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महर्षि पतंजलि द्वारा प्रतिपादित योगसूत्र भारतीय योग-दर्शन का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इसमें योग के स्वरूप, चित्त, चित्तवृत्तियों, अभ्यास, वैराग्य, समाधि, ईश्वर, ध्यान और कैवल्य जैसे विषयों को अत्यंत संक्षिप्त सूत्रों में प्रस्तुत किया गया है।

पातञ्जल योगदर्शन चार पादों (अध्याय या Chapter) में विभाजित है: समाधि पाद, साधन पाद, विभूति पाद और कैवल्य पाद। प्रत्येक पाद योग के अलग-अलग पक्ष को समझाता है। प्रस्तुत लेख में साधन पाद (द्वितीय पाद) का वर्णन किया गया है। प्रथम पाद का वर्णन समाधि पाद में किया जा चुका है। शेष दो पादों का वर्णन क्रमशः अलग-अलग लेखों में किया जा रहा है: विभूति पाद और कैवल्य पाद।

इसमें साधन पाद के सभी 55 सूत्र हिंदी अर्थ सहित दिए गए हैं। साधन पाद योग-साधना के व्यावहारिक उपायों का पाद है। इसमें क्रियायोग और अष्टांग योग के साथ क्लेश, कर्म, दुःख, द्रष्टा-दृश्य संयोग और विवेकख्याति जैसे दार्शनिक विषयों का भी वर्णन मिलता है। इसका आरंभ “तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः” से होता है और अंत “ततः परमा वश्यतेन्द्रियाणाम्” से। प्रत्येक सूत्र के साथ मूल संस्कृत, सरल हिंदी अनुवाद और भावार्थ दिया गया है, ताकि सामान्य हिंदी पाठक भी योगसूत्र के विचारों को समझ सकें।

सूत्र-संख्या “पाद.सूत्र” रूप में दी गई है; जैसे 2.1 का अर्थ है दूसरे पाद का पहला सूत्र।

नदी के किनारे चट्टान पर सुखासन और चिन मुद्रा में ध्यान करती योग अभ्यासी
नदी तट पर शांत बैठी योग अभ्यासी: योगसूत्र के अनुसार आसन स्थिर और सुखपूर्ण होना चाहिए (सूत्र 2.46)।

विषय सूची

क्रियायोग और पाँच क्लेश (सूत्र 2.1 से 2.9)

2.1 क्रियायोग 2.2 क्रियायोग का उद्देश्य 2.3 पाँच क्लेश 2.4 अविद्या: क्लेशों की भूमि 2.5 अविद्या का स्वरूप 2.6 अस्मिता 2.7 राग 2.8 द्वेष 2.9 अभिनिवेश

क्लेश-निवारण, कर्माशय और दुःख (सूत्र 2.10 से 2.16)

2.10 सूक्ष्म क्लेशों का निवारण 2.11 वृत्तियों का ध्यान से निवारण 2.12 कर्माशय 2.13 कर्म के तीन फल 2.14 सुख-दुःख रूपी फल 2.15 विवेकी के लिए सब दुःख 2.16 भावी दुःख से बचाव

द्रष्टा, दृश्य और कैवल्य (सूत्र 2.17 से 2.25)

2.17 दुःख का कारण: द्रष्टा-दृश्य संयोग 2.18 दृश्य का स्वरूप 2.19 गुणों की अवस्थाएँ 2.20 द्रष्टा का स्वरूप 2.21 दृश्य का प्रयोजन 2.22 मुक्त पुरुष के लिए दृश्य 2.23 संयोग का प्रयोजन 2.24 संयोग का कारण 2.25 हान और कैवल्य

विवेकख्याति और अष्टांग योग (सूत्र 2.26 से 2.29)

2.26 विवेकख्याति 2.27 सात प्रकार की प्रज्ञा 2.28 योगांग और ज्ञान की दीप्ति 2.29 अष्टांग योग

यम और नियम (सूत्र 2.30 से 2.34)

2.30 पाँच यम 2.31 सार्वभौम महाव्रत 2.32 पाँच नियम 2.33 विरोधी विचारों का निवारण 2.34 वितर्कों का स्वरूप

यम-नियम के फल (सूत्र 2.35 से 2.45)

2.35 अहिंसा का फल 2.36 सत्य का फल 2.37 अस्तेय का फल 2.38 ब्रह्मचर्य का फल 2.39 अपरिग्रह का फल 2.40 शौच का बाह्य फल 2.41 शौच का आंतरिक फल 2.42 संतोष का फल 2.43 तप का फल 2.44 स्वाध्याय का फल 2.45 ईश्वर-प्रणिधान का फल

आसन (सूत्र 2.46 से 2.48)

2.46 आसन 2.47 आसन सिद्धि के उपाय 2.48 आसन का फल

प्राणायाम और प्रत्याहार (सूत्र 2.49 से 2.55)

2.49 प्राणायाम 2.50 प्राणायाम के भेद 2.51 चतुर्थ प्राणायाम 2.52 प्राणायाम का फल 2.53 धारणा की योग्यता 2.54 प्रत्याहार 2.55 इंद्रियों की वश्यता

सार और प्रश्न

साधन पाद का संक्षिप्त सार अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्रियायोग और पाँच क्लेश (सूत्र 2.1 से 2.9)

सूत्र 2.1: क्रियायोग

तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः ॥ १ ॥

हिंदी अनुवाद: तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान क्रियायोग हैं।

सरल भावार्थ: साधन पाद का आरंभ अभ्यास से होता है। तप का अर्थ है शरीर और मन को अनुशासित रखना। स्वाध्याय का अर्थ है योग-शास्त्रों का अध्ययन और स्वयं का निरीक्षण। ईश्वर-प्रणिधान का अर्थ है अपने कर्मों को अहंकार छोड़कर ईश्वर को समर्पित करने का भाव। इन तीनों को मिलाकर क्रियायोग कहा गया है, जो साधक को योग के मार्ग पर चलने योग्य बनाता है।

