हृदय हमारे शरीर का सबसे महत्वपूर्ण अंग है — यह जीवनभर बिना रुके रक्त-संचार की क्रिया करता रहता है। अनियमित जीवनशैली, असंतुलित आहार, बढ़ा हुआ रक्तचाप, अत्यधिक कोलेस्ट्रॉल और मानसिक तनाव — ये सभी कारण धीरे-धीरे हृदय को प्रभावित करने लगते हैं और समय के साथ हृदय रोग का रूप ले सकते हैं। योगाभ्यास इस दिशा में एक उत्तम उपाय है — आसन शरीर के आंतरिक अंगों को सक्रिय रखते हुए रक्त-संचार को सुचारु बनाते हैं, और प्राणायाम श्वसन तंत्र व हृदय को सुदृढ़ बनाकर रक्तचाप को संतुलित रखने में सहायक होता है। इस लेख में हृदय के लिए विशेष लाभकारी आसन व प्राणायाम की सही विधि, उनके लाभ और आवश्यक सावधानियां विस्तार से बताई जाएंगी।
![]() |
| नियमित योगासन हृदय को स्वस्थ रखने में सहायक होते हैं। |
विषय सूची:
- हृदय के लिए योगासन का क्या महत्व है?
- सावधानी आसन अभ्यास में
- हृदय के लिए प्राणायाम का क्या महत्व है?
- प्राणायाम अभ्यास में सावधानियां
- हृदय के लिए योग के वैज्ञानिक लाभ
- सारांश
- FAQ
हृदय के लिए योगासन का क्या महत्व है?
हृदय को स्वस्थ रखने के लिए योगाभ्यास में आसनों का विशेष महत्व है। नियमित योगासन शरीर के आंतरिक व बाह्य अंगों को सक्रिय रखते हैं, फेफड़ों तथा हृदय को सुदृढ़ बनाते हैं, और रक्त-प्रवाह को सुचारु बनाए रखते हैं। यद्यपि सभी आसन शरीर के लिए लाभकारी होते हैं, कुछ विशेष अभ्यास हैं जो हृदय को स्वस्थ रखने में विशेष भूमिका निभाते हैं। आइए आगे इनको विस्तार से समझ लेते हैं।
सूक्ष्म आसन (वार्म-अप)
मुख्य आसन शुरू करने से पहले शरीर को तैयार करना ज़रूरी है, ताकि मांसपेशियों व जोड़ों पर अचानक दबाव न पड़े। इसके लिए खड़े होकर 2-3 मिनट या अपनी क्षमता अनुसार हल्की जॉगिंग करें, फिर पैरों में सुविधाजनक दूरी बनाकर श्वास सामान्य होने तक कुछ देर विश्राम करें। यह शरीर को अगले आसनों के लिए तैयार करता है।
ताड़ासन व हस्तपादासन
श्वास सामान्य होने के बाद ताड़ासन की स्थिति में खड़े हो जाएं। धीरे-धीरे दोनों हाथों को ऊपर की ओर खींचते हुए पूरे शरीर में हल्का खिंचाव महसूस करें। इसके बाद श्वास छोड़ते हुए कमर से आगे झुकें और हस्तपादासन में माथे को घुटनों के पास ले जाने का प्रयास करें। हाथों में खिंचाव बनाए रखते हुए वापस आ जाएं। ये दोनों अभ्यास रीढ़ की हड्डी को लचीला बनाते हैं और रक्त-संचार को सिर की दिशा में बढ़ाकर मस्तिष्क को सक्रिय करते हैं।
लाभ:
- रीढ़ व मांसपेशियों में लचीलापन बढ़ाता है
- रक्त-संचार हृदय और सिर की ओर प्रवाहित करता है
- कमर व पेट की मांसपेशियों को सुदृढ़ करता है
कमर चक्रासन (कटिचक्रासन)
दोनों पैरों को सामने की ओर सीधा करके मैट पर बैठ जाएं। इसमें कमर को क्रमशः दाएं-बाएं घुमाकर दायां हाथ बाएं पंजे के पास और बायां हाथ दाएं पंजे के पास ले जाया जाता है — रक्त-संचार को व्यवस्थित करने वाला यह कमर चक्रासन कुछ आवर्तियों तक करने के बाद वापस आ जाएं और विश्राम करें।
लाभ:
- रक्त-संचार व्यवस्थित होता है
- कमर-पेट की चर्बी घटाता है
- रीढ़ को लचीला बनाता है
वज्रासन पोज के आसन
