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प्राणायाम के प्रकार – योग में विभिन्न प्रकार के प्राणायाम
प्राणायाम की मुद्रा 

प्राणायाम श्वसन (Breathing) पर आधारित एक महत्वपूर्ण योगिक अभ्यास है। यह योग के अष्टांग मार्ग का चौथा चरण माना जाता है। महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र में प्राणायाम को विस्तार से परिभाषित किया है। नियमित एवं सही विधि से किया गया प्राणायाम शरीर में ऊर्जा का संचार करता है, श्वसन तंत्र को सुदृढ़ बनाता है और मानसिक संतुलन में सहायक होता है। लेकिन इसके अभ्यास में उचित सावधानियों का पालन करना आवश्यक है। इस लेख में प्राणायाम के प्रकार, पतंजलि के अनुसार इसकी परिभाषा, स्वास्थ्य लाभ और आवश्यक सावधानियों पर विस्तार से चर्चा की गई है।

विषय सूची

1. प्राणायाम क्या है?
  • प्राणायाम का अर्थ
  • प्राणायाम का वर्गीकरण
2. प्राणायाम के प्रकार-शास्त्रीय आधार
  • प्राणायाम पतंजलि के अनुसार
  • परिभाषा पतंजलि योग में
  • प्राणायाम का योग सूत्र
  • प्राणायाम के चार प्रकार
3. प्राणायाम के प्रकार - योगाभ्यास के अनुसार
  • कपालभाति
  • अनुलोम विलोम
  • भ्रामरी
  • उज्जायी 
  • भस्त्रिका
  • शीतली, शीतकारी और चन्द्रभेदी प्राणायाम
  • सूर्य भेदी
  • नाड़ी शोधन
4. प्राणायाम के प्रकार - प्रभाव के आधार पर
5. लाभ और सावधानियां
6. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्राणायाम क्या है? (What is Pranayama)

योग भारत की एक प्राचीन जीवनशैली है। प्राणायाम योग का एक महत्वपूर्ण अंग है। योगाभ्यास यह एक श्वसन अभ्यास है। इस अभ्यास में सही विधि से सांस लेने-छोड़ने और रोकने की विधि बताई जाती है। क्योंकि "श्वास" इस क्रिया का आधार है इसलिए यह अभ्यास अपने श्वास की क्षमता अनुसार ही करना चाहिए।

यह श्वसनतंत्र को सुदृढ़ करता है और प्राण-शक्ति मे वृद्धि करता है। यह अभ्यास शरीर के लिए ऊर्जादायी होता है।

प्राणायाम का अर्थ

प्राणायाम शब्द 'प्राण' और 'आयाम' से मिल कर बना है। इसका अर्थ है "प्राण-शक्ति" को आयाम देना। इस क्रिया से प्राण-शक्ति सुदृढ होती है। प्राणों को एक निश्चित आयाम (सही दिशा) तक ले जाया जाता है। इसका नियमित अभ्यास श्वसन तंत्र और हृदय को स्वस्थ बनाए रखता है।

प्राणायाम के प्रकार (वर्गीकरण)

प्राचीन भारत में कई ऋषि-मुनि तथा योगी हुए हैं। उन्होने कई प्रकार की आसन व प्राणायाम की मुद्राएं बताई है। तथा कई प्रकार की प्राणायाम विधियां बताई हैं। प्राय: प्रश्न पूछा जाता है कि प्राणायाम के कितने प्रकार है? इसका वर्गीकरण मुख्यत: तीन आधारों पर किया जा सकता है:

  1. शास्त्रीय आधार पर वर्गीकरण (पतंजलि के अनुसार)
  2. आधुनिक योग अभ्यास के आधार पर 
  3. प्रभाव के आधार पर

प्राणायाम के प्रकार जानने के लिए हमें इन तीनों आधारों को समझना होगा। आईए इन तीनों आधारों एक-एक करे विस्तार से समझ लेते हैं।

(Read this article in English - Types of Pranayama.)

1. प्राणायाम के प्रकार - शास्त्रीय आधार (पतंजलि योग)

प्राणायाम के विषय को समझने के लिए "शास्त्रीय आधार" सर्वाधिक मान्य है। योग भारतीय ऋषियों द्वारा बताई गई एक प्राचीन विधि है। यहां भारत भूमि पर अनेकों महान ऋषि और योगी हुए हैं। उन्होंने प्राणायाम को अपने अनुसार परिभाषित किया और नए आयाम जोड़े। इन्हीं महान ऋषियों में एक महर्षि पतंजलि भी हुए हैं।

पतंजलि को योग का जनक ( Father of Yoga) कहा जाता है। उन्होंने सम्पूर्ण योग को सूत्रों द्वारा परिभाषित किया है। आज पूरे विश्व में उनके द्वारा बताया गया योग सर्वाधिक प्रचलन में है। पतंजलि के अनुसार प्राणायाम क्या है और प्राणायाम कितने प्रकार के होते हैं, इस लेख में आगे इसका विस्तार से वर्णन करेंगे।

प्राणायाम पतंजलि के अनुसार

महर्षि पतंजलि ने अपने महान ग्रन्थ योगसूत्र में संपूर्ण योग को सूत्रों द्वारा परिभाषित किया है। योग सूत्र में प्राणायाम की परिभाषा और प्रकार का विस्तार से वर्णन किया है। इसमें प्राणायाम को "श्वास की एक अवस्था" बताया है। (विस्तार से देखे :- प्राणायाम श्वास की एक अवस्था)

प्राणायाम परिभाषा पतंजलि योग में 

योगसूत्र के दूसरे अध्याय में प्राणायाम का विस्तार से वर्णन किया है। इस अध्याय के '49वे' सूत्र मे प्राणायाम को परिभाषित किया गया है :- 

तस्मिन्सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेद: प्राणायाम: ।।2.49।। 

(तस्मिन् सति श्वास प्रश्वासयो: गति विच्छेद: प्राणायाम:)

प्राणायाम सूत्र का अर्थ

प्राणायाम के विषय में यह एक महत्वपूर्ण सूत्र है। संस्कृत भाषा के इस सूत्र का शब्दश: अर्थ इस प्रकार है:

तस्मिन् सति :--  ऐसा हो जाने पर (आसन का अभ्यास करने के बाद)

श्वास :-- प्राणवायु को नासिका द्वारा अंदर लेना (श्वास अंदर भरने की स्थिति)

प्रश्वासयो :-- प्राणवायु को बाहर छोड़ना (श्वास बाहर निकालने की अवस्था)

गति विच्छेद:-- श्वास के लेने व छोड़ने की सहज गति को (क्षमता के अनुसार) रोक देना (यह कुम्भक अवस्था है)

प्राणायम: -- प्राणायाम है।

महर्षि पतंजलि ने इस सूत्र मे "प्राणायाम" की जो परिभाषा दी है, उसे सरल शब्दों मे इस प्रकार समझें:-

जब आसन की सिद्धि हो जाती है, तब श्वास की सहज गति को (क्षमता अनुसार ) रोक देना ही प्राणायाम है।

इस परिभाषा की चार महत्व पूर्ण बातें 

  1. आसन की सिद्धि
  2. श्वास (प्राणवायु का पूरक)
  3. प्रश्वास (प्राणवायु का रेचक)
  4. गति विच्छेद (प