सूत्र 2.2: क्रियायोग का उद्देश्य

समाधिभावनार्थः क्लेशतनूकरणार्थश्च ॥ २ ॥

हिंदी अनुवाद: वह क्रियायोग समाधि की सिद्धि के लिए और क्लेशों को क्षीण करने के लिए है।

सरल भावार्थ: क्रियायोग के दो प्रयोजन बताए गए हैं। पहला, चित्त को समाधि के योग्य बनाना। दूसरा, मन में पहले से जमे क्लेशों को धीरे-धीरे कमजोर करना। जब तक क्लेश प्रबल रहते हैं, तब तक चित्त स्थिर नहीं हो पाता। इसलिए पहले उन्हें क्षीण करने का अभ्यास आवश्यक माना गया है।

सूत्र 2.3: पाँच क्लेश

अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः ॥ ३ ॥

हिंदी अनुवाद: अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश, ये पाँच क्लेश हैं।

सरल भावार्थ: क्लेश वे मानसिक कारण हैं जो मनुष्य को दुःख और बंधन में रखते हैं। पतंजलि ने इनके पाँच नाम बताए हैं। आगे के सूत्रों में इन्हीं पाँचों को एक-एक करके समझाया गया है।

पतंजलि योगसूत्र के पाँच क्लेश: अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश, सूत्र संख्या सहित
पाँच क्लेश: अविद्या शेष चारों क्लेशों की भूमि है (सूत्र 2.3 से 2.9)।

सूत्र 2.4: अविद्या: क्लेशों की भूमि

अविद्या क्षेत्रमुत्तरेषां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम् ॥ ४ ॥

हिंदी अनुवाद: अविद्या आगे के चारों क्लेशों की उत्पत्ति-भूमि है। वे क्लेश प्रसुप्त, तनु, विच्छिन्न या उदार अवस्था में रहते हैं।

सरल भावार्थ: जैसे खेत में बीज उगते हैं, वैसे ही अविद्या की भूमि में शेष चारों क्लेश पनपते हैं। ये क्लेश हमेशा एक जैसे दिखाई नहीं देते। कभी वे सुप्त रहते हैं, कभी कमजोर हो जाते हैं, कभी दूसरे क्लेश से दब जाते हैं और कभी पूरी तीव्रता से प्रकट हो जाते हैं।

सूत्र 2.5: अविद्या का स्वरूप

अनित्याशुचिदुःखानात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या ॥ ५ ॥

हिंदी अनुवाद: अनित्य में नित्य, अपवित्र में पवित्र, दुःख में सुख और अनात्म में आत्म की बुद्धि रखना अविद्या है।

सरल भावार्थ: अविद्या केवल जानकारी का अभाव नहीं, बल्कि वस्तु के वास्तविक स्वरूप के विपरीत ज्ञान है। अनित्य को नित्य, अशुचि को शुचि, दुःख को सुख और अनात्म को आत्म मान लेना अविद्या है। उदाहरण के लिए, नश्वर शरीर को ही अपना वास्तविक स्वरूप समझ लेना।

सूत्र 2.6: अस्मिता

दृग्दर्शनशक्त्योरेकात्मतेवास्मिता ॥ ६ ॥

हिंदी अनुवाद: द्रष्टा की शक्ति और दर्शन के साधन (बुद्धि) का मानो एक ही स्वरूप हो जाना अस्मिता है।

सरल भावार्थ: द्रष्टा की चेतन शक्ति (दृक्-शक्ति) और बुद्धि की दर्शन-शक्ति वास्तव में अलग हैं। दोनों को एक ही समझ लेना अस्मिता है।

सूत्र 2.7: राग

सुखानुशयी रागः ॥ ७ ॥

हिंदी अनुवाद: सुख के अनुभव के पीछे रहने वाली तृष्णा राग है।

सरल भावार्थ: किसी वस्तु या अनुभव से सुख मिलने पर मन में उसे बार-बार पाने की इच्छा बनी रहती है। यही आसक्ति राग कहलाती है। यह मन को विषयों से बाँधे रखती है।

सूत्र 2.8: द्वेष

दुःखानुशयी द्वेषः ॥ ८ ॥

हिंदी अनुवाद: दुःख के अनुभव के पीछे रहने वाला विरोध-भाव द्वेष है।

सरल भावार्थ: जिस वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति से दुःख मिला हो, उसके प्रति मन में जो घृणा या विरोध बैठ जाता है, वह द्वेष है। राग और द्वेष दोनों चित्त को शांत नहीं रहने देते।

सूत्र 2.9: अभिनिवेश

स्वरसवाही विदुषोऽपि तथारूढोऽभिनिवेशः ॥ ९ ॥

हिंदी अनुवाद: अपने स्वभाव से चलने वाला और विद्वानों में भी समान रूप से जमा हुआ जीवन से चिपके रहने का भाव अभिनिवेश है।

सरल भावार्थ: जीवन के प्रति गहरी आसक्ति और मृत्यु के भय से जुड़ा यह क्लेश अपने स्वभाव से चलता रहता है और विद्वान व्यक्ति में भी संस्कार रूप में पाया जाता है।

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क्लेश-निवारण, कर्माशय और दुःख (सूत्र 2.10 से 2.16)

सूत्र 2.10: सूक्ष्म क्लेशों का निवारण

ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः ॥ १० ॥

हिंदी अनुवाद: वे सूक्ष्म क्लेश चित्त के अपने कारण में लीन हो जाने पर नष्ट होते हैं।

सरल भावार्थ: प्रतिप्रसव का अर्थ है कार्य का अपने कारण में लीन हो जाना। जब क्लेश बहुत सूक्ष्म अवस्था में रह जाते हैं, तब वे चित्त के अपने कारण में लीन होने पर ही नष्ट होते हैं। यह उच्च साधना की अवस्था है।

