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भस्त्रिका प्राणायाम योग का एक अत्यंत महत्वपूर्ण श्वसन अभ्यास है। यह प्राणायाम न केवल शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार लाता है, बल्कि आध्यात्मिक विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। नियमित अभ्यास से यह फेफड़ों और श्वसन तंत्र को सुदृढ़ करता है, शरीर की ऑक्सीजन क्षमता में वृद्धि करता है, तथा रक्त संचार और प्रतिरक्षा प्रणाली (Immunity) को मजबूत बनाता है।

विशेषकर सर्दी के मौसम में यह प्राणायाम अत्यंत लाभकारी माना जाता है। हालांकि, इस प्राणायाम को सही विधि और सही क्रम से करना आवश्यक है। गलत तरीके से किए गए अभ्यास से शारीरिक हानि भी हो सकती है।

इस आर्टिकल को English Language में पढ़ने के लिए देखें - Bhastrika Pranayama: Complete 4-Stage Guide

सुखासन मुद्रा में बैठकर भस्त्रिका प्राणायाम का अभ्यास करती महिला
सुखासन मुद्रा में भस्त्रिका प्राणायाम का अभ्यास करती महिला।

विषय सूची 

  • भस्त्रिका प्राणायाम क्या है?
  • कपालभाति और भस्त्रिका में क्या अंतर है?
  • नाड़ियों का महत्व और 4-चरणीय विधि
  • भस्त्रिका प्राणायाम की सही विधि
  • चरण-दर-चरण विधि
  • सावधानियां
  • किस को वर्जित है
  • भस्त्रिका प्राणायाम के लाभ

भस्त्रिका प्राणायाम क्या है?

"भस्त्रिका"  संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है "धौंकनी"। लोहार अपनी भट्ठी की अग्नि को तेज करने के लिए जिस प्रकार धौंकनी का उपयोग करता है, उसी प्रकार यह प्राणायाम शरीर की आंतरिक अग्नि (जठराग्नि) को जागृत करता है।

परिभाषा और विशेषता

भस्त्रिका एक गतिपूर्वक किया जाने वाला प्राणायाम है जिसमें श्वास को तीव्र गति से और बलपूर्वक लिया और छोड़ा जाता है। इसे "योगिक अग्नि श्वास" (Yogic Fire Breath) भी कहा जाता है क्योंकि यह शरीर में तुरंत ऊर्जा का संचार करता है और आंतरिक ऊष्मा (Energy) उत्पन्न करता है।

कपालभाति और भस्त्रिका में क्या अंतर है?

भस्त्रिका और कपालभाति दोनों में कुछ समानता दिखाई देती है। लेकिन इन दोनों की विधि और प्रभाव में कुछ बुनियादी अंतर हैं:

विशेषता भस्त्रिका कपालभाति
श्वास लेना तीव्र गति सहज गति
श्वास छोड़ना तीव्र गति तीव्र गति
मुख्य जोर दोनों पर समान बल केवल निष्कासन (Exhalation) पर
बंध आवश्यक वैकल्पिक
कुम्भक आवश्यक वैकल्पिक
नए अभ्यासी सावधानी के साथ सरलता से कर सकते हैं
मुख्य लाभ ऊर्जा, नाड़ी सक्रियकरण कपाल भाग की शुद्धि, मानसिक स्पष्टता
उपयुक्त ऋतु सर्दी और शरद ऋतु सभी ऋतुएँ
प्रकृति प्राणायाम शुद्धि क्रिया

भस्त्रिका एक ऊर्जादायी अभ्यास है जो प्राणिक नाड़ियों की ऊर्जा को जागृत करता है। इसकी 4-चरण वाली विधि जानने से पहले हमें नाड़ियों का महत्व समझना होगा।

नाड़ियों का महत्व और 4-चरणीय विधि

हमारे शरीर का प्राण-संचार सूक्ष्म नाड़ियों द्वारा किया जाता है। इनको प्राणिक नाड़ियां कहा गया है। प्राचीन योग ग्रंथों में इनकी संख्या 72,000 बताई गई है। इनमें तीन नाड़ियां मुख्य हैं।