दोनों पैरों को मोड़कर घुटनों के बल वज्रासन पोज में बैठ जाएं। रीढ़ सीधी रखते हुए दोनों हाथ घुटनों पर रखें। इस मुद्रा में उष्ट्रासन व शशांक आसन का क्रमशः अभ्यास करें।
लाभ:
- वज्रासन पाचन तंत्र सुदृढ़ करता है
- उष्ट्रासन रीढ़ को सुदृढ़ करता है
- शशांक आसन रक्तचाप को संतुलित करता है
- मानसिक शांति देता है
भुजंग आसन व धनुरासन
वज्रासन के बाद सीने के बल लेटकर पहले भुजंग आसन का अभ्यास करें — इसमें हाथों का सहारा लेकर धीरे-धीरे सीना ऊपर उठाया जाता है, क्षमता अनुसार कुछ देर रुककर धीरे से वापस आएं और विश्राम करें। विश्राम के बाद इसका सहायक आसन धनुरासन करें — घुटनों को मोड़कर टखनों को पकड़ें, मिले हुए घुटनों को ऊपर उठाएं और साथ ही सीना भी ऊपर उठाएं। क्षमता अनुसार रुकने के बाद वापस आ जाएं।
लाभ:
- ये दोनों आसन एक-दूसरे के सहायक अभ्यास हैं, इसलिए रीढ़ को लचीला व मजबूत बनाते हैं
- हृदय-फेफड़े सक्रिय रखते हैं
- पेट-जांघ की चर्बी घटाते हैं
सर्वांग आसन व मत्स्य आसन
पेट के बल आसन करने के बाद पीठ के बल आ जाएं। इस स्थिति में सर्वांग आसन का अभ्यास करें — इसमें पूरे शरीर का भार कंधों पर संतुलित करते हुए पैरों को ऊपर की ओर उठाया जाता है। यह हृदय की ओर रक्त-संचार को विशेष रूप से सरल बनाने वाला आसन माना जाता है। इसके तुरंत बाद इसका पूरक आसन मत्स्य आसन का अभ्यास अवश्य करें — लेटकर पद्मासन की मुद्रा में पैर मोड़ें, फिर कोहनियों के सहारे पीठ को ऊपर उठाएं। यह सर्वांग आसन के लाभ को संतुलित करता है।
![]() |
| सर्वांग आसन | Sarvangasana for Heart. |
लाभ:
- सर्वांग आसन रक्त-प्रवाह सुगम बनाता है
- मत्स्य आसन इसका पूरक होकर लाभ बढ़ाता है
- थायरॉइड ग्रंथि सक्रिय करता है
शवासन
सभी आसनों के अभ्यास के बाद पीठ के बल सीधे लेट जाएं। दोनों पैरों में सुविधाजनक दूरी रखें, हाथों को शरीर से थोड़ी दूरी पर रखें और हथेलियां आकाश की ओर खुली छोड़ दें। आंखें कोमलता से बंद करें और श्वास को पूरी तरह स्वाभाविक होने दें। शरीर के हर अंग को क्रमशः ढीला छोड़ते हुए मन को शांत रखें। अपनी क्षमता व समयानुसार कुछ मिनट इस स्थिति में विश्राम करने के बाद धीरे-धीरे करवट लेते हुए बैठने की स्थिति में आ जाएं।
लाभ:
- शरीर व मन को पूर्ण विश्राम देता है
- रक्तचाप सामान्य स्तर पर लाता है
- मानसिक तनाव व थकान दूर करता है
- अभ्यास किए गए आसनों के लाभ को शरीर में अवशोषित करने में सहायक है
सावधानी आसन अभ्यास में
नियमित आसन का अभ्यास हृदय के लिए लाभकारी होता है, लेकिन हृदय रोग से प्रभावित व्यक्ति इस अभ्यास को कुछ सावधानियों के साथ करें:
आरम्भिक रोगी:
- चिकित्सक की सलाह लेकर सावधानी से अभ्यास करें
- औषधि का सेवन बंद न करें
- क्षमता से अधिक अभ्यास न करें
- धीमी गति से कम आवृत्ति के साथ अभ्यास करें
- लगातार अभ्यास न करें — एक आसन के बाद दूसरा आसन करने से पहले विश्राम करें
गम्भीर रोगी:
- कठिन व तनाव वाले आसन का अभ्यास न करें
- चिकित्सक की सलाह से केवल सूक्ष्म आसन करें
- चिकित्सक द्वारा बताई गई औषधि का सेवन करते रहें
हृदय रोग प्रभावित व्यक्ति अपनी अवस्था अनुसार हृदय-रोगी के लिये योग अपनाएं।
हृदय के लिए प्राणायाम का क्या महत्व है?