सूत्र 2.11: वृत्तियों का ध्यान से निवारण

ध्यानहेयास्तद्वृत्तयः ॥ ११ ॥

हिंदी अनुवाद: उन क्लेशों की स्थूल वृत्तियाँ ध्यान से नष्ट होती हैं।

सरल भावार्थ: जब क्लेश स्थूल रूप में चित्त की वृत्तियों के रूप में प्रकट होते हैं, तब ध्यान के द्वारा उनका निरोध किया जाता है। नियमित ध्यान से इनकी तीव्रता धीरे-धीरे घटती है।

सूत्र 2.12: कर्माशय

क्लेशमूलः कर्माशयो दृष्टादृष्टजन्मवेदनीयः ॥ १२ ॥

हिंदी अनुवाद: कर्मों का संचय क्लेशों पर आधारित है और वह इस जन्म तथा आगामी जन्म में भोगा जाता है।

सरल भावार्थ: हम जो कर्म करते हैं, उनके संस्कार चित्त में जमा होते रहते हैं। इस संचय को कर्माशय कहा गया है। इसकी जड़ में क्लेश होते हैं। इसका फल कभी इसी जीवन में मिलता है और कभी आगे के जीवन में।

सूत्र 2.13: कर्म के तीन फल

सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगाः ॥ १३ ॥

हिंदी अनुवाद: क्लेशरूपी मूल के रहने पर कर्म का फल जन्म, आयु और भोग के रूप में मिलता है।

सरल भावार्थ: जब तक क्लेश बने रहते हैं, तब तक कर्मों का फल तीन रूपों में प्रकट होता है: किस प्रकार का जन्म मिलेगा, कितनी आयु होगी और जीवन में कैसे सुख-दुःख का अनुभव होगा।

सूत्र 2.14: सुख-दुःख रूपी फल

ते ह्लादपरितापफलाः पुण्यापुण्यहेतुत्वात् ॥ १४ ॥

हिंदी अनुवाद: पुण्य और अपुण्य के कारण वे फल सुख और दुःख देने वाले होते हैं।

सरल भावार्थ: शुभ कर्मों से सुख और अशुभ कर्मों से दुःख का अनुभव होता है। यहाँ कर्म और फल के सिद्धांत को सरल रूप में बताया गया है।

सूत्र 2.15: विवेकी के लिए सब दुःख

परिणामतापसंस्कारदुःखैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च दुःखमेव सर्वं विवेकिनः ॥ १५ ॥

हिंदी अनुवाद: परिणाम, ताप और संस्कार के दुःख तथा गुणों की वृत्तियों के विरोध के कारण विवेकी के लिए सब कुछ दुःख ही है।

सरल भावार्थ: विवेकशील साधक देखता है कि सांसारिक सुख भी स्थायी नहीं हैं। सुख बदल जाता है, उसे खोने का भय रहता है, उसके संस्कार नई इच्छाएँ जगाते हैं और मन के गुण आपस में टकराते रहते हैं। इसलिए सूक्ष्म दृष्टि से सुख भी दुःख से मुक्त नहीं होता।

सूत्र 2.16: भावी दुःख से बचाव

हेयं दुःखमनागतम् ॥ १६ ॥

हिंदी अनुवाद: जो दुःख अभी आया नहीं है, वही त्यागने योग्य है।

सरल भावार्थ: बीता हुआ दुःख बदला नहीं जा सकता और वर्तमान दुःख भोगना पड़ता है। इसलिए योग का प्रयास आने वाले दुःख को रोकने की ओर है। यह सूत्र योग को भविष्य के बंधन से मुक्ति का उपाय बताता है।

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द्रष्टा, दृश्य और कैवल्य (सूत्र 2.17 से 2.25)

सूत्र 2.17: दुःख का कारण: द्रष्टा-दृश्य संयोग

द्रष्टृदृश्ययोः संयोगो हेयहेतुः ॥ १७ ॥

हिंदी अनुवाद: द्रष्टा और दृश्य का संयोग त्यागने योग्य दुःख का कारण है।

सरल भावार्थ: द्रष्टा अर्थात् चेतन पुरुष और दृश्य अर्थात् प्रकृति तथा उसके विषय। जब चेतन स्वयं को दृश्य से जुड़ा हुआ मान लेता है, तब दुःख उत्पन्न होता है। योग का लक्ष्य इसी भ्रमपूर्ण संबंध को समझकर समाप्त करना है।

सूत्र 2.18: दृश्य का स्वरूप

प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मकं भोगापवर्गार्थं दृश्यम् ॥ १८ ॥

हिंदी अनुवाद: दृश्य प्रकाश, क्रिया और स्थिति के स्वभाव वाला है, भूत और इंद्रियों से बना है तथा भोग और मोक्ष के प्रयोजन के लिए है।

सरल भावार्थ: प्रकृति में तीन गुण हैं। सत्त्व का स्वभाव प्रकाश, रजस् का क्रियाशीलता और तमस् का स्थिति या जड़ता से संबंधित है। इन्हीं से पंचभूत और इंद्रियाँ बनती हैं। इसका प्रयोजन पुरुष को अनुभव कराना और अंत में उसे मुक्ति की ओर ले जाना है।

सूत्र 2.19: गुणों की अवस्थाएँ

विशेषाविशेषलिङ्गमात्रालिङ्गानि गुणपर्वाणि ॥ १९ ॥

हिंदी अनुवाद: विशेष, अविशेष, लिङ्गमात्र और अलिङ्ग, ये गुणों के चार स्तर हैं।

सरल भावार्थ: इन चार अवस्थाओं के माध्यम से प्रकृति के स्थूल से सूक्ष्म रूपों को समझाया गया है। सबसे स्थूल स्तर विशेष है और सबसे सूक्ष्म अव्यक्त अलिङ्ग है।

