ad-1

Dosplay ad 11may

ऊर्जादायी प्राणायाम से प्राण-ऊर्जा को ऊर्ध्वगामी करते हुए एक महिला अभ्यासी पार्क में पद्मासन में बैठी हुई
नियमित प्राणायाम अभ्यास से प्राण-ऊर्जा अधोगामी से ऊर्ध्वगामी होकर संरक्षित होती है।

साधारणतया हमारी ऊर्जा ऊपर से नीचे की ओर विचरण करती है। नीचे की ओर गमन करने वाली इस ऊर्जा को अधोगामी (Downward Energy) कहा गया है। यह ऊर्जा "अधोगामी" होने के कारण लगातार नष्ट होती रहती है। ऊर्जा के लिए प्राणायाम बहुत महत्वपूर्ण है। ये नीचे की ओर जाने वाली ऊर्जा को ऊर्ध्वगामी (Upward Energy) करते हैं और संरक्षित करते हैं।

नियमित प्राणायाम करने से ऊर्जा ऊपर की ओर प्रवाहित होने लगती है। अर्थात् यह मूलाधार से उठ कर सहस्रार चक्र की ओर विचरण करने लगती है। इस क्रिया में बन्धकुम्भक का विशेष महत्व है, अत: एक नियमित अभ्यासी को प्राणायाम में इनका सही प्रयोग करना चाहिए। इस लेख में चार ऐसे प्राणायाम बताए गए हैं जो ऊर्जा को सीधे प्रभावित करते हैं। इन्हें किस समय व किस क्रम में करना चाहिए, यह भी आगे बताया गया है।

अधोगामी ऊर्जा और ऊर्ध्वगामी ऊर्जा में अंतर दिखाता चक्र डायग्राम
अधोगामी ऊर्जा नीचे की ओर जा कर कमजोर होती रहती है, प्राणायाम से यह ऊर्ध्वगामी होकर सहस्रार की ओर प्रवाहित होती है।

(Read this article in English - Pranayama for energy)

विषय सूची :-

ऊर्जा के लिए प्राणायाम कब और किस क्रम में करें

ऊर्जादायी प्राणायाम के लिए सुबह का समय उत्तम माना गया है। लेकिन यदि दिन में किसी अन्य समय पर अभ्यास करना है, तो पेट खाली होना चाहिए। भोजन के बाद कम से कम तीन घंटे का अंतराल रखें।

प्राणायाम के सही क्रम का भी ध्यान रखें। पहले कपालभाति और भस्त्रिका जैसी ऊर्जादायी क्रियाएं करें, इनके बाद अनुलोम विलोम और नाड़ी शोधन जैसे संतुलन देने वाले अभ्यास करें।

4 ऊर्जादायी प्राणायाम

1. कपालभाति

कपालभाति कपाल भाग की शुद्धि करने वाली क्रिया है। यह क्रिया मुख्यत: मस्तिष्क को प्रभावित करती है। इस क्रिया में लगाए जाने वाले बंध व कुम्भक ही असल में ऊर्जा को ऊर्ध्वगामी करने का काम करते हैं। इसके लिए बंध व कुम्भक की मूल अवधारणा समझना उपयोगी रहेगा।

कपालभाति की विधि

  1. पद्मासन या सुखासन में बैठें। दोनों हाथ घुटनों पर रखें। रीढ़ व गर्दन सीधी रखें। आँखें कोमलता से बंद कर लें।
  2. पेट पर दबाव डालते हुए श्वास को तीव्र गति से बाहर निकालें। श्वास लेने की गति सामान्य रखें — केवल श्वास छोड़ने में गति रखें।
  3. क्रिया करते समय मूलबंध लगा कर रखें (गुदा का संकोचन मूलबंध कहलाता है)।
    मूलबंध प्राण-ऊर्जा को मूलाधार में रोककर उसे ऊर्ध्व दिशा में मोड़ने का काम आरंभ करता है — यही अधोगामी ऊर्जा को ऊर्ध्वगामी मोड़ की पहली कड़ी है।
  4. अपनी क्षमता अनुसार आवृत्तियां करने के बाद पूरा श्वास बाहर निकालें, पेट पीछे खींचें (उड्डियान बंध), गर्दन आगे झुकाएं (जालंधर बंध) और कुछ देर खाली श्वास (बाह्य कुम्भक) में रुकें — यह त्रिबंध अवस्था है।
    त्रिबंध एक प्रकार का "ऊर्जा-लॉक" है, जो ऊर्जा को शरीर के भीतर सुरक्षित रोक कर रखता है।
  5. गर्दन सीधी करते हुए पूरा श्वास भरें, फिर गर्दन आगे झुका कर मूलबंध सहित कुछ देर रुकें — यह आन्तरिक कुम्भक है।
    मूलबंध के साथ यह कुम्भक ऊर्जा को मूलाधार से ऊपर की ओर धकेलता है, जिससे वह सहस्रार की दिशा में बढ़ने लगती है।
  6. धीरे-धीरे श्वास बाहर करें और श्वासों को सामान्य कर लें। यह एक आवृत्ति पूरी हुई।
  7. अपनी क्षमता अनुसार अन्य आवृत्तियां करें।
त्रिबंध में जालंधर बंध, उड्डियान बंध और मूलबंध की स्थिति दिखाता डायग्राम
कुम्भक की अवस्था में तीनों बंध — जालंधर, उड्डियान और मूलबंध — एक साथ लगाने से त्रिबंध बनता है, जो ऊर्जा को शरीर में लॉक करता है।

