन और प्राणायाम सरलता से, कम अवधि में और चिकित्सक की सलाह से करने चाहिए। चिकित्सक द्वारा बताई गई औषधि का सेवन बंद न करें और संतुलित आहार लें।

आसन की सावधानियां

हृदय रोग की आरम्भिक अवस्था में अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार आसन का अभ्यास करें और इन सावधानियों को ध्यान में रखें :

  • सरल आसन करें, तनाव वाले आसन न करें
  • रक्तचाप बढ़ाने वाले तथा तीव्र गति वाले आसन न करें
  • यदि कोई औषधि का सेवन कर रहे हैं, तो चिकित्सक की सलाह के बिना इसे बंद न करें
  • अपने योग प्रशिक्षक को अपने रोग के विषय में अवश्य सूचित करें
  • जो भी अभ्यास कर रहे हैं, उसके बारे में अपने चिकित्सक से सलाह अवश्य लें
  • यह हमेशा ध्यान रखें कि सरल आसन लाभकारी होते हैं, जबकि कठिन आसन हानिकारक भी हो सकते हैं

लाभकारी आसन

नियमित योगासन न केवल हृदय, बल्कि शरीर के अन्य अंगों को भी सक्रिय करते हैं। इनका अभ्यास शरीर की आवश्यकता के अनुसार और सही क्रम से करना चाहिए।

ताड़ आसन

योगा मैट पर सीधे खड़े होकर दोनों हाथों को ऊपर उठाएं और ऊपर की ओर खींचें। क्रिया पूरी करने के बाद हाथों को नीचे विश्राम-मुद्रा में ले आएं।

आसन की सावधानी: क्रिया करते समय शरीर का संतुलन बनाए रखें।

लाभ: रीढ़ को सीधा रखता है, सामान्य रक्त-संचार में सहायक होता है और आगे के अभ्यास के लिए शरीर को तैयार करता है।

सूर्य नमस्कार

बारह चरण में किया जाने वाला सूर्य नमस्कार एक बहुआयामी अभ्यास है, जिसमें आसन व श्वास दोनों शामिल हैं।

आसन की सावधानी: केवल धीमी, सरल व संशोधित (modified) विधि से करें; तीव्र गति व श्वास रोककर बार-बार दोहराने वाला पारम्परिक क्रम आरम्भिक हृदय-रोगी के लिए भी उपयुक्त नहीं है। गम्भीर हृदय-रोगी इसे बिल्कुल न करें।

तितली आसन

आरम्भिक हृदय-रोग-प्रभावित व्यक्तियों के लिए एक सरल अभ्यास है। दोनों घुटनों को मोड़कर पैरों के पंजों को मिलाएं, फिर घुटनों को ऊपर-नीचे हिलाएं।

आसन की सावधानी: घुटने मोड़ने में परेशानी हो तो इसे न करें।

लाभ: कूल्हों व जांघों की शिथिलता दूर करता है।

वज्रासन

घुटने मोड़कर वज्रासन पोज़ में बैठें। रीढ़ को सीधा रखें और दोनों हाथों को घुटनों पर रखें। क्षमता अनुसार कुछ देर इस पोज़ में बैठें।

आसन की सावधानी: पैर मोड़ने में परेशानी हो तो यह अभ्यास न करें।

लाभ: यह पाचन तंत्र को सुदृढ़ करने वाला और पैरों की मांसपेशियों को मजबूत करने वाला अभ्यास है।

भुजंगासन

पेट के बल लेटकर दोनों हाथों का सहारा लेकर धीरे-धीरे सीना ऊपर उठाएं, क्षमता अनुसार रुकने के बाद वापस आ जाएं।

आसन की सावधानी: भुजंगासन का अभ्यास रीढ़ और सर्वाइकल की परेशानी में नहीं करना चाहिए।

लाभ: छाती को विस्तार मिलता है, जो श्वसन-तंत्र, फेफड़ों व रीढ़ के लिए लाभकारी होता है।

मकर आसन

यह पेट के बल लेटकर किया जाने वाला विश्रामदायक आसन है। ठोड़ी को दोनों हाथों की हथेलियों पर टिकाएं और दोनों पैरों को क्रमशः ऊपर-नीचे की ओर गति दें।

आसन की सावधानी: पीठ दर्द और रीढ़ की परेशानी में यह अभ्यास नहीं करना चाहिए।

लाभ: रीढ़, कमर और पैरों के लिए लाभकारी होता है।

मर्कटासन

पीठ के बल लेटें, दोनों घुटनों को मोड़कर पैर ज़मीन पर रखें और दोनों हाथों को कंधों की सीध में फैलाएं। अब दोनों घुटनों को धीरे-धीरे एक तरफ झुकाएं और सिर को विपरीत दिशा में मोड़ें। कुछ देर रुकने के बाद वापस आएं और दूसरी तरफ दोहराएं।

आसन की सावधानी: झटके से न करें; रीढ़ या कमर में गम्भीर दर्द हो तो अत्यन्त सावधानी से करें।

लाभ: रीढ़ को लचीला बनाता है, कमर की जकड़न व तनाव कम करता है, तथा पाचन तंत्र को भी उत्तेजित करता है।