हृदय को स्वस्थ रखने के लिए प्राणायाम का विशेष महत्व बताया गया है। योगाभ्यास में यह एक श्वसन-आधारित क्रिया है, जो रक्तचाप को सामान्य रखती है, श्वसन तंत्र को सुदृढ़ बनाती है और प्राणिक-नाड़ियों के अवरोध दूर करती है।
लाभदाई प्राणायाम
योगाभ्यास में आसन के बाद प्राणायाम का अभ्यास करना उत्तम माना गया है। इसलिए आसन का अभ्यास करने के बाद कुछ देर विश्राम करें और उसके बाद प्राणायाम का अभ्यास करें।
![]() |
| प्राणायाम अभ्यास के लिए रीढ़ सीधी रखकर आरामदायक मुद्रा में बैठें। |
बैठने की स्थिति: बैठने की स्थिति का चयन अपनी शारीरिक क्षमता अनुसार करें। पद्मासन या सुखासन में बैठना उत्तम माना जाता है, लेकिन यदि नीचे बैठना सम्भव न हो तो कुर्सी पर बैठकर अभ्यास करें। रीढ़ को सीधा रखें, आंखों को कोमलता से बंद करें।
कौनसे प्राणायाम करें? योगाभ्यास में कई प्राणायाम बताए गए हैं, लेकिन हृदय के लिए कुछ विशेष अभ्यास हैं जो रक्तचाप को संतुलित करते हैं और हृदय को स्वस्थ रखने में सहायक होते हैं। इनका नियमित अभ्यास इसी क्रम से करें:
कपालभाति
इस अभ्यास में बलपूर्वक श्वास बाहर निकालना और सामान्य गति से श्वास लेना होता है। यदि आप हृदय रोग से प्रभावित हैं तो कपालभाति धीमी गति से करें। क्षमता अनुसार करने के बाद वापस आ जाएं, श्वास सामान्य करें और अगला अभ्यास अनुलोम विलोम करें।
सावधानी: स्वस्थ व्यक्ति इस अभ्यास को गतिपूर्वक करते हैं, लेकिन हृदय रोग से प्रभावित व्यक्ति धीमी गति से ही करें।
लाभ: श्वसनतंत्र सुदृढ़ होता है, रक्त-संचार व्यवस्थित होता है।
अनुलोम विलोम
दाएं हाथ से दाईं नासिका बंद करके बाईं नासिका से श्वास लें, दाईं तरफ से श्वास बाहर निकालें। फिर दाईं नासिका से श्वास लेकर बाईं नासिका से श्वास बाहर निकालें। इस प्रकार एक नासिका से श्वास लेना और दूसरी नासिका से श्वास छोड़ना अनुलोम विलोम प्राणायाम है।
सावधानी: इस अभ्यास को बाईं नासिका से शुरू करके बाईं नासिका से ही समाप्त करें। इसमें श्वास रोकने की आवश्यकता नहीं है।
लाभ: कपालभाति की ऊर्जा को संतुलित करता है, रक्तचाप सामान्य रखने में सहायक होता है।
भ्रामरी प्राणायाम
दोनों कानों को अंगूठों से बंद करें। श्वास भरें और कंठ से गुंजन की आवाज़ निकालें। श्वास पूरा खाली होने के बाद पुनः श्वास भरें और उसी क्रिया को दोहराएं। क्षमता अनुसार करने के बाद वापस आ जाएं।
सावधानी: श्वास-क्षमता अनुसार ही गुंजन करें। कानों को अंगूठों से इस प्रकार बंद करें कि केवल गुंजन की ध्वनि सुनाई दे।
लाभ: स्मरण-शक्ति व श्रवण-शक्ति सुदृढ़ होती है, मानसिक शांति मिलती है।
नाड़ी शोधन