तीन प्राणिक नाड़ियां 

हमारे शरीर में तीन प्राथमिक ऊर्जा नाड़ियां हैं। ये मूलाधार से उठकर रीढ़ से होते हुए सहस्रार (शीर्ष) तक जाती हैं। ये ऊर्जा का मूल स्रोत हैं। भस्त्रिका प्राणायाम इन तीनों को प्रभावित करता है।

1. इड़ा नाड़ी (चंद्र नाड़ी)

  • बाएं नासिका द्वार से संबंधित
  • शीतलता, मानसिक शांति और अंतर्मुखी ऊर्जा देती है
  • सूर्य नाड़ी की ऊर्जा को संतुलित करती है 

2. पिंगला नाड़ी (सूर्य नाड़ी)

  • दाएं नासिका द्वार से संबंधित
  • गर्म, सक्रिय और बाह्य-केंद्रित ऊर्जा देती है
  • शारीरिक शक्ति और मानसिक सतर्कता बढ़ाती है

3. सुषुम्ना नाड़ी (केंद्रीय नाड़ी)

  • रीढ़ की हड्डी के केंद्र में स्थित
  • कुंडलिनी ऊर्जा का मार्ग
  • आध्यात्मिक विकास के लिए सबसे महत्वपूर्ण

4-चरणीय प्रगति का महत्व

कुछ योग प्रशिक्षक भस्त्रिका का अभ्यास केवल एक चरण में ही करवाते हैं। लेकिन परंपरागत योग पद्धति में इस अभ्यास को चार चरणों में किया जाता है। यह क्रमिक विधि अत्यंत महत्वपूर्ण है:

  1. पहला चरण: पिंगला नाड़ी को जागृत करता है (दाएं नासिका द्वार से)
  2. दूसरा चरण: इड़ा नाड़ी को जागृत करता है (बाएं नासिका द्वार से)
  3. तीसरा चरण: दोनों नाड़ियों को संतुलित करता है (गतिपूर्वक नाड़ी शोधन)
  4. चौथा चरण: सुषुम्ना नाड़ी को जागृत करता है (दोनों नासिकाओं से)

भस्त्रिका प्राणायाम की सही विधि

भस्त्रिका प्राणायाम का चार चरण वाला अभ्यास शुरू करने से पहले अभ्यास की पूर्व-तैयारी और आवश्यक नियम को समझना जरूरी है।

अभ्यास की पूर्व-तैयारी

आवश्यक नियम:

  • आरामदायक आसन (पद्मासन, सुखासन या वज्रासन)
  • रीढ़, गर्दन और सिर को सीधा रखना आवश्यक है
  • खाली पेट (भोजन के 3-4 घंटे बाद)
  • प्रातः काल (सूर्योदय से पहले) सर्वोत्तम समय
  • शांत और स्वच्छ वातावरण

प्रारंभिक शुद्धि अभ्यास:

  • इस अभ्यास से पहले कुछ नियमित प्राणायाम जैसे - कपालभाति, अनुलोम विलोम और नाड़ी शोधन का अभ्यास भी करना चाहिए
  • यदि नासिका में रुकावट हो तो जलनेति शुद्धि क्रिया करें

प्राणायाम मुद्रा (हाथ की स्थिति)

भस्त्रिका प्राणायाम के लिए दाएं हाथ की प्राणायाम मुद्रा
दाएं हाथ की प्राणायाम मुद्रा: अंगूठा दाईं नासिका पर और अनामिका बाईं नासिका पर।

दाएं हाथ को प्राणायाम मुद्रा में रखें

  1. तर्जनी (index finger) और मध्यमा (middle finger) को हथेली की ओर मोड़ें
  2. कनिष्ठका (pinky finger) और अनामिका (ring finger) को नासिका के बाईं तरफ रखें 
  3. अंगूठा नासिका के दाईं तरफ

चरण-दर-चरण विधि

प्रथम चरण: पिंगला नाड़ी का सक्रिय करण (सूर्य नाड़ी)