पवनमुक्तासन

मर्कटासन के बाद पवनमुक्तासन का अभ्यास करें। इसके लिए दोनों पैरों को मोड़ें, दोनों हाथों से घुटनों को पेट की ओर दबाएं और सिर को घुटनों के पास ले जाने का प्रयास करें। कुछ देर रुकने के बाद वापस आ जाएं, पैरों को सीधा करें।

आसन की सावधानी: पेट की परेशानी में यह अभ्यास सावधानी से करें; श्वास रोककर ज़ोर न लगाएं।

लाभ: इसका नियमित अभ्यास कब्ज व गैस की परेशानी में सहायक हो सकता है।

शवासन

सभी आसनों का अभ्यास करने के बाद शांत अवस्था में सीधे लेट जाएं, शरीर को ढीला छोड़ दें और कुछ देर विश्राम करें।

लाभ: सम्पूर्ण शरीर को विश्राम देता है, आसनों के तनाव को कम करता है।

हृदय रोगी के लिए वर्जित आसन

कुछ आसन हृदय-रोगियों के लिए सामान्यतः वर्जित हैं, विशेषकर गम्भीर रोगी इन्हें न करें :

  • शीर्षासन
  • सर्वांग आसन
  • हलासन
  • चक्रासन

आरम्भिक रोगी, यदि करना चाहें, तो केवल योग विशेषज्ञ के निर्देशन में, कम मात्रा में और चिकित्सक की सलाह से करें।

प्राणायाम की सावधानियां

प्राणायाम श्वास पर आधारित योग की एक महत्वपूर्ण क्रिया है। हृदय रोग से बचाव के लिए कुछ प्राणायाम विशेष रूप से सहायक माने गए हैं, लेकिन हृदय-रोग प्रभावित हो चुके व्यक्तियों को इन सावधानियों का ध्यान रखना चाहिए :

  • अपने श्वासों की स्थिति के अनुसार प्राणायाम करें, क्षमता से अधिक अभ्यास न करें
  • तीव्र गति वाले व रक्तचाप बढ़ाने वाले प्राणायाम न करें
  • सरल प्राणायाम करें, कम आवृत्तियां करें
  • श्वास की स्थिति ठीक न हो तो कुम्भक व बंध का प्रयोग न करें (श्वास को अन्दर या बाहर कुछ देर रोकना कुम्भक कहा गया है)
  • चिकित्सक की सलाह लेकर व औषधि जारी रखते हुए ही प्राणायाम करें
  • अपने योग प्रशिक्षक को अपने श्वास की स्थिति के बारे में सूचित करें

सरल प्राणायाम

श्वास-प्रश्वास — यह लम्बे-गहरे श्वास लेने व छोड़ने का अभ्यास है।

कपालभाति — इस अभ्यास में दोनों नासिकाओं से श्वास बलपूर्वक बाहर निकालें और सामान्य गति से श्वास भरें। आरम्भिक रोगी इसे अत्यन्त धीमी गति से, कम आवृत्तियों में करें।

अनुलोम विलोम प्राणायाम — इस अभ्यास में दाईं नासिका बंद करके बाईं तरफ से श्वास भरें, फिर बाईं नासिका बंद करके दाईं तरफ से श्वास छोड़ें, और इसी प्रकार दाईं नासिका से श्वास लेकर बाईं तरफ से श्वास बाहर निकालें। बिना श्वास रोके यह अभ्यास करें।

भ्रामरी प्राणायाम — यह मानसिक शांति देने वाला अभ्यास हृदय-रोगियों के लिए विशेष रूप से उपयुक्त माना जाता है।

वर्जित प्राणायाम

रक्तचाप बढ़ाने वाले प्राणायाम हृदय-रोगी के लिए वर्जित माने जाते हैं, विशेषकर गम्भीर रोगी इन्हें न करें :

  • भस्त्रिका प्राणायाम
  • सूर्यभेदी प्राणायाम
  • तीव्र गति से कपालभाति
  • कुम्भक सहित अभ्यास

आरम्भिक रोगी यदि इनका अभ्यास करना चाहें, तो योग प्रशिक्षक के निर्देशन में, धीमी गति से, कम आवृत्तियों में और चिकित्सक की अनुमति से ही करें।

गम्भीर अवस्था में योग

यदि हृदय रोग की गम्भीर स्थिति है, तो सामान्यतः योगासन व प्राणायाम नहीं करने चाहिए। ऐसी स्थिति में सूक्ष्म व अत्यन्त हल्की क्रियाएं ही उपयुक्त हैं, और वह भी चिकित्सक की स्पष्ट अनुमति से।

सूक्ष्म आसन व टहलना

  • पूर्ण अवस्था वाले और कठिन आसन वर्जित हैं
  • सूक्ष्म आसन करें (खड़े होकर या बैठकर हाथ-पैरों व जोड़ों की हल्की मूवमेंट)
  • धीरे-धीरे पैदल टहलना उत्तम है
  • टहलने या सूक्ष्म आसन के बाद लेटकर कुछ देर विश्राम करें

सरल श्वसन अभ्यास

पूर्ण-प्राणायाम वर्जित हैं। चिकित्सक की अनुमति से केवल ये अत्यन्त सरल श्वसन-अभ्यास किए जा सकते हैं :

  • श्वास-प्रश्वास — दोनों नासिकाओं से लम्बा-गहरा श्वास भरें और खाली करें। तीन-चार श्वासों में या आवश्यकता अनुसार अभ्यास करें।
  • अनुलोम विलोम — बाईं नासिका से श्वास भरकर दाईं से छोड़ें, फिर दाईं से भरकर बाईं से छोड़ें। यह एक आवृत्ति हुई, क्षमता अनुसार अन्य आवृत्तियां करें।

अभ्यास के दौरान चेतावनी संकेत — कब रुकें?

