चित्तवृत्ति का निरोध करना योग का मुख्य उद्देश्य है। योगसूत्र में महर्षि पतंजलि ने योग को परिभाषित करते हुए कहा है:
योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः ।। 1.2 ।।
अर्थात् — चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है।
ये चित्तवृत्तियाँ क्या हैं, जो निरोध करने योग्य कही गई हैं? ये कितने प्रकार की होती हैं? क्लिष्ट तथा अक्लिष्ट चित्तवृत्तियों में क्या अंतर है?
संक्षिप्त उत्तर:
- चित्त की वृत्तियाँ पाँच हैं — प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति (सूत्र 1.6)।
- ये पाँचों क्लिष्ट और अक्लिष्ट, दो प्रकार की हो सकती हैं (सूत्र 1.5)।
- क्लिष्ट वृत्तियाँ क्लेशों (अविद्या आदि) से उत्पन्न होती हैं और दुःख तथा संस्कारों का संचय बढ़ाती हैं।
- अक्लिष्ट वृत्तियाँ क्लेशरहित होती हैं, विवेक की ओर ले जाती हैं और साधना में सहायक होती हैं।
इस लेख में योगसूत्र के मूल सूत्र, व्यासभाष्य की परंपरा, उदाहरण और चित्तवृत्ति निरोध के उपाय क्रम से समझाए गए हैं।
विषय सूची
चित्तवृत्ति क्या है?
योगदर्शन में चित्त वह अंतःकरण है जिसमें ज्ञान, भावना, स्मृति और संकल्प उठते हैं। जैसे जल में वायु के संपर्क से तरंगें उठती हैं, वैसे ही विषयों के संपर्क से चित्त में जो परिणाम (तरंगें) उठते हैं, उन्हें वृत्ति कहते हैं।
वृत्तियों को समझना क्यों आवश्यक है?
जब वृत्तियाँ शांत होती हैं, तब द्रष्टा अपने स्वरूप में स्थित होता है।
तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् ।। 1.3 ।।
अर्थात् — तब (वृत्तियों के निरोध होने पर) द्रष्टा की अपने स्वरूप में स्थिति हो जाती है।
जब वृत्तियाँ चल रही होती हैं, तब द्रष्टा उन्हीं के समान प्रतीत होता है।
वृत्तिसारूप्यमितरत्र ।। 1.4 ।।
अर्थात् — अन्य अवस्था में (जब निरोध नहीं होता) द्रष्टा वृत्तियों के समान प्रतीत होता है।
इसलिए योग-साधना में वृत्तियों को पहचानना, उनका निरीक्षण करना और उनका निरोध करना आवश्यक माना गया है।
क्लिष्ट और अक्लिष्ट चित्तवृत्तियाँ
महर्षि पतंजलि समाधिपाद के पाँचवें सूत्र में कहते हैं —
वृत्तयः पञ्चतय्यः क्लिष्टाक्लिष्टाः ।। 1.5 ।।
अर्थात् — वृत्तियाँ पाँच प्रकार की हैं, और वे क्लिष्ट तथा अक्लिष्ट दोनों रूपों वाली होती हैं।
शब्दार्थ
- क्लिष्ट — "क्लिश्" धातु (पीड़ा, कष्ट) से बना है। अर्थ: क्लेश से युक्त।
- अक्लिष्ट — "न क्लिष्ट"। अर्थ: क्लेश से रहित।
- सामान्य हिंदी में "क्लिष्ट" का अर्थ "कठिन" या "जटिल" (जैसे क्लिष्ट भाषा) प्रचलित है। योगसूत्र में इसका अर्थ "क्लेशयुक्त" है।
व्यासभाष्य के अनुसार परिभाषा
- क्लिष्ट वृत्तियाँ क्लेशों के कारण उत्पन्न होती हैं और कर्माशय (कर्म-संस्कारों के संचय) के लिए भूमि तैयार करती हैं।
- अक्लिष्ट वृत्तियाँ ख्याति (विवेकज्ञान) को विषय बनाती हैं और गुणों की भोग-प्रवृत्ति के अधिकार का विरोध करती हैं।
पाँच क्लेश
अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः ।। 2.3 ।।
अर्थात् — अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश — ये पाँच क्लेश हैं।
- अविद्या — यथार्थ का अज्ञान
- अस्मिता — अहंकार, स्वयं को शरीर-मन के साथ एक मान लेना
- राग — सुख के प्रति आसक्ति
- द्वेष — दुःख के प्रति घृणा