उद्देश्य: शरीर को ऊर्जावान बनाना और सूर्य ऊर्जा को जागृत करना

विधि प्रथम चरण:

  1. बाईं नासिका को अनामिका-उंगली के हल्के दबाव से बंद करें
  2. दाईं नासिका से श्वास तीव्र गति लें और छोड़ें 
  3. श्वास लेने और छोड़ने की गति अपनी क्षमता अनुसार रखें 
  4. क्षमता अनुसार अभ्यास करने के बाद अंत में गहरी श्वास लें और दाईं नासिका को बंद करें
  5. बाईं नासिका से धीरे-धीरे श्वास छोड़ें
  6. सामान्य श्वास में वापस आ जाएं 

प्रभाव: शरीर में गर्मी और ऊर्जा की अनुभूति होगी।

विश्राम: 5-10 सेकंड सामान्य श्वास लें और श्वास को विश्राम दें।

द्वितीय चरण: इड़ा नाड़ी का जागरण (चंद्र नाड़ी)

उद्देश्य: शीतलता, ऊर्जा-संतुलन तथा चंद्र नाड़ी को जागृत करना

विधि द्वितीय चरण:

  1. प्राणायाम मुद्रा को समायोजित करें - अब अंगूठे से दाईं नासिका बंद करें
  2. बाईं नासिका से गतिपूर्वक श्वास लें और छोड़ें 
  3. धीमी गति से शुरू करें और धीरे-धीरे गति बढ़ाएं
  4. क्षमता अनुसार अभ्यास करें (प्रथम चरण के बराबर)
  5. अभ्यास के अंत में बाईं नासिका से गहरी श्वास लें
  6. दाईं नासिका से धीरे-धीरे श्वास छोड़ें
  7. सामान्य श्वास में वापस आ जाएं 

प्रभाव: शीतलता और शांति की अनुभूति होगी

विश्राम: 5-10 सेकंड सामान्य श्वास लें

तृतीय चरण: नाड़ी संतुलन 

उद्देश्य: इड़ा और पिंगला नाड़ियों को संतुलित करना

विधि तृतीय चरण:

  1. प्राणायाम मुद्रा को पूर्व स्थिति में रखें
  2. दाईं नासिका से गहरी श्वास लें
  3. दाईं नासिका बंद करें
  4. बाईं नासिका से श्वास छोड़ें
  5. बाईं नासिका से श्वास लें (बिना रुके)
  6. बाईं नासिका बंद करें
  7. दाईं नासिका से श्वास छोड़ें
  8. यह प्रक्रिया 10-15 बार दोहराएं
  9. गति को धीरे-धीरे बढ़ाएं 
  10. अंतिम श्वास दाईं नासिका से छोड़ें

विशेष: इस चरण में बहुत गति न करें - नियंत्रित और सचेत रहें

विश्राम: 10-15 सेकंड सामान्य श्वास लें

चतुर्थ चरण: सुषुम्ना का सक्रियकरण (मुख्य अभ्यास)

उद्देश्य: दोनों नाड़ियों के संतुलित ऊर्जा से सुषुम्ना नाड़ी को जागृत करना

बैठने की स्थिति:

  • पद्मासन या सुखासन में बैठें
  • दोनों घुटनों को दोनों हाथों से पकड़ें
  • रीढ़ को पूर्णतः सीधा रखें
  • आँखें बंद करें

विधि चतुर्थ चरण:

  1. दोनों नासिकाओं से तीव्र गति से श्वास लें और छोड़ें
  2. धीमी गति से शुरू करें और धीरे-धीरे गति बढ़ाएं
  3. अपने श्वास की क्षमता अनुसार अभ्यास करें 
  4. अभ्यास के अंत में दोनों नासिकाओं से गहरी श्वास लें
  5. श्वास को अंदर रोकें (कुंभक) - अपनी क्षमता के अनुसार (5-10 सेकंड)
  6. धीरे-धीरे श्वास बाहर निकलें
  7. खाली श्वास (बाह्य कुम्भक) की अवस्था में त्रिबंध लगाकर कुछ देर रुकें।
  8. क्षमता अनुसार रुकने के बाद तीनों बंध हटाएं
  9. श्वास सामान्य करें 

विशेष: नए अभ्यासी आरम्भ में बिना बंध व कुम्भक का अभ्यास करें।

बंधों का अनुप्रयोग (त्रिबंध):

श्वास भरने के बाद और पूरी तरह बाहर निकालने के बाद:

  1. जालंधर बंध: ठुड्डी को कोमलता से छाती की ओर झुकाएं
  2. उड्डियान बंध: निचले पेट को अंदर की ओर और ऊपर की ओर खींचें
  3. मूल बंध: पेल्विक फ्लोर की मांसपेशियों को धीरे से संकुचित करें

इन तीनों बंधों को एक साथ लागू करने को त्रिबंध या महाबंध कहते हैं। इस अभ्यास में बंध और कुम्भक का विशेष महत्व है।

इसी अवस्था में 5-10 सेकंड या अपनी क्षमता अनुसार रुकें। अंत में सभी बंधों को एक-एक करके बारी-बारी हटाएं। श्वास को सामान्य करें।

विश्राम और समापन:

  • 30-60 सेकंड सामान्य श्वास लें
  • दूसरा राउंड करने से पहले पूरी तरह शांत हो जाएं
  • 2-3 राउंड तक अभ्यास करें

सावधानियां

यह प्राणायाम सभी स्वस्थ स्त्री-पुरुष, युवा-वृद्ध कर सकते हैं। लेकिन इस अभ्यास में कुछ सावधानियों को ध्यान में रखना चाहिए।
  1. नए साधकों (Beginners) को यह अभ्यास आरम्भ में धीमी गति से करना चाहिए।
  2. नए अभ्यासी और कमजोर श्वसन वाले व्यक्ति को श्वास रोकने (कुंभक) का अभ्यास नहीं करना चाहिए।
  3. यह अभ्यास सभी व्यक्तियों को अपने श्वास की क्षमता अनुसार करना चाहिए।
  4. बलपूर्वक अभ्यास न करें। धीरे-धीरे अभ्यास को बढ़ाएं।
  5. प्राणायाम के साधक को शुद्धि क्रियाओं को भी करना चाहिए। यदि नासिका में कोई रुकावट है तो इसके लिए जलनेति क्रिया करें।

किस को वर्जित है?

कुछ अवस्थाओं में इस प्राणायाम का अभ्यास नहीं करना चाहिए। कुछ व्यक्तियों के लिए यह अभ्यास हानिकारक हो सकता है इसलिए इन व्यक्तियों को यह अभ्यास नहीं करना चाहिए।

  • यह प्राणायाम केवल सर्दी के मौसम में ही करें। गर्मियों के मौसम में इसका अभ्यास न करें।
  • अस्थमा पीड़ित और हृदय रोगी इस प्राणायाम को न करें।
  • गर्भवती महिलाओं के लिए यह प्राणायाम वर्जित है।
  • ऐसे व्यक्ति जिनके पेट की हाल ही में कोई सर्जरी हुई हो तो वे इस प्राणायाम को न करें।
  • उच्च रक्तचाप वाले या तो धीमी गति से करें या प्रशिक्षक, चिकित्सक की सलाह से करें। 
  • जो व्यक्ति इस प्राणायाम को नहीं कर सकते हैं, वे केवल अनुलोम विलोम  का अभ्यास करें।

भस्त्रिका प्राणायाम के लाभ :

  • इस प्राणायाम से कफ, वात और पित्त तीनों में समन्वय (Balance) बना रहता है
  • ईडा, पिंगला और सुषुमना तीनों नाड़ी प्रभावित होती है
  • यह अभ्यास कुंडलिनी जागरण में भी सहायक होता है 
  • लंग्स और श्वसन प्रणाली सुदृढ होती है
  • आक्सीजन प्रयाप्त मात्रा में मिलने के कारण हृदय को मजबूती मिलती है
  • तीव्र गति से श्वास छोड़ते समय कार्बन डाइऑक्साइड  के साथ हानिकारक तत्व बाहर निकलते हैं।
  • रक्तचाप सामान्य रहता है।
  • बन्ध लगाने से शक्तियाँ उर्ध्वगामी होती हैं।
  • शरद ऋतु का यह सर्वोत्तम प्राणायाम है।

सारांश 

भस्त्रिका प्राणायाम श्वसनतंत्र को सुदृढ करने के लिए एक सर्वोत्तम क्रिया है। यह प्राणायाम शीत ऋतु में विशेष लाभकारी है। इस अभ्यास को गर्मियों के मौसम में नहीं करना चाहिए।

FAQ (Frequently Asked Questions)

भस्त्रिका प्राणायाम कितनी देर करना चाहिए?

इस अभ्यास में चार चरणों का एक राउंड लगभग 5 से 10 मिनट तक किया जा सकता है। प्रत्येक चरण के बाद कुछ समय विश्राम करें। कुम्भक का समय अपनी श्वास क्षमता के अनुसार निर्धारित करें।

क्या भस्त्रिका और कपालभाति एक ही हैं?

नहीं। कपालभाति में मुख्य रूप से श्वास छोड़ने पर जोर दिया जाता है, जबकि भस्त्रिका में श्वास लेना और छोड़ना दोनों सक्रिय रूप से किए जाते हैं।

भस्त्रिका प्राणायाम का सबसे बड़ा लाभ क्या है?

यह प्राणायाम फेफड़ों को सुदृढ़ करता है, शरीर में ऊर्जा बढ़ाता है तथा श्वसन तंत्र को सक्रिय और मजबूत बनाता है।

क्या गर्मियों में भस्त्रिका प्राणायाम कर सकते हैं?

नए अभ्यासी तथा उच्च रक्तचाप वाले व्यक्तियों को गर्मियों में इस अभ्यास से बचना चाहिए। नियमित और अनुभवी योग साधक इसे सीमित मात्रा में तथा धीमी गति से कर सकते हैं।

क्या उच्च रक्तचाप वाले व्यक्ति भस्त्रिका कर सकते हैं?

उच्च रक्तचाप वाले व्यक्तियों को यह अभ्यास धीमी गति से तथा प्रशिक्षक की सलाह अनुसार करना चाहिए। ऐसे व्यक्तियों को कुम्भक और बंधों से बचना चाहिए।

भस्त्रिका प्राणायाम का सही समय क्या है?

प्रातः काल खाली पेट इसका अभ्यास सर्वोत्तम माना जाता है।

क्या नए अभ्यासी भस्त्रिका प्राणायाम कर सकते हैं?

हाँ, लेकिन प्रारंभ में इस अभ्यास को धीमी गति से तथा बिना कुम्भक और बंधों के करना चाहिए।

भस्त्रिका प्राणायाम के कितने राउंड करने चाहिए?

आरम्भ में चार चरणों का एक राउंड पर्याप्त माना जाता है। अभ्यास में प्रगति होने पर क्षमता अनुसार राउंड बढ़ाए जा सकते हैं।

क्या भस्त्रिका प्राणायाम से वजन कम होता है?

यह अभ्यास शरीर की ऊर्जा और चयापचय (Metabolism) को सक्रिय करता है, जिससे वजन नियंत्रण में सहायता मिल सकती है।

क्या भस्त्रिका प्राणायाम कुंडलिनी जागरण में सहायक है?

पारंपरिक योग ग्रंथों के अनुसार यह प्राणायाम प्राणिक नाड़ियों को सक्रिय करता है तथा कुंडलिनी साधना में सहायक माना जाता है।

Disclaimer 

भस्त्रिका प्राणायाम केवल नियमित योग अभ्यासी व स्वस्थ-श्वसनतंत्र वाले व्यक्तियों के लिए है। इस क्रिया को लेख में बताए गए नियम व सावधानियों के साथ करें। आरम्भ में नए व्यक्ति इस क्रिया को प्रशिक्षक की देखरेख में ही करें। क्षमता से अधिक किया गया अभ्यास हानिकारक हो सकता है।

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