सूत्र 2.20: द्रष्टा का स्वरूप

द्रष्टा दृशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः ॥ २० ॥

हिंदी अनुवाद: द्रष्टा केवल चेतनामात्र और शुद्ध है, फिर भी बुद्धि के अनुभवों के अनुसार देखने वाला प्रतीत होता है।

सरल भावार्थ: पुरुष शुद्ध चेतना है और स्वयं किसी विकार से प्रभावित नहीं होता। बुद्धि में उत्पन्न प्रत्ययों को देखने के कारण ऐसा प्रतीत होता है कि सुख-दुःख का अनुभव द्रष्टा ही कर रहा है।

सूत्र 2.21: दृश्य का प्रयोजन

तदर्थ एव दृश्यस्यात्मा ॥ २१ ॥

हिंदी अनुवाद: दृश्य का अस्तित्व केवल उसी द्रष्टा के प्रयोजन के लिए है।

सरल भावार्थ: प्रकृति अपने लिए नहीं, पुरुष के अनुभव और मुक्ति के लिए कार्य करती है। जगत का पूरा प्रवाह द्रष्टा के भोग और अंततः अपवर्ग के लिए है।

सूत्र 2.22: मुक्त पुरुष के लिए दृश्य

कृतार्थं प्रति नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारणत्वात् ॥ २२ ॥

हिंदी अनुवाद: जिसका प्रयोजन पूर्ण हो चुका है, उसके लिए दृश्य नष्ट होकर भी नष्ट नहीं होता, क्योंकि वह अन्य पुरुषों के लिए समान रूप से बना रहता है।

सरल भावार्थ: जो साधक कैवल्य प्राप्त कर लेता है, उसके लिए प्रकृति का बंधनकारी प्रभाव समाप्त हो जाता है। परंतु जगत समाप्त नहीं होता, क्योंकि वह अन्य जीवों के अनुभव के लिए बना रहता है।

सूत्र 2.23: संयोग का प्रयोजन

स्वस्वामिशक्त्योः स्वरूपोपलब्धिहेतुः संयोगः ॥ २३ ॥

हिंदी अनुवाद: स्व अर्थात् दृश्य (प्रकृति) की शक्ति और स्वामी अर्थात् द्रष्टा (पुरुष) की शक्ति, दोनों के वास्तविक स्वरूप की उपलब्धि का कारण उनका संयोग है।

सरल भावार्थ: पुरुष द्रष्टा है और प्रकृति दृश्य। दोनों के संबंध से अनुभव और विवेक की प्रक्रिया चलती है, जिसके अंत में पुरुष अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानता है।

सूत्र 2.24: संयोग का कारण

तस्य हेतुरविद्या ॥ २४ ॥

हिंदी अनुवाद: उस संयोग का कारण अविद्या है।

सरल भावार्थ: पुरुष और प्रकृति के बीच बंधन का मूल कारण अविद्या, अर्थात् वास्तविक स्वरूप का अज्ञान है। यही अज्ञान चेतन को दृश्य से जोड़े रखता है।

सूत्र 2.25: हान और कैवल्य

तदभावात्संयोगाभावो हानं तद्दृशेः कैवल्यम् ॥ २५ ॥

हिंदी अनुवाद: अविद्या के अभाव से संयोग का अभाव होता है। यही हान है और यही द्रष्टा का कैवल्य है।

सरल भावार्थ: जब अविद्या समाप्त होती है, तब चेतन और दृश्य का भ्रमपूर्ण संबंध टूट जाता है। इस मुक्त अवस्था को कैवल्य कहा जाता है, जिसमें द्रष्टा अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित रहता है।

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विवेकख्याति और अष्टांग योग (सूत्र 2.26 से 2.29)

सूत्र 2.26: विवेकख्याति

विवेकख्यातिरविप्लवा हानोपायः ॥ २६ ॥

हिंदी अनुवाद: अखंड विवेकख्याति दुःख के त्याग का उपाय है।

सरल भावार्थ: पुरुष और प्रकृति के भेद का स्पष्ट और निरंतर ज्ञान विवेकख्याति है। जब यह ज्ञान बिना टूटे स्थिर रहता है, तब अविद्या का नाश होता है।

सूत्र 2.27: सात प्रकार की प्रज्ञा

तस्य सप्तधा प्रान्तभूमिः प्रज्ञा ॥ २७ ॥

हिंदी अनुवाद: उस साधक की प्रज्ञा अंतिम अवस्था में सात प्रकार की होती है।

सरल भावार्थ: विवेकख्याति की परिपक्व अवस्था में प्रज्ञा की सात प्रकार की अंतिम अवस्थाएँ बताई गई हैं। इनके विस्तृत अर्थ की व्याख्या परंपरागत भाष्यों में अलग-अलग ढंग से की गई है।

सूत्र 2.28: योगांग और ज्ञान की दीप्ति

योगाङ्गानुष्ठानादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः ॥ २८ ॥

हिंदी अनुवाद: योग के अंगों के अनुष्ठान से अशुद्धि का क्षय होता है और विवेकख्याति तक ज्ञान का प्रकाश बढ़ता जाता है।

सरल भावार्थ: योग के अंग मन और शरीर की अशुद्धियों को धीरे-धीरे दूर करते हैं। जैसे-जैसे अशुद्धि घटती है, वैसे-वैसे ज्ञान का प्रकाश बढ़ता है और अंत में विवेकख्याति तक पहुँचता है।

सूत्र 2.29: अष्टांग योग

यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टावङ्गानि ॥ २९ ॥

हिंदी अनुवाद: यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि, ये आठ योग के अंग हैं।