योगाभ्यास के दौरान निम्न में से कोई भी संकेत महसूस हो तो तुरंत अभ्यास रोककर विश्राम करें और चिकित्सक से सम्पर्क करें :

  • सीने में दर्द, भारीपन या जकड़न
  • सांस फूलना या सांस लेने में असहजता जिससे बोलना मुश्किल हो
  • चक्कर आना या सिर हल्का महसूस होना
  • धड़कन का असामान्य रूप से तेज़, धीमा या अनियमित होना
  • हाथ, कंधे, जबड़े या गर्दन में अचानक दर्द फैलना
  • अत्यधिक पसीना, कमजोरी या ठंडा पसीना आना

इन लक्षणों को नज़रअंदाज़ न करें — ये संकेत बताते हैं कि वर्तमान क्रिया की तीव्रता शरीर के लिए अभी उपयुक्त नहीं है।

चिकित्सक से सलाह कब अनिवार्य है?

निम्न स्थितियों में योगाभ्यास शुरू करने या जारी रखने से पहले चिकित्सक की सलाह लेना अनिवार्य है :

  • हाल ही में हृदयाघात (हार्ट अटैक) हुआ हो
  • हाल ही में हृदय की सर्जरी हुई हो
  • सीने में दर्द या सांस लेने में तकलीफ लगातार बनी रहती हो
  • रक्तचाप अनियंत्रित हो
  • कोई नई प्राणायाम या आसन क्रिया शुरू करनी हो

सामान्य निर्देश

योगाभ्यास स्वस्थ व्यक्तियों के लिए है। यह हृदय रोगों से बचाव में सहायक होता है, लेकिन रोग से प्रभावित व्यक्तियों को इन निर्देशों का पालन करना चाहिए :

  1. चिकित्सक द्वारा बताई गई औषधि लेते रहें
  2. संतुलित आहार लें
  3. योग-क्रिया अपनी क्षमता से अधिक न करें
  4. प्रशिक्षक के निर्देशन में अभ्यास करें
  5. चिकित्सक से नियमित सलाह लेते रहें

सारांश

योग हृदय के लिए एक सहायक अभ्यास है, लेकिन यह चिकित्सा उपचार का विकल्प नहीं है। हृदय रोग से प्रभावित व्यक्ति अपनी अवस्था — आरम्भिक या गम्भीर — के अनुसार ही आसन-प्राणायाम चुनें। चेतावनी संकेतों पर ध्यान दें और असावधानी से अभ्यास न करें। सही मार्गदर्शन व चिकित्सकीय निगरानी में किया गया अभ्यास ही सुरक्षित व लाभदायी होता है।

प्राय: पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

हृदय रोगी के लिए कौन से आसन वर्जित हैं?

शीर्षासन, सर्वांग आसन, हलासन और चक्रासन हृदय-रोगियों के लिए सामान्यतः वर्जित हैं, विशेषकर गम्भीर अवस्था में।

हृदय रोगी योगाभ्यास के दौरान कब रुक जाएं?

सीने में दर्द, सांस फूलना, चक्कर आना या धड़कन असामान्य होने पर तुरंत अभ्यास रोककर चिकित्सक से सम्पर्क करें।

गम्भीर हृदय रोगी को योगाभ्यास करना चाहिए या नहीं?

गम्भीर हृदय रोगी को कठिन आसन या आसन की पूर्ण अवस्था में नहीं जाना चाहिए। प्राणायाम में श्वास रोकने वाले अभ्यास भी नहीं करने चाहिए। चिकित्सक की अनुमति से केवल सूक्ष्म आसन व हल्का श्वसन-अभ्यास किया जा सकता है।

हृदय रोगी के लिए कुम्भक (श्वास रोकना) सुरक्षित है क्या?

सामान्यतः नहीं — कुम्भक रक्तचाप बढ़ा सकता है, इसलिए हृदय-रोगी को यह अभ्यास नहीं करना चाहिए।

Disclaimer : यह लेख किसी प्रकार के रोग का उपचार करने का दावा नहीं करता है। इस लेख का उद्देश्य योग की लाभ-हानि व सावधानियों की जानकारी देना है। कोई भी योग क्रिया करने से पहले अपने चिकित्सक से सलाह अवश्य लें। गम्भीर रोगी तथा अधिक वृद्ध व्यक्ति चिकित्सकीय अनुमति के बिना योगाभ्यास न करें।

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