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महर्षि पतंजलि ने अपने योगसूत्र के दूसरे अध्याय (साधन पाद) में प्राणायाम को विस्तार से परिभाषित किया है। यहाँ वे चार प्रकार के प्राणायाम का वर्णन करते हैं। इनमें पहले तीन प्राणायाम सामान्य अभ्यासियों के लिए हैं और चौथा केवल नियमित और अनुभवी साधकों के लिए है। इस चौथे प्राणायाम को चतुर्थ प्राणायाम कहा गया है। यह योग की सर्वोच्च अवस्था मानी जाती है, जहाँ साधक का श्वास बिना किसी प्रयास के शांत हो जाता है।

इस लेख में हम पतंजलि के सूत्र 2.51 के अनुसार चतुर्थ प्राणायाम की विस्तृत जानकारी, सही विधि और सावधानियों को समझेंगे।

प्राकृतिक वातावरण में सुखासन में आँखें बंद कर चतुर्थ प्राणायाम के लिए बैठी साधिका
रीढ़ सीधी, नेत्र कोमलता से बंद: चतुर्थ प्राणायाम की सही स्थिति।

प्राणायाम और इसके प्रकार

महर्षि पतंजलि के योगसूत्र में प्राणायाम का विस्तार से वर्णन मिलता है। सूत्र 2.49 में प्राणायाम को परिभाषित करते हुए महर्षि पतंजलि लिखते हैं:

तस्मिन्सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः।। 2.49।।

अर्थ :- श्वास और प्रश्वास की गति को रोकना (नियंत्रित करना) प्राणायाम है।

योगसूत्र के सूत्र 2.50 में प्राणायाम के तीन प्रकार की व्याख्या की गई है:

बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिर्देशकालसंख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः।। 2.50।।

इस सूत्र के अनुसार तीन प्रकार के प्राणायाम इस प्रकार हैं:

  1. बाह्य वृत्ति — भरे हुए श्वास को बाहर छोड़कर खाली श्वास की स्थिति में रुकना।
  2. आभ्यन्तर वृत्ति — श्वास को अंदर लेकर भरे हुए श्वास की स्थिति में ठहरना।
  3. स्तम्भ वृत्ति — उपर्युक्त दोनों के बाद श्वास को यथास्थिति में (भरी हो या खाली) कुछ देर रोकना।

ये तीनों प्राणायाम सामान्य अभ्यासियों के लिए हैं जो स्वास्थ्य के लिए अभ्यास करते हैं। लेकिन चौथा प्राणायाम सबके लिए नहीं है। आइए इसके बारे में विस्तार से समझ लेते हैं।

चतुर्थ प्राणायाम क्या है?

तीन प्रकार के प्राणायाम का वर्णन करने के बाद आगे महर्षि पतंजलि "चतुर्थ प्राणायाम" का वर्णन करते हैं। यह इन तीनों से पूरी तरह अलग और उच्चतम अवस्था का अभ्यास है।

चतुर्थ प्राणायाम का अर्थ है "चौथा प्राणायाम"। यह योग की एक विशिष्ट अवस्था है जहाँ साधक प्राणायाम की तीन वृत्तियों से परे पहुंच जाता है। यहाँ श्वास प्राकृतिक रूप से शांत हो जाता है।

यह अभ्यास केवल उन्हीं के लिए है जिन्होंने पहले तीन प्राणायामों (बाह्य, आभ्यन्तर, स्तम्भ) में पूर्ण दक्षता प्राप्त कर ली हो। नए अभ्यासी इसे न करें।

चतुर्थ प्राणायाम की परिभाषा — सूत्र 2.51

महर्षि पतंजलि चतुर्थ प्राणायाम को इन शब्दों में परिभाषित करते हैं:

बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थः।। 2.51।।

अर्थ :- बाह्य वृत्ति और आभ्यन्तर वृत्ति के विषयों से हटकर (अलग) किया जाने वाला यह चौथा प्राणायाम है।

भावार्थ :-

  • बाह्य वृत्ति का विषय है: श्वास को बाहर छोड़ने के बाद अंदर भरना।
  • आभ्यन्तर वृत्ति का विषय है: श्वास को अंदर भरने के बाद बाहर निकालना।
  • चतुर्थ प्राणायाम में साधक इन दोनों विषयों (श्वास भरना-छोड़ना) को त्यागकर विपरीत क्रिया करता है।