सरल भावार्थ: पतंजलि ने योग-साधना को आठ क्रमबद्ध अंगों में बाँटा है। इसी कारण इसे अष्टांग योग कहा जाता है। साधन पाद में इनमें से पहले पाँच अंगों का वर्णन है। धारणा, ध्यान और समाधि का वर्णन आगे के पाद, अर्थात् विभूति पाद, में आता है।

अष्टांग योग के आठ अंग सूत्र संख्या सहित
अष्टांग योग के आठ अंग: पहले पाँच का वर्णन साधन पाद में है और अंतिम तीन का विभूति पाद में।

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यम और नियम (सूत्र 2.30 से 2.34)

सूत्र 2.30: पाँच यम

अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः ॥ ३० ॥

हिंदी अनुवाद: अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह, ये पाँच यम हैं।

सरल भावार्थ: यम योग का पहला अंग है और इसका संबंध दूसरों तथा समाज के प्रति हमारे आचरण से है। इसमें किसी को पीड़ा न देना, सत्य बोलना, चोरी न करना, संयम रखना और आवश्यकता से अधिक संग्रह न करना शामिल है।

सूत्र 2.31: सार्वभौम महाव्रत

जातिदेशकालसमयानवच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम् ॥ ३१ ॥

हिंदी अनुवाद: जाति, देश, काल और समय की सीमा से बँधे न होने वाले सार्वभौम यम महाव्रत कहलाते हैं।

सरल भावार्थ: "अवच्छिन्न" का अर्थ है किसी सीमा से बँधा हुआ। जब यम का पालन किसी सीमा के भीतर किया जाए, तब वह साधारण व्रत रहता है। जब वह सभी सीमाओं से मुक्त हो जाए, तब वह महाव्रत बनता है। नीचे दिए गए उदाहरण पारंपरिक व्यासभाष्य की व्याख्या पर आधारित हैं; ये मूल सूत्र का हिस्सा नहीं हैं। इनमें अहिंसा के उदाहरण से चारों सीमाएँ समझाई जाती हैं:

  • जाति-अवच्छिन्न: हिंसा केवल कुछ प्राणियों की जाति तक सीमित रखना, जैसे यह मानना कि "मैं केवल मछलियों की हिंसा करूँगा, अन्य प्राणियों की नहीं।"
  • देश-अवच्छिन्न: किसी स्थान तक सीमित अहिंसा, जैसे "मैं तीर्थ में हिंसा नहीं करूँगा।"
  • काल-अवच्छिन्न: किसी विशेष दिन या तिथि तक सीमित अहिंसा, जैसे "मैं चतुर्दशी के दिन हिंसा नहीं करूँगा।"
  • समय-अवच्छिन्न: किसी विशेष अवसर या प्रयोजन तक सीमित अहिंसा, जैसे "मैं देवता या ब्राह्मण के प्रयोजन के अतिरिक्त हिंसा नहीं करूँगा।"

जब अहिंसा, सत्य आदि यम इन चारों सीमाओं से मुक्त होकर सभी प्राणियों, सभी स्थानों, सभी समयों और सभी परिस्थितियों में समान रूप से पाले जाते हैं, तब उन्हें सार्वभौम महाव्रत कहा जाता है।

सूत्र 2.32: पाँच नियम

शौचसन्तोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः ॥ ३२ ॥

हिंदी अनुवाद: शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान, ये पाँच नियम हैं।

सरल भावार्थ: नियम योग का दूसरा अंग है और इसका संबंध साधक के अपने जीवन-अनुशासन से है। इसमें शरीर और मन की शुद्धता, जो प्राप्त है उसमें संतोष, तप, शास्त्र-अध्ययन और ईश्वर के प्रति समर्पण आते हैं।

सूत्र 2.33: विरोधी विचारों का निवारण

वितर्कबाधने प्रतिपक्षभावनम् ॥ ३३ ॥

हिंदी अनुवाद: जब हिंसा आदि विरोधी विचार यम-नियम के पालन में बाधा डालें, तब उनके विपरीत भाव का चिंतन करना चाहिए।

सरल भावार्थ: साधना में कई बार क्रोध, लोभ या हानि पहुँचाने जैसे विचार मन में उठते हैं। ऐसे समय उनसे लड़ने के बजाय उनके विपरीत सकारात्मक भाव पर मन को टिकाना उपाय बताया गया है। इसे प्रतिपक्ष भावना कहते हैं।

सूत्र 2.34: वितर्कों का स्वरूप

वितर्का हिंसादयः कृतकारितानुमोदिता लोभक्रोधमोहपूर्वका मृदुमध्याधिमात्रा दुःखाज्ञानानन्तफला इति प्रतिपक्षभावनम् ॥ ३४ ॥

हिंदी अनुवाद: हिंसा आदि वितर्क स्वयं किए गए, दूसरों से करवाए गए या अनुमोदित हो सकते हैं। ये लोभ, क्रोध और मोह से उत्पन्न होते हैं, तथा मृदु, मध्यम और तीव्र हो सकते हैं। इनके फल अनंत दुःख और अज्ञान हैं। ऐसा चिंतन करना ही प्रतिपक्ष भावना है।

सरल भावार्थ: यहाँ बताया गया है कि हिंसा जैसे बुरे विचार या कर्म तीन तरह से हो सकते हैं: स्वयं करना, किसी से करवाना या किसी के किए का समर्थन करना। इनके पीछे लोभ, क्रोध या मोह होता है। इनकी तीव्रता कम, मध्यम या अधिक हो सकती है। जब साधक यह समझ लेता है कि इनका फल केवल दुःख और अज्ञान है, तब इन विचारों से हटना सरल हो जाता है।

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यम-नियम के फल (सूत्र 2.35 से 2.45)

सूत्र 2.35: अहिंसा का फल

अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः ॥ ३५ ॥

हिंदी अनुवाद: अहिंसा में दृढ़ स्थिति हो जाने पर उसके समीप सभी प्राणी वैर का त्याग कर देते हैं।