- अभिनिवेश — मृत्यु का भय, जीवन से चिपके रहने की प्रवृत्ति
क्लिष्ट और अक्लिष्ट में अंतर
| आधार | क्लिष्ट वृत्ति | अक्लिष्ट वृत्ति |
|---|---|---|
| मूल | अविद्या आदि क्लेश | विवेक, यथार्थ ज्ञान |
| परिणाम | दुःख, कर्म-संस्कारों का संचय | क्लेशों का क्षीण होना |
| चित्त पर प्रभाव | अशांत, बंधनकारी | प्रसन्न, साधना में सहायक |
| साधना में स्थान | क्षीण करने योग्य | आरंभ में सहायक, अंत में निरोध योग्य |
वृत्ति-संस्कार चक्र
व्यासभाष्य की परंपरा में ये बातें विशेष रूप से कही गई हैं:
- क्लिष्ट और अक्लिष्ट वृत्तियाँ एक-दूसरे के बीच में उठती रहती हैं। क्लिष्ट वृत्तियों के प्रवाह में अक्लिष्ट और अक्लिष्ट के अंतराल में क्लिष्ट वृत्तियाँ आ सकती हैं।
- वृत्तियाँ अपने अनुरूप संस्कार बनाती हैं, और संस्कार फिर उसी प्रकार की वृत्तियों को जन्म देते हैं।
- इसीलिए क्लिष्ट वृत्तियों की पुनरावृत्ति से क्लिष्ट संस्कार दृढ़ होते हैं। साधना का उद्देश्य इस चक्र को तोड़ना है।
चित्त की पाँच वृत्तियाँ (सूत्र 1.6)
प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः ।। 1.6 ।।
अर्थात् — प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति — ये पाँच वृत्तियाँ हैं।
| वृत्ति | संक्षिप्त अर्थ | सूत्र |
|---|---|---|
| प्रमाण | यथार्थ ज्ञान | 1.7 |
| विपर्यय | मिथ्या ज्ञान | 1.8 |
| विकल्प | शब्द पर आधारित, वस्तुरहित ज्ञान | 1.9 |
| निद्रा | अभाव को आलंबन बनाने वाली वृत्ति | 1.10 |
| स्मृति | अनुभव किए विषय का स्मरण | 1.11 |
1. प्रमाण वृत्ति
प्रमाण शब्द "प्रमा" (यथार्थ ज्ञान) से बना है। जिस साधन से यथार्थ ज्ञान होता है, वह प्रमाण है।
प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि ।। 1.7 ।।
अर्थात् — प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम, ये तीन प्रमाण हैं।
प्रत्यक्ष प्रमाण
इन्द्रियों के माध्यम से किसी वस्तु का साक्षात् अनुभव। जैसे आँखों से घटना देखना, स्पर्श से वस्तु को जानना, स्वाद से पदार्थ को पहचानना।
अनुमान प्रमाण
किसी चिह्न के आधार पर बिना देखे निष्कर्ष तक पहुँचना। जैसे धुआँ देखकर अग्नि का, या गीली भूमि देखकर वर्षा का अनुमान।
आगम प्रमाण
आप्त (विश्वसनीय, यथार्थवक्ता) पुरुष या शास्त्र के वचन से प्राप्त ज्ञान। इसे शब्द प्रमाण भी कहते हैं।
- जो ज्ञान प्रत्यक्ष या अनुमान से नहीं मिला, वह शब्द के माध्यम से मिलता है।
- आगम तभी प्रमाण है जब बताने वाले ने स्वयं उस विषय को जाना हो और वह यथार्थ ही कहता हो।
- उदाहरण: किसी दूसरे नगर की बाढ़ की सूचना विश्वसनीय व्यक्ति से मिलना। इसी प्रकार शास्त्रों और गुरु-वचन से ईश्वर या धर्म के विषय में ज्ञान।
| क्लिष्ट रूप | अक्लिष्ट रूप |
|---|---|
| राग-द्वेष से रँगा हुआ प्रत्यक्ष या श्रवण, जो आसक्ति या द्वेष बढ़ाए (जैसे भोग्य वस्तु देखकर तृष्णा जागना, किसी का दोष सुनकर द्वेष बढ़ना)। | शास्त्र, गुरु-उपदेश और विवेक से प्राप्त यथार्थ बोध, जो वैराग्य और विवेक बढ़ाए (जैसे शरीर की अनित्यता का ज्ञान)। |
2. विपर्यय वृत्ति
विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम् ।। 1.8 ।।
अर्थात् — विपर्यय वह मिथ्या ज्ञान है जो वस्तु के वास्तविक स्वरूप में स्थित नहीं होता।