उदाहरण :-

  • बाह्य वृत्ति के बाद आमतौर पर श्वास भरते हैं, किंतु चतुर्थ में थोड़ा बाहर धकेलते हैं।
  • आभ्यन्तर वृत्ति के बाद आमतौर पर श्वास छोड़ते हैं, किंतु चतुर्थ में थोड़ा अंदर भरते हैं।

यह प्राकृतिक श्वास नियंत्रण है, जो दीर्घ साधना के बाद स्वतः आता है।

चतुर्थ प्राणायाम की विधि

यह एक उन्नत अभ्यास है। इसे केवल नियमित योग अभ्यासी ही किसी योग्य प्रशिक्षक के मार्गदर्शन में करें। नए अभ्यासी इसका प्रयास न करें।

बैठने की तैयारी

  • पद्मासन या सुखासन में आरामदायक तरीके से बैठें।
  • रीढ़ को सीधा रखें, झुकें नहीं।
  • आँखें कोमलता से बंद रखें।
  • हाथों को ज्ञान मुद्रा में रखें (अंगूठा और तर्जनी को जोड़कर)।
  • कंधों को शिथिल रखें।

चतुर्थ प्राणायाम का प्रथम भाग — बाह्य वृत्ति में विपरीत क्रिया

  • पहला कदम :- भरे हुए श्वास को धीरे-धीरे बाहर निकालें (यह रेचक है)।
  • दूसरा कदम :- पूरी तरह श्वास खाली करने के बाद मूल बन्ध लगाएं (गुदा को ऊपर की ओर खींचना)।
  • तीसरा कदम :- अपनी क्षमता के अनुसार खाली श्वास की स्थिति में रुकें।
  • चौथा कदम :- कुछ देर रुकने के बाद श्वास अंदर भरने की इच्छा होगी, लेकिन सामान्य अपेक्षा के विपरीत क्रिया करें। श्वास को एक बार थोड़ा-सा बाहर की ओर धकेलें (यह चतुर्थ प्राणायाम है)।
  • पाँचवाँ कदम :- इसके बाद धीरे-धीरे पूरा श्वास अंदर भरें (यह पूरक है)।

चतुर्थ प्राणायाम का दूसरा भाग — आभ्यन्तर वृत्ति में विपरीत क्रिया

  • पहला कदम :- पूरा श्वास अंदर भरें (यह पूरक है)।
  • दूसरा कदम :- मूल बन्ध लगाएं।
  • तीसरा कदम :- अपनी क्षमता के अनुसार भरे श्वास की स्थिति में रुकें।
  • चौथा कदम :- कुछ देर रुकने के बाद श्वास बाहर निकालने की इच्छा होगी, लेकिन सामान्य अपेक्षा के विपरीत क्रिया करें। थोड़ा-सा श्वास अंदर की ओर भरें (यह चतुर्थ प्राणायाम है)।
  • पाँचवाँ कदम :- इसके बाद धीरे-धीरे श्वास को बाहर छोड़ें (यह रेचक है)।

संपूर्ण चक्र को पूरा करना

  • यह एक आवृत्ति (cycle) पूरी हुई।
  • आरम्भ में केवल एक ही आवृत्ति करें।
  • धीरे-धीरे आवृत्तियों को बढ़ाएँ, लेकिन कभी जबरदस्ती न करें।
  • अभ्यास पूरा करने के बाद श्वास को सामान्य करें और कुछ देर शांत बैठें।

चतुर्थ प्राणायाम की सावधानी

यह एक उन्नत अभ्यास है। इसलिए इसे सावधानी से और योग्य प्रशिक्षक के निर्देशन में ही करें।