सरल भावार्थ: जिस साधक के मन, वाणी और कर्म में अहिंसा स्थिर हो जाती है, उसके सान्निध्य में दूसरों का विरोध-भाव भी शांत होने लगता है। यहाँ अहिंसा को केवल व्रत नहीं, बल्कि आंतरिक स्थिति बताया गया है।

सूत्र 2.36: सत्य का फल

सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम् ॥ ३६ ॥

हिंदी अनुवाद: सत्य में दृढ़ स्थिति होने पर साधक की क्रिया और उसके फल उसकी वाणी के अनुरूप हो जाते हैं।

सरल भावार्थ: जो व्यक्ति सत्य में पूर्णतः स्थित हो जाता है, उसकी बात निष्फल नहीं जाती। परंपरा में इसे सत्यनिष्ठा से उत्पन्न वचन-सामर्थ्य के रूप में समझाया गया है।

सूत्र 2.37: अस्तेय का फल

अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम् ॥ ३७ ॥

हिंदी अनुवाद: अस्तेय में दृढ़ स्थिति होने पर सभी प्रकार के रत्न उसके समीप उपस्थित हो जाते हैं।

सरल भावार्थ: परंपरागत व्याख्या में "सर्वरत्नोपस्थान" का अर्थ श्रेष्ठ और मूल्यवान उपलब्धियों का स्वयं प्राप्त होना माना गया है।

सूत्र 2.38: ब्रह्मचर्य का फल

ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यलाभः ॥ ३८ ॥

हिंदी अनुवाद: ब्रह्मचर्य में दृढ़ स्थिति होने पर वीर्य, अर्थात् सामर्थ्य की प्राप्ति होती है।

सरल भावार्थ: इंद्रिय-संयम से शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक ऊर्जा का संरक्षण होता है। इससे साधक में अभ्यास करने की क्षमता और चित्त की दृढ़ता बढ़ती है।

सूत्र 2.39: अपरिग्रह का फल

अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथन्तासम्बोधः ॥ ३९ ॥

हिंदी अनुवाद: अपरिग्रह के स्थिर हो जाने पर जन्म के स्वरूप और उसके कारण का बोध होता है।

सरल भावार्थ: अपरिग्रह स्थिर होने पर साधक को अपने जन्म की प्रकृति और उससे संबंधित कारणों का बोध होने की बात कही गई है।

सूत्र 2.40: शौच का बाह्य फल

शौचात्स्वाङ्गजुगुप्सा परैरसंसर्गः ॥ ४० ॥

हिंदी अनुवाद: शौच से अपने शरीर के प्रति विरक्ति होती है और दूसरों के शरीर से संसर्ग नहीं रहता।

सरल भावार्थ: शुद्धि का अभ्यास करते हुए साधक शरीर की वास्तविक प्रकृति को समझने लगता है। इससे अपने शरीर के प्रति अत्यधिक मोह घटता है और दूसरों के शरीर के साथ अनावश्यक संसर्ग की प्रवृत्ति भी कम होती है।

सूत्र 2.41: शौच का आंतरिक फल

सत्त्वशुद्धिसौमनस्यैकाग्र्येन्द्रियजयात्मदर्शनयोग्यत्वानि च ॥ ४१ ॥

हिंदी अनुवाद: शौच से सत्त्व की शुद्धि, मन की प्रसन्नता, एकाग्रता, इंद्रिय-जय और आत्मदर्शन की योग्यता भी प्राप्त होती है।

सरल भावार्थ: आंतरिक शुद्धि से चित्त निर्मल होता है। इससे मन प्रसन्न रहता है, एकाग्र होना सरल होता है, इंद्रियों पर नियंत्रण बढ़ता है और साधक आत्म-चिंतन के योग्य बनता है।

सूत्र 2.42: संतोष का फल

सन्तोषादनुत्तमसुखलाभः ॥ ४२ ॥

हिंदी अनुवाद: संतोष से सर्वोत्तम सुख की प्राप्ति होती है।

सरल भावार्थ: जो प्राप्त है उसमें संतुष्ट रहने से मन की भागदौड़ कम होती है। इससे जो सुख मिलता है, वह बाहरी वस्तुओं पर निर्भर नहीं रहता और स्थायी शांति देता है।

सूत्र 2.43: तप का फल

कायेन्द्रियसिद्धिरशुद्धिक्षयात्तपसः ॥ ४३ ॥

हिंदी अनुवाद: तप से अशुद्धि का क्षय होता है और शरीर तथा इंद्रियों की सिद्धि प्राप्त होती है।

सरल भावार्थ: अनुशासित जीवन और तप से शरीर तथा इंद्रियों की अशुद्धियाँ घटती हैं। इससे शरीर और इंद्रियाँ साधना के लिए अधिक सक्षम और नियंत्रित बनती हैं। यहाँ "सिद्धि" को केवल शारीरिक क्षमता नहीं, बल्कि योग-साधना के संदर्भ में शरीर और इंद्रियों की विशेष परिपक्वता समझना चाहिए।

सूत्र 2.44: स्वाध्याय का फल

स्वाध्यायादिष्टदेवतासम्प्रयोगः ॥ ४४ ॥

हिंदी अनुवाद: स्वाध्याय से इष्टदेवता का सम्पर्क प्राप्त होता है।

सरल भावार्थ: स्वाध्याय के अभ्यास से साधक का अपने इष्टदेवता के साथ गहरा आध्यात्मिक संबंध स्थापित होने की बात कही गई है।

सूत्र 2.45: ईश्वर-प्रणिधान का फल

समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात् ॥ ४५ ॥

हिंदी अनुवाद: ईश्वर-प्रणिधान से समाधि की सिद्धि होती है।

सरल भावार्थ: जब साधक अपने अहंकार को छोड़कर ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण रखता है, तब चित्त शीघ्र स्थिर होता है। यही भाव समाधि पाद के सूत्र 1.23 में भी आया है।