कपालभाति का प्रभाव

  • ऊर्जा को ऊर्ध्वगामी करता है
  • श्वसनतंत्र सुदृढ़ होता है, उसके अवरोध दूर होते हैं
  • हृदय व फेफड़े सक्रिय होते हैं
  • कपाल क्षेत्र की शुद्धि होती है, मस्तिष्क प्रभावित होता है

सावधानियां

  • नए अभ्यासी पहले बिना त्रिबंध/कुम्भक के अभ्यास करें, धीरे-धीरे इन्हें जोड़ें
  • श्वास रोगी व हृदय रोगी कुम्भक का प्रयोग न करें, प्रशिक्षक के निर्देशन में सरलता से करें

(कपालभाति को शुद्धि क्रिया भी माना जाता है — इस बहस को विस्तार से समझें :- कपालभाति शुद्धि क्रिया)

2. भस्त्रिका प्राणायाम

भस्त्रिका एक महत्वपूर्ण ऊर्जादायी अभ्यास है। यह कपालभाति से अधिक तीव्र गति वाली क्रिया है, क्योंकि इसमें श्वास भरना और छोड़ना — दोनों ही बल पूर्वक किए जाते हैं। तीव्र गति से श्वास लेना और अंत में आंतरिक व बाह्य कुम्भक लगाना — यही इसे बाकी प्राणायामों से अधिक ऊर्जादायी बनाता है।

भस्त्रिका की विधि

  1. सुखासन या पद्मासन में बैठें। रीढ़ व गर्दन सीधी रखें। आँखें कोमलता से बंद कर लें।
  2. नासिका से तीव्र गति में श्वास भरें और छोड़ें — जैसे लोहार की धौंकनी चलती है। पेट को हल्का भीतर-बाहर होने दें, कंधे व चेहरा शांत रखें।
  3. लगभग 15-20 श्वासों या जितना सहज लगे, उतनी गति पूर्वक क्रिया करें।
  4. अंत में पूरा श्वास भरें।
  5. गर्दन को थोड़ा आगे झुकाएं, मूलबंध सहित भरे श्वास की स्थिति में कुछ देर रुकें — यह आंतरिक कुम्भक है।
  6. जितनी देर सहज लगे, रुकने के बाद धीरे-धीरे श्वास छोड़ें।
  7. पूरा श्वास बाहर निकलने के बाद फिर से मूलबंध लगाएं, पेट को अंदर की ओर दबाएं (उड्डियान बंध) और गर्दन को आगे की ओर झुकाएं (जालंधर बंध) — भरे श्वास में त्रिबंध अवस्था में कुछ देर रुकें।
  8. क्षमता अनुसार रुकने के बाद त्रिबंध हटाएं, गर्दन व पेट सामान्य करें, मूलबंध शिथिल करें। श्वासों को सामान्य करें।
  9. यह एक आवृत्ति पूरी हुई। आवश्यकता व क्षमता अनुसार और आवृत्तियां करें।
तीव्र श्वासों से उत्पन्न उष्णता, कुम्भक के सहयोग से प्राण-ऊर्जा को नीचे से ऊपर की ओर प्रवाहित (ऊर्ध्वगामी) करने में सहायक होती है, और त्रिबंध इसे शरीर के भीतर लॉक कर देता है। यही क्रिया भस्त्रिका को बाकी प्राणायामों से अधिक ऊर्जा देने वाला बनाती है।