- यह ज्ञान बाद में यथार्थ प्रमाण से बाधित (खंडित) हो जाता है। इसीलिए वह प्रमाण नहीं कहा जाता।
- उदाहरण: अंधकार में रस्सी को साँप समझना। नेत्रदोष से एक चंद्रमा के दो चंद्रमा दिखना।
- अविद्या विपर्यय का मूल है। सूत्र 2.5 में इसकी परिभाषा दी गई है।
अनित्याशुचिदुःखानात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या ।। 2.5 ।।
अर्थात् — अनित्य, अशुचि, दुःख और अनात्म में क्रमशः नित्य, शुचि, सुख और आत्म की बुद्धि रखना अविद्या है।
- अनित्य को नित्य समझना
- अशुचि को शुचि समझना
- दुःख को सुख समझना
- अनात्म को आत्म समझना
व्यासभाष्य में अविद्या से जुड़े क्लेश (अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश) भी विपर्यय के ही रूप बताए गए हैं।
| क्लिष्ट रूप | अक्लिष्ट रूप |
|---|---|
| अविद्या आदि क्लेशों से जुड़ी भ्रांति, जैसे इन्द्रिय-सुख को स्थायी सुख मान लेना। | ऐसी भ्रांति जो क्लेश का कारण नहीं बनती, जैसे नेत्रदोष से दो चंद्रमा दिखना। |
3. विकल्प वृत्ति
शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः ।। 1.9 ।।
अर्थात् — जो ज्ञान शब्द के ज्ञान के पीछे-पीछे चलता है और जिसके अनुरूप कोई वास्तविक वस्तु नहीं होती, वह विकल्प है।
- विकल्प न प्रमाण है, क्योंकि उसका विषय वास्तविक नहीं। न विपर्यय है, क्योंकि उसका बाद में खंडन नहीं होता।
- उदाहरण: "आकाश-कुसुम", "खरगोश के सींग", "सींगों वाला मनुष्य"। इन्हें सुनकर चित्त में आकृति तो बनती है, पर ज्ञान बना रहता है कि वस्तु वास्तव में संभव नहीं।
- व्यासभाष्य का एक उदाहरण: "चैतन्य पुरुष का स्वरूप है"। यहाँ "का" शब्द भेद का आभास कराता है, जबकि चैतन्य और पुरुष एक ही हैं।
- व्यवहार में भाषा का बहुत बड़ा भाग विकल्प पर आधारित है।
| क्लिष्ट रूप | अक्लिष्ट रूप |
|---|---|
| "मैं बड़ा हूँ", "यह मेरा है" जैसी कल्पनाएँ, जो अहंकार, राग या द्वेष बढ़ाएँ। | मंत्र या शास्त्र के अर्थ का चिंतन, जो चित्त को शांत करे। |
4. निद्रा वृत्ति
अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्रा ।। 1.10 ।।
अर्थात् — जो वृत्ति अभाव के ज्ञान को आलंबन बनाती है, वह निद्रा है।
- निद्रा में जाग्रत और स्वप्न के विषयों का अभाव रहता है, और उसी अभाव का बोध चित्त में बना रहता है। इसमें तमोगुण की प्रधानता रहती है।
- व्यासभाष्य का तर्क: जागने पर व्यक्ति कहता है — "मैं सुख से सोया", "मेरा चित्त भारी है"। यह स्मरण तभी संभव है जब निद्रा में कोई अनुभव हुआ हो। इसीलिए निद्रा भी एक वृत्ति है, केवल "कुछ न होना" नहीं।
निद्रा समाधि नहीं है। योग में निद्रा को भी अन्य वृत्तियों की तरह निरोध के योग्य माना गया है। निद्रा में चित्त तमस से ढका होता है, जबकि समाधि में चेतना जाग्रत रहती है।
| क्लिष्ट रूप | अक्लिष्ट रूप |
|---|---|
| दुःखपूर्ण, भारी, मूढ़ता वाली निद्रा, जिसके बाद चित्त भारी और भ्रमित रहे। | सुखपूर्ण निद्रा, जिसके बाद चित्त प्रसन्न और बुद्धि निर्मल हो। |
5. स्मृति वृत्ति
अनुभूतविषयासंप्रमोषः स्मृतिः ।। 1.11 ।।
अर्थात् — अनुभव किए हुए विषय का न छूटना (उसी रूप में पुनः उपस्थित हो जाना) स्मृति है।
- स्मृति नया ज्ञान नहीं देती। वह पहले अनुभव किए गए विषय को ही पुनः चित्त में लाती है।
- प्रमाण, विपर्यय, विकल्प और निद्रा, इन चारों से बने संस्कार आगे स्मृति के रूप में उठते हैं।