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आसन (सूत्र 2.46 से 2.48)

सूत्र 2.46: आसन

स्थिरसुखमासनम् ॥ ४६ ॥

हिंदी अनुवाद: जो स्थिति स्थिर और सुखपूर्ण हो, वह आसन है।

सरल भावार्थ: योगसूत्र में दी गई आसन की परिभाषा की मुख्य कसौटी शरीर की स्थिरता और उसमें सुख का अनुभव है। जिस स्थिति में साधक बिना कष्ट के स्थिर रह सके, वही आसन है। योगसूत्र में आसनों के नाम या संख्या नहीं बताई गई, इसलिए आसन का दायरा किसी गिनी-चुनी मुद्राओं तक सीमित नहीं है।

सूत्र 2.47: आसन सिद्धि के उपाय

प्रयत्नशैथिल्यानन्तसमापत्तिभ्याम् ॥ ४७ ॥

हिंदी अनुवाद: प्रयत्न की शिथिलता और अनंत में चित्त की समापत्ति से आसन सिद्ध होता है।

सरल भावार्थ: आसन में शरीर को अनावश्यक कसाव से मुक्त रखना चाहिए और साथ ही चित्त को विस्तृत, अनंत भाव में स्थिर करना चाहिए। इससे शरीर भी सहज रहता है और मन भी शांत होता है।

सूत्र 2.48: आसन का फल

ततो द्वन्द्वानभिघातः ॥ ४८ ॥

हिंदी अनुवाद: उससे साधक पर शीत-उष्ण जैसे द्वंद्वों का आघात नहीं होता।

सरल भावार्थ: आसन के सिद्ध होने पर साधक सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख जैसी विपरीत स्थितियों से आसानी से विचलित नहीं होता। उसकी सहनशीलता और संतुलन बढ़ता है।

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प्राणायाम और प्रत्याहार (सूत्र 2.49 से 2.55)

सूत्र 2.49: प्राणायाम

तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः ॥ ४९ ॥

हिंदी अनुवाद: आसन सिद्ध होने पर श्वास और प्रश्वास की गति का विच्छेद, अर्थात् सामान्य गति को क्षमता के अनुसार रोक देना प्राणायाम है।

सरल भावार्थ: यहाँ क्रम स्पष्ट है कि प्राणायाम आसन की स्थिरता के बाद आता है। श्वास लेने और छोड़ने की क्रिया सामान्यतः निरंतर चलती रहती है। इस सहज गति को अपनी क्षमता के अनुसार रोकना प्राणायाम है। श्वास रोकने की इस अवस्था को कुम्भक कहा जाता है। इसी सूत्र की विस्तृत व्याख्या योगसूत्र में प्राणायाम में मिलती है।

सूत्र 2.50: प्राणायाम के भेद

बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिर्देशकालसङ्ख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः ॥ ५० ॥

हिंदी अनुवाद: प्राणायाम की वृत्ति बाह्य, आभ्यंतर और स्तंभ रूप में होती है। देश, काल और संख्या से मापे जाने पर वह दीर्घ और सूक्ष्म बनता है।

सरल भावार्थ: श्वास को बाहर निकालकर रोकना बाह्य वृत्ति है, भीतर भरकर रोकना आभ्यंतर वृत्ति है, और श्वास जिस अवस्था में हो उसी में बिना प्रयास रुक जाना स्तंभ वृत्ति है। स्तंभ वृत्ति पहले दोनों के अभ्यास के बाद सहज बनती है। देश (श्वास की पहुँच या गहराई), काल (अवधि) और संख्या (गणना या अनुपात) के अनुसार अभ्यास परखने पर श्वास दीर्घ और सूक्ष्म होती जाती है। इन तीनों वृत्तियों का विस्तृत वर्णन प्राणायाम के प्रकार में मिलता है।

सूत्र 2.51: चतुर्थ प्राणायाम

बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थः ॥ ५१ ॥

हिंदी अनुवाद: बाह्य और आभ्यन्तर वृत्ति के विषयों से विपरीत अवस्था चतुर्थ (चौथा) प्राणायाम है।

सरल भावार्थ: पिछले सूत्र में बाह्य, आभ्यंतर और स्तंभ, ये तीन वृत्तियाँ बताई गई थीं। यह सूत्र उनसे भिन्न चौथी अवस्था का संकेत देता है, जिसे चतुर्थ प्राणायाम कहा जाता है। संक्षेप में, यह बाह्य और आभ्यंतर वृत्तियों के सामान्य अभ्यास से आगे की उन्नत अवस्था है। इसकी व्याख्या में भाष्यकारों के मत भिन्न हैं, और इसका अभ्यास योग्य गुरु के मार्गदर्शन में ही उचित माना जाता है।

सूत्र 2.52: प्राणायाम का फल

ततः क्षीयते प्रकाशावरणम् ॥ ५२ ॥

हिंदी अनुवाद: उस प्राणायाम से प्रकाश को ढकने वाला आवरण क्षीण होता है।

सरल भावार्थ: चित्त का सहज स्वरूप निर्मल और प्रकाशमय है, परंतु अशुद्धि का आवरण उसे ढक लेता है। प्राणायाम के नियमित अभ्यास से यह आवरण धीरे-धीरे कम होता है और मन की स्पष्टता बढ़ती है।

सूत्र 2.53: धारणा की योग्यता

धारणासु च योग्यता मनसः ॥ ५३ ॥

हिंदी अनुवाद: और उससे मन में धारणा की योग्यता उत्पन्न होती है।

सरल भावार्थ: प्राणायाम से मन शांत और एकाग्र होने योग्य बनता है। इसी कारण यह आगे के अंग धारणा के लिए आधार तैयार करता है।