यह प्राणायाम कौन नहीं कर सकते

  • नए योग अभ्यासी — कम से कम 2-3 महीने तक अन्य प्राणायाम का नियमित अभ्यास आवश्यक है।
  • श्वास रोग वाले व्यक्ति — अस्थमा, ब्रोंकाइटिस या क्रॉनिक खांसी।
  • हृदय रोगी — उच्च रक्तचाप, हृदय की कमजोरी या हृदय सर्जरी के बाद।
  • गर्भवती महिलाएँ — गर्भावस्था में तथा प्रसव के बाद कम से कम 3-4 महीने तक।
  • चक्कर आने वाले व्यक्ति — या जिन्हें किसी प्रकार की चिकित्सीय समस्या हो।
  • तनाव या मानसिक रोग वाले व्यक्ति — यह अभ्यास मन को अत्यधिक शांत और केंद्रित करता है।

सावधानी के सामान्य नियम

  • चतुर्थ प्राणायाम केवल अंत में करें। पहले कुछ आसन और अन्य प्राणायामों का अभ्यास नियम और सही क्रम से करें।
  • योग्य प्रशिक्षक के साथ शुरू करें। पहली बार किसी के निर्देशन में ही करें।
  • श्वास रोकने में बल न लगाएँ। जबरदस्ती से किया गया अभ्यास हानिकारक हो सकता है।
  • खाली पेट ही करें, भोजन के कम से कम 4-5 घंटे बाद।
  • शांत और स्वच्छ स्थान चुनें। प्रदूषित या शोरगुल वाली जगह से बचें।
  • अपनी क्षमता के अनुसार करें। "क्षमता अनुसार अभ्यास" प्राणायाम का मूलमंत्र है। कोई तकलीफ हो तो तुरंत रोक दें।

लाभ और वैज्ञानिक आधार

चतुर्थ प्राणायाम का नियमित अभ्यास शरीर, मन और चेतना — तीनों स्तरों पर प्रभाव डालता है। परंपरागत योग ग्रंथों और आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान दोनों इसके लाभों की पुष्टि करते हैं।

शारीरिक लाभ

  1. श्वसन तंत्र को मजबूत करता है — फेफड़ों की क्षमता बढ़ाता है।
  2. प्राण-ऊर्जा की वृद्धि — शरीर में शक्ति और जीवन-बल का विस्तार होता है।
  3. तंत्रिका तंत्र को शांत करता है — मस्तिष्क को शांत और केंद्रित बनाता है।
  4. मस्तिष्क को ऑक्सीजन की पूर्ति — स्मृति और एकाग्रता में वृद्धि।
  5. कुंडलिनी शक्ति का जागरण — योग की परंपरा में इसे परम महत्व दिया जाता है।

मानसिक और आध्यात्मिक लाभ

  1. ध्यान में सहायक — योगसूत्र में इसे ध्यान की तैयारी माना जाता है।
  2. मन की शांति — तनाव और चिंता का शमन होता है।
  3. आत्मविश्वास में वृद्धि — साधक को आंतरिक शक्ति का अनुभव होता है।
  4. चेतना का विस्तार — योग की परंपरा के अनुसार, यह आत्म-ज्ञान की ओर एक कदम है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण

आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान ने प्रमाणित किया है कि:

  • कुम्भक (श्वास रोकना) से मस्तिष्क की कार्य क्षमता बढ़ती है, विशेषकर फोकस और एकाग्रता में।
  • तनाव हार्मोन (कार्टिसोल) में कमी आती है, जिससे चिंता और तनाव कम होते हैं।
  • हृदय की गति नियमित होती है और रक्तचाप संतुलित रहता है।
  • श्वसन तंत्र मजबूत होता है और फेफड़ों की क्षमता बढ़ती है।
  • ऑटोनोमिक नर्वस सिस्टम (ANS) संतुलित होता है।

ये लाभ दीर्घकालीन और नियमित अभ्यास के बाद मिलते हैं।

सारांश

चतुर्थ प्राणायाम योग की एक उच्च अवस्था है। यह बाह्य और आभ्यन्तर वृत्तियों के विषयों से विपरीत जाकर किया जाने वाला अभ्यास है। यह प्राणायाम केवल दीर्घ अभ्यास और पूर्ण दक्षता के बाद ही किया जा सकता है।

सामान्य अभ्यासियों के लिए सूत्र 2.50 के तीनों प्राणायाम (बाह्य, आभ्यन्तर, स्तम्भ) पर्याप्त हैं। इन तीनों अभ्यासों को सफलतापूर्वक करने के बाद कुशल निर्देशन में चतुर्थ प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

क्या नया अभ्यासी चतुर्थ प्राणायाम कर सकता है?