प्राणिक नाड़ियों का शुद्धिकरण करने वाला नाड़ी शोधन प्राणायाम करें। इसके लिए बाईं नासिका से श्वास लें, क्षमता अनुसार श्वास रोकें और उसके बाद दाईं तरफ से श्वास बाहर निकालें। इसी क्रिया को दाईं तरफ से भी दोहराएं। क्षमता अनुसार अभ्यास करने के बाद वापस आ जाएं, श्वास सामान्य करें।
सावधानी: कमज़ोर श्वसन वाले व्यक्ति यह अभ्यास न करें — यह केवल स्वस्थ-श्वसन वाले व्यक्तियों के लिए है।
लाभ: प्राणिक नाड़ियों का शोधन करता है, श्वसन तंत्र सुदृढ़ करता है, ऑक्सीजन-आपूर्ति में सहायक है।
प्राणायाम अभ्यास में सावधानियां
- अपनी श्वास-क्षमता अनुसार ही अभ्यास करें, क्षमता से अधिक न करें
- हृदय व श्वास रोगी चिकित्सक की सलाह के बिना प्राणायाम न करें
- गम्भीर हृदय रोगी प्राणायाम का अभ्यास न करें — चिकित्सक की सलाह लें और नियमित औषधि सेवन करते रहें
हृदय के लिए योग के वैज्ञानिक लाभ
- रक्तचाप व कोलेस्ट्रॉल (LDL) संतुलित रखने में सहायक
- हृदय-गति परिवर्तनशीलता (Heart Rate Variability) में सुधार
- तनाव-हार्मोन (कॉर्टिसोल) का स्तर कम करता है
- फेफड़ों की ऑक्सीजन-ग्रहण क्षमता बढ़ाता है
सारांश
हृदय को स्वस्थ रखने के लिए नियमित आसन व प्राणायाम अत्यंत लाभकारी हैं। हृदय रोग से प्रभावित व्यक्ति इन्हें केवल चिकित्सक की सलाह व सावधानियों के साथ ही करें। संतुलित आहार व नियमित अभ्यास मिलकर हृदय को दीर्घकाल तक स्वस्थ रख सकते हैं।
FAQ
हृदय के लिए सबसे अच्छा आसन कौन सा है?
सर्वांग आसन व भुजंग आसन हृदय के लिए उत्तम आसन माने जाते हैं — ये अभ्यास रक्त-संचार को सरल बनाते हैं। ये केवल स्वस्थ व्यक्तियों के लिए हैं, और इनके साथ सहायक आसन (मत्स्य आसन व धनुरासन) का अभ्यास भी करना चाहिए।
हृदय के लिए सबसे सुरक्षित प्राणायाम कौन सा है?
हृदय के लिए अनुलोम विलोम व भ्रामरी प्राणायाम सुरक्षित माने जाते हैं।
क्या हृदय रोगी योगाभ्यास कर सकते हैं?
रोग की आरम्भिक अवस्था में चिकित्सक की सलाह से सरल आसन व सरल प्राणायाम का अभ्यास किया जा सकता है। रोग की गम्भीर अवस्था में अभ्यास नहीं करना चाहिए।
क्या योग से हृदय रोग पूरी तरह ठीक हो सकता है?
योगाभ्यास रोग ठीक करने का साधन नहीं है। इसका नियमित अभ्यास रक्तचाप, कोलेस्ट्रॉल और तनाव को नियंत्रित करके हृदय को स्वस्थ रखने में सहायक होता है। रोगग्रस्त होने पर चिकित्सा सहायता अवश्य लें।
Disclaimer: यह लेख चिकित्सा हेतु नहीं है। इस लेख का उद्देश्य योग की जानकारी देना है। रोग प्रभावित व्यक्ति चिकित्सक की सलाह अवश्य लें। सभी अभ्यास अपनी शारीरिक क्षमता अनुसार करें — बलपूर्वक व क्षमता से अधिक किया गया अभ्यास हानिकारक हो सकता है।