सूत्र 2.54: प्रत्याहार

स्वविषयासम्प्रयोगे चित्तस्य स्वरूपानुकार इवेन्द्रियाणां प्रत्याहारः ॥ ५४ ॥

हिंदी अनुवाद: इंद्रियों का अपने विषयों से संपर्क न होने पर चित्त के स्वरूप का अनुसरण-सा करना प्रत्याहार है।

सरल भावार्थ: सामान्यतः इंद्रियाँ बाहर के विषयों की ओर दौड़ती हैं। प्रत्याहार में वे विषयों से हटकर चित्त के साथ भीतर की ओर स्थिर हो जाती हैं। सरल भाषा में इसे इंद्रियों का विषयों से हटकर चित्त के अनुरूप भीतर की ओर होना समझा जा सकता है।

सूत्र 2.55: इंद्रियों की वश्यता

ततः परमा वश्यतेन्द्रियाणाम् ॥ ५५ ॥

हिंदी अनुवाद: उससे इंद्रियों पर परम वश्यता प्राप्त होती है।

सरल भावार्थ: प्रत्याहार सिद्ध होने पर इंद्रियाँ साधक के नियंत्रण में रहती हैं। इसके बाद ही धारणा, ध्यान और समाधि जैसे आंतरिक अंगों का मार्ग खुलता है, जिनका वर्णन आगे के पाद में किया जाता है।

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साधन पाद का संक्षिप्त सार

साधन पाद की शुरुआत क्रियायोग से होती है, जिसमें तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान शामिल हैं। इसके बाद पतंजलि दुःख के मूल कारण पाँच क्लेशों को समझाते हैं: अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश।

इसके आगे कर्माशय, कर्मफल, द्रष्टा और दृश्य के संयोग तथा कैवल्य का वर्णन आता है। अविद्या का नाश विवेकख्याति से होता है, और विवेकख्याति तक पहुँचने के लिए योग के अंगों का अनुष्ठान बताया गया है।

पाद के उत्तरार्ध में अष्टांग योग के आठ अंग बताए गए हैं और उनमें से यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार का विस्तार से वर्णन किया गया है। इस प्रकार साधन पाद योग के व्यावहारिक अभ्यास को क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत करता है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

साधन पाद में कितने सूत्र हैं?

साधन पाद में 55 सूत्र हैं। इसका पहला सूत्र “तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः” और अंतिम सूत्र “ततः परमा वश्यतेन्द्रियाणाम्” है। यह योगसूत्र का दूसरा पाद है।

साधन पाद का मुख्य विषय क्या है?

साधन पाद का मुख्य विषय योग-साधना के व्यावहारिक उपाय हैं, जिनमें क्रियायोग, पाँच क्लेश, दुःख का कारण, विवेकख्याति और अष्टांग योग के प्रथम पाँच अंग शामिल हैं। समाधि पाद जहाँ चित्त की अवस्थाओं का वर्णन करता है, वहीं साधन पाद उन तक पहुँचने के साधन बताता है।

क्रियायोग क्या है?

सूत्र 2.1 के अनुसार तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान को मिलाकर क्रियायोग कहा गया है। इसका उद्देश्य समाधि की सिद्धि और क्लेशों को क्षीण करना है (सूत्र 2.2)।

पतंजलि योगसूत्र के अनुसार पाँच क्लेश कौन-से हैं?

सूत्र 2.3 के अनुसार पाँच क्लेश हैं: अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश। इनमें अविद्या शेष चारों क्लेशों की उत्पत्ति-भूमि है (सूत्र 2.4)।

अविद्या क्या है?

सूत्र 2.5 के अनुसार अनित्य को नित्य, अशुचि को शुचि, दुःख को सुख और अनात्म को आत्म समझना अविद्या है। यह केवल जानकारी का अभाव नहीं, बल्कि वस्तु के वास्तविक स्वरूप के विपरीत ज्ञान है।

योगसूत्र के अनुसार दुःख का कारण क्या है?

सूत्र 2.17 के अनुसार द्रष्टा और दृश्य का संयोग त्यागने योग्य दुःख का कारण है, और सूत्र 2.24 के अनुसार इस संयोग का कारण अविद्या है। अविद्या के अभाव से यह संयोग समाप्त होता है और कैवल्य प्राप्त होता है (सूत्र 2.25)।

प्रतिपक्ष भावना क्या है?

सूत्र 2.33 के अनुसार जब हिंसा आदि विरोधी विचार यम-नियम के पालन में बाधा डालें, तब उनके विपरीत भाव का चिंतन करना प्रतिपक्ष भावना है। सूत्र 2.34 में बताया गया है कि ऐसे विचारों का फल दुःख और अज्ञान है।

साधन पाद और समाधि पाद में क्या अंतर है?

समाधि पाद में योग की परिभाषा, चित्तवृत्तियों और समाधि की अवस्थाओं का वर्णन है, जबकि साधन पाद में क्रियायोग, क्लेश और अष्टांग योग के प्रथम पाँच अंगों के रूप में साधना के उपाय बताए गए हैं।

आगे पढ़ें: पिछला भाग: समाधि पाद के सूत्र हिंदी अनुवाद और भावार्थ सहित। अगले भाग में विभूति पाद के सूत्र हिंदी अनुवाद और भावार्थ सहित प्रस्तुत किए जा रहे हैं।

अस्वीकरण: यह लेख योगसूत्र के अध्ययन और सामान्य जानकारी के लिए है। अनुवाद और भावार्थ सरल भाषा में समझाने का प्रयास हैं। प्राणायाम और ध्यान जैसे अभ्यास योग्य गुरु के मार्गदर्शन में करें, और स्वास्थ्य संबंधी समस्या में चिकित्सक से परामर्श लें।

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