भस्त्रिका का प्रभाव

  • शरीर में उष्णता (गर्मी) उत्पन्न करता है, सुस्ती व आलस्य दूर करता है
  • सर्दी के मौसम में अधिक प्रभावी है (सर्दी के मौसम के लिए विशेष :- सर्दियों में ऊर्जा देने वाले प्राणायाम)
  • फेफड़ों की क्षमता बढ़ाता है
  • मस्तिष्क को सक्रिय व सजग बनाता है

सावधानियां

  • नए अभ्यासी पहले बिना त्रिबंध/कुम्भक के अभ्यास करें, धीरे-धीरे इन्हें जोड़ें
  • हृदय रोगी, उच्च रक्तचाप रोगी और गर्भवती महिलाएं तीव्र गति व कुम्भक से बचें (अधिक जानकारी :- रक्तचाप के लिए प्राणायाम)
  • चक्कर आने पर तुरंत रुक जाएं, श्वास सामान्य करें
  • गर्मी के मौसम में आवृत्तियां सीमित रखें

3. अनुलोम विलोम प्राणायाम

कपालभाति व भस्त्रिका के बाद अनुलोम विलोम करना उत्तम रहता है। इसमें कुम्भक नहीं लगाया जाता, इसलिए यह ऊर्जा को तीव्रता से नहीं बढ़ाता — बल्कि चंद्र नाड़ी व सूर्य नाड़ी को संतुलित करते हुए ऊर्जा को स्थिर व शांत ढंग से बनाए रखता है।

अनुलोम विलोम की विधि

  1. दाईं नासिका बंद करें।
  2. बाईं नासिका से श्वास भरें।
  3. पूरा श्वास भरने के बाद दाईं नासिका से श्वास बाहर निकालें।
  4. फिर दाईं नासिका से श्वास भरें और बाईं तरफ से श्वास बाहर निकालें।
  5. यह एक चक्र पूरा हुआ। इसी प्रकार अन्य आवृत्तियां करें।

(अनुलोम विलोम के लाभ, सावधानियां व नाड़ी शोधन से अंतर विस्तार से जानें :- अनुलोम विलोम प्राणायाम)

4. नाड़ी शोधन प्राणायाम

यह शरीर की 72,000 प्राणिक नाड़ियों का शोधन करने वाला प्राणायाम है। अनुलोम विलोम से इसकी विधि मिलती-जुलती है, अंतर केवल कुम्भक का है — और यही कुम्भक इसे ऊर्जा-संरक्षण के लिए अनुलोम विलोम से अधिक प्रभावी बनाता है।

नाड़ी शोधन की विधि

  1. आरामदायक स्थिति में बैठें, रीढ़ व गर्दन सीधी रखें। बायां हाथ ज्ञान मुद्रा में, दायां हाथ प्राणायाम मुद्रा में रखें।
  2. दाईं नासिका बंद करें, बाईं से धीरे-धीरे लंबा गहरा श्वास भरें। पूरा भरने के बाद दोनों नासिका बंद कर कुछ देर रुकें — यह आन्तरिक कुम्भक है।
    यह ठहराव प्राणिक नाड़ियों में भरे प्राण को कुछ क्षण रोककर उसे ऊपर की दिशा में प्रवाहित होने का अवसर देता है, जिससे ऊर्जा का ह्रास कम होता है।
  3. अपनी क्षमता अनुसार रुकने के बाद दाईं तरफ से धीरे-धीरे श्वास बाहर निकालें, फिर दाईं से ही श्वास भरें।
  4. दाईं नासिका बंद कर कुछ देर रुकें, फिर बाईं तरफ से धीरे-धीरे श्वास बाहर निकालें।
  5. यह एक आवृत्ति हुई। इसी प्रकार जितनी आवृत्तियां सहज लगें, करें।

नाड़ी शोधन का प्रभाव

  • प्राणिक नाड़ियों के अवरोध दूर करता है
  • श्वसनतंत्र सुदृढ़ करता है, फेफड़े सक्रिय करता है
  • शरीर में ऑक्सीजन की पर्याप्त आपूर्ति बनाए रखता है, जिससे हृदय को मजबूती मिलती है
  • ऊर्जा प्रवाह को सही दिशा देता है

सावधानियां

  • गंभीर श्वास रोगी व हृदय रोगी यह प्राणायाम न करें, प्रारंभिक रोगी चिकित्सक की सलाह से करें
  • नए अभ्यासी कम समय के कुम्भक से शुरू करें

चारों प्राणायाम की तुलना

प्राणायाम स्तर कुम्भक मुख्य प्रभाव
कपालभाति शुरुआती-मध्यम वैकल्पिक शुद्धि + ऊर्जा
भस्त्रिका मध्यम-उन्नत अंत में उष्णता + ऊर्जा
अनुलोम विलोम शुरुआती नहीं संतुलन + शांत ऊर्जा
नाड़ी शोधन मध्यम हां नाड़ी शुद्धि + ऊर्जा संरक्षण