नहीं। यह प्राणायाम केवल उन लोगों के लिए है जिन्होंने कम से कम 2-3 महीने तक बाह्य, आभ्यन्तर और स्तम्भ वृत्तियों का नियमित अभ्यास किया हो। नए अभ्यासी पहले इन तीनों वृत्तियों पर ध्यान दें।

चतुर्थ प्राणायाम कितनी बार करना चाहिए?

आरम्भ में केवल एक आवृत्ति करें। जब यह आरामदायक हो जाए, तो धीरे-धीरे बढ़ाएँ। श्वास रोकने में कभी जबरदस्ती न करें।

  • सप्ताह 1-2 :- 1 आवृत्ति
  • सप्ताह 3-4 :- 2-3 आवृत्तियाँ (यदि आरामदायक हो)
  • दूसरे महीने के बाद :- अनुभव के अनुसार

श्वास रोगी और उच्च रक्तचाप वाले चतुर्थ प्राणायाम क्यों न करें?

श्वास रोग (अस्थमा) और उच्च रक्तचाप में श्वास रोकने से समस्या बढ़ सकती है। ये स्थितियाँ कुम्भक के लिए अनुपयुक्त हैं। ऐसे व्यक्तियों को डॉक्टर की सहमति के बिना यह अभ्यास नहीं करना चाहिए।

चतुर्थ प्राणायाम का ध्यान से क्या संबंध है?

योगसूत्र के अनुसार प्राणायाम का मुख्य उद्देश्य चेतना को ध्यान के लिए तैयार करना है। चतुर्थ प्राणायाम के नियमित अभ्यास से:

  • मन शांत और एकाग्र होता है।
  • विचारों की तरंगें (चित्तवृत्तियाँ) स्थिर होती हैं।
  • ध्यान में सहजता आती है।

क्या महिलाएँ चतुर्थ प्राणायाम कर सकती हैं?

हाँ, लेकिन गर्भवती महिलाएँ इसे न करें। प्रसव के बाद कम से कम 3-4 महीने प्रतीक्षा करें और योग्य प्रशिक्षक के निर्देशन में शुरू करें। अन्य महिलाएँ अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार अभ्यास कर सकती हैं।

चतुर्थ प्राणायाम और कुम्भक में क्या अंतर है?

कुम्भक में साधक अपने प्रयास से श्वास रोकता है, जबकि चतुर्थ प्राणायाम में श्वास बिना प्रयास के शांत हो जाता है।

  • कुम्भक :- इच्छा और प्रयास से श्वास रोकना।
  • चतुर्थ प्राणायाम :- श्वास का स्वतः शांत होना।

अभ्यास के दौरान चक्कर आए तो क्या करें?

तुरंत अभ्यास बंद कर दें।

  • कुछ मिनट सामान्य श्वास लें।
  • आराम करें।
  • दोबारा प्रयास करने से पहले अपने प्रशिक्षक से सलाह लें।

यह संकेत हो सकता है कि आप अभी इसके लिए तैयार नहीं हैं या कोई स्वास्थ्य समस्या है।

सर्दी और गर्मी में चतुर्थ प्राणायाम में क्या अंतर रखें?

मौसम के अनुसार श्वास रोकने का समय बदल सकता है:

  • सर्दियों में :- श्वास अपेक्षाकृत अधिक समय के लिए रोका जा सकता है।
  • गर्मियों में :- श्वास कम समय के लिए रोकें।

हर स्थिति में अपनी क्षमता को प्राथमिकता दें।

Disclaimer

इस लेख में बताया गया अभ्यास केवल नियमित और प्रवीण योग साधकों के लिए है। यह अभ्यास रोगग्रस्त, नए अभ्यासी, गर्भवती महिलाओं और श्वास/हृदय रोगियों के लिए नहीं है।

याद रखें: क्षमता से किया गया अभ्यास लाभकारी होता है और बलपूर्वक व क्षमता से अधिक किया गया अभ्यास हानिकारक भी हो सकता है।

योग प्रशिक्षक या चिकित्सक की सलाह लिए बिना इसे शुरू न करें।

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