| क्लिष्ट रूप | अक्लिष्ट रूप |
|---|---|
| भोग, अपमान या हानि की स्मृति, जो राग-द्वेष या शोक को पुनः जगाए। | गुरु-उपदेश, साधना या ईश्वर का स्मरण, जो चित्त को स्थिर करे। |
चित्तवृत्ति निरोध
निरोध का अर्थ और फल
निरोध का अर्थ वृत्तियों का दमन नहीं, उनका शांत होकर उठना बंद हो जाना है। इसका फल है द्रष्टा का अपने स्वरूप में स्थित होना (सूत्र 1.3)।
निरोध के उपाय
अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः ।। 1.12 ।।
अर्थात् — अभ्यास और वैराग्य से उन (चित्तवृत्तियों) का निरोध होता है।
- अभ्यास और वैराग्य — निरोध का मुख्य सूत्रोक्त उपाय (1.12)। अभ्यास से चित्त की स्थिरता का प्रयत्न होता है, और वैराग्य से विषयों की आसक्ति घटती है।
- क्रियायोग — तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान (2.1), जो क्लेशों को क्षीण करते हैं (2.2)।
- अष्टांग योग — योग के आठ अंगों के अभ्यास (यम से समाधि तक) से अशुद्धि का क्षय होता है और विवेकख्याति तक ज्ञान का प्रकाश बढ़ता है (सूत्र 2.28)।
- प्रतिपक्षभावना — नकारात्मक विचार आने पर उनके विपरीत भाव का चिंतन (सूत्र 2.33)।
- मैत्री, करुणा, मुदिता, उपेक्षा — चित्त को प्रसन्न करने वाली चार भावनाएँ (सूत्र 1.33)।
- प्राणायाम — श्वास को नियमित करने से चित्त की चंचलता घटती है। सूत्र 1.34 में श्वास को बाहर निकालने (प्रच्छर्दन, यानी रेचक) और रोकने (विधारण, यानी कुम्भक) को चित्त स्थिर करने का साधन बताया गया है। इसलिए कुम्भक सहित प्राणायाम का अभ्यास चित्त को शांत करने में सहायक है। सूत्र 2.52 के अनुसार प्राणायाम से ज्ञान के प्रकाश पर पड़ा आवरण क्षीण होता है। योगसूत्र के अनुसार प्राणायाम की अवस्थाओं को अलग लेख में विस्तार से समझाया गया है।
योगाङ्गानुष्ठानादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः ।। 2.28 ।।
अर्थात् — योग के अंगों के अनुष्ठान से अशुद्धि का क्षय होने पर विवेकख्याति तक ज्ञान का प्रकाश बढ़ता है।
वितर्कबाधने प्रतिपक्षभावनम् ।। 2.33 ।।
अर्थात् — वितर्कों (हिंसा आदि विपरीत विचारों) से बाधा होने पर उनके प्रतिपक्ष का चिंतन करना चाहिए।
मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां भावनातश्चित्तप्रसादनम् ।। 1.33 ।।
अर्थात् — सुखी, दुःखी, पुण्यात्मा और अपुण्यात्मा के प्रति क्रमशः मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा की भावना से चित्त प्रसन्न होता है।
निरोध का क्रम
- पहला चरण — क्लिष्ट वृत्तियों को क्षीण करना।
- दूसरा चरण — अक्लिष्ट वृत्तियों (विवेकख्याति) का सहारा लेकर क्लेश-संस्कारों को कमजोर करना।
- अंतिम चरण — विवेकख्याति से बने संस्कार का भी निरोध हो जाता है और निर्बीज समाधि प्राप्त होती है।
तज्जः संस्कारोऽन्यसंस्कारप्रतिबन्धी ।। 1.50 ।।
अर्थात् — उस (समाधिप्रज्ञा) से उत्पन्न संस्कार अन्य संस्कारों का प्रतिबंधक होता है।
तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्बीजः समाधिः ।। 1.51 ।।
अर्थात् — उसके भी निरोध होने पर सबके निरोध से निर्बीज समाधि होती है।
विशेष: अक्लिष्ट वृत्तियाँ साधना के लिए सहायक हैं, पर अंतिम लक्ष्य में उनका भी निरोध होता है।
चित्त की पाँच भूमियाँ (व्यासभाष्य)
- क्षिप्त — अत्यंत चंचल
- मूढ़ — तमस से ढका
- विक्षिप्त — कभी स्थिर, कभी चंचल
- एकाग्र — एक विषय में स्थिर
- निरुद्ध — वृत्तियाँ शांत
इनमें एकाग्र और निरुद्ध भूमियाँ योग के लिए उपयोगी मानी गई हैं। एकाग्र भूमि में चित्त एक ही विषय पर टिकता है, और इसी स्थिरता पर ध्यान का अभ्यास आधारित होता है।
सारांश
- योगदर्शन में चित्त में उठने वाली मानसिक तरंगों को चित्तवृत्ति कहते हैं।
- चित्त की पाँच वृत्तियाँ हैं: प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति।
- पाँचों वृत्तियाँ क्लिष्ट (क्लेशयुक्त) और अक्लिष्ट (क्लेशरहित) दोनों हो सकती हैं।
- क्लिष्ट वृत्तियाँ अविद्या आदि क्लेशों से उठकर दुःख और संस्कार बढ़ाती हैं। अक्लिष्ट वृत्तियाँ विवेक की ओर ले जाती हैं।
- वृत्तियों और संस्कारों का चक्र चलता रहता है। साधना उसी चक्र को क्रमशः शांत करती है।
- निरोध का मुख्य सूत्रोक्त उपाय अभ्यास और वैराग्य है। क्रियायोग, अष्टांग योग और प्रतिपक्षभावना इसके सहायक साधन हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
क्लिष्ट और अक्लिष्ट चित्तवृत्तियाँ क्या हैं?
योगदर्शन में चित्त की वृत्तियाँ दो प्रकार की बताई गई हैं। क्लिष्ट वृत्तियाँ क्लेशों से उत्पन्न होकर दुःख और संस्कार बढ़ाती हैं, जबकि अक्लिष्ट वृत्तियाँ क्लेशरहित होकर विवेक की ओर ले जाती हैं।
योगसूत्र के अनुसार चित्त की कितनी वृत्तियाँ होती हैं?
पाँच: प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति (सूत्र 1.6)।
योग में "क्लिष्ट" का क्या अर्थ है?
सामान्य हिंदी में "क्लिष्ट" का अर्थ कठिन या जटिल होता है। योगसूत्र में इसका अर्थ है "क्लेश से युक्त"।
क्लिष्ट और अक्लिष्ट वृत्तियों में मुख्य अंतर क्या है?
क्लिष्ट वृत्ति का मूल क्लेश है और उसका परिणाम दुःख तथा संस्कारों का संचय है। अक्लिष्ट वृत्ति विवेक की ओर ले जाती है और साधना में सहायक होती है।
क्या पाँचों वृत्तियाँ क्लिष्ट और अक्लिष्ट दोनों हो सकती हैं?
हाँ। सूत्र 1.5 के अनुसार पाँचों वृत्तियाँ दोनों रूपों में उठ सकती हैं। उदाहरण के लिए, सुखपूर्ण निद्रा अक्लिष्ट और दुःखपूर्ण निद्रा क्लिष्ट मानी जाती है।
क्या अक्लिष्ट वृत्तियों का भी निरोध करना होता है?
हाँ। साधना में अक्लिष्ट वृत्तियाँ सहायक हैं, परंतु निर्बीज समाधि में उनके संस्कार का भी निरोध हो जाता है (सूत्र 1.50–1.51)।
चित्तवृत्ति निरोध का क्या अर्थ है?
चित्त की वृत्तियों का शांत हो जाना, जिससे द्रष्टा अपने स्वरूप में स्थित होता है (सूत्र 1.2–1.3)।
चित्तवृत्ति निरोध के उपाय क्या हैं?
सूत्रोक्त मुख्य उपाय अभ्यास और वैराग्य है (सूत्र 1.12)। इनके साथ क्रियायोग, अष्टांग योग, प्रतिपक्षभावना, मैत्री आदि भावनाएँ और प्राणायाम भी सहायक हैं।
निद्रा वृत्ति और समाधि में क्या अंतर है?
निद्रा तमस-प्रधान वृत्ति है, जिसमें चेतना ढकी रहती है। समाधि में वृत्तियाँ शांत होती हैं और चेतना जाग्रत रहती है। योग में निद्रा भी निरोध के योग्य वृत्ति है।
डिस्क्लेमर: यह लेख योगसूत्र और उसकी परंपरा के शास्त्रीय अध्ययन के लिए है। ध्यान और प्राणायाम का अभ्यास योग्य गुरु के मार्गदर्शन में करें। यदि आप चिंता, अवसाद या अन्य मानसिक समस्या से जूझ रहे हों, तो योग को चिकित्सा का विकल्प न मानें और चिकित्सक से परामर्श लें।