सामान्य सावधानियों के लिए प्राणायाम अभ्यास में सावधानियां पढ़ें। प्राणायाम कब नहीं करना चाहिए, यह जानने के लिए देखें :- प्राणायाम कब नहीं करना चाहिए

ध्यान की स्थिति में बैठें

सभी प्राणायाम करने के बाद श्वासों को सामान्य करें। तनाव को दूर करें, प्राणायाम से आए प्रभाव को अनुभव करें।

विधि :

  1. आरामदायक स्थिति में बैठें।
  2. ध्यान को पहले श्वासों पर केंद्रित करें — आते-जाते सांस को अनुभव करें।
  3. फिर ध्यान को श्वासों से हटाकर आज्ञा चक्र पर ले जाएं — इसके लिए ध्यान को ललाट के मध्य में केंद्रित करें।
  4. कुछ देर निर्विचार भाव से बैठें, फिर धीरे-धीरे वापस आ जाएं।
  5. लेट कर शवासन में विश्राम करें।

सारांश

सामान्यत: हमारे शरीर की ऊर्जा अधोगामी होती है और इसका लगातार ह्रास होता रहता है। ऊर्जादायी प्राणायाम इसे ऊर्ध्वगामी करते हैं और इसका संरक्षण करते हैं। इसके लिए कपालभाति, भस्त्रिका, अनुलोम विलोम और नाड़ी शोधन — ये चार प्राणायाम सबसे प्रभावी हैं। इन्हें सुबह खाली पेट, सही क्रम में और अपनी क्षमता अनुसार ही करें।

FAQ

अधोगामी और ऊर्ध्वगामी ऊर्जा क्या होती हैं?
अधोगामी का अर्थ है — नीचे की ओर जाने वाला। ऊर्ध्वगामी का अर्थ है — ऊपर की ओर जाने वाला। सामान्य अवस्था में शरीर की ऊर्जा ऊपर से नीचे की ओर प्रवाहित होती है, इसलिए इसे अधोगामी ऊर्जा कहा जाता है। यह धीरे-धीरे क्षीण हो जाती है। जो ऊर्जा मूलाधार से उठकर सहस्रार की ओर प्रवाहित होती है, उसे ऊर्ध्वगामी कहा गया है। यह शरीर को ऊर्जावान बनाए रखने में सहायक होती है, और कुंडलिनी जागरण में इसका विशेष महत्व है।

ऊर्जा के लिए सबसे अच्छा प्राणायाम कौन सा है?
कपालभाति और भस्त्रिका सबसे तेज़ ऊर्जा देते हैं, जबकि अनुलोम विलोम व नाड़ी शोधन ऊर्जा को संतुलित ढंग से संरक्षित करते हैं। दोनों तरह के प्राणायाम एक साथ करना उत्तम रहता है।

क्या भस्त्रिका रोज़ करना चाहिए?
हां, स्वस्थ व्यक्ति इसे नियमित कर सकते हैं। नए अभ्यासी अपनी क्षमता के अनुसार आवृत्तियां करें — बलपूर्वक, अधिक आवृत्ति या क्षमता से अधिक देर श्वास रोकने का प्रयास न करें। गर्मी के मौसम में आवृत्तियां सीमित रखें।

ऊर्जा के लिए प्राणायाम किस समय करना चाहिए?
सुबह खाली पेट करना सबसे उत्तम रहता है। भोजन के बाद कम से कम तीन घंटे का अंतराल रखें।

क्या श्वास रोगी और हृदय रोगी यह अभ्यास कर सकते हैं?
नहीं, ये अभ्यास केवल स्वस्थ व्यक्तियों के लिए हैं। श्वास रोगी और हृदय रोगी को केवल "अनुलोम विलोम" और "श्वास प्रश्वास" (लंबे गहरे सांस लेना और छोड़ना) जैसे सरल प्राणायाम चिकित्सक की सलाह से करने चाहिए।

Disclaimer

यह लेख किसी प्रकार के रोग उपचार हेतु नहीं है। इस लेख का उद्देश्य केवल योग की जानकारी देना है। लेख में बताए गए प्राणायाम मुख्यत: स्वस्थ व्यक्तियों के लिए हैं। किसी प्रकार के रोगी अपने चिकित्सक की सलाह के बिना कोई योग क्रिया न करें।

Post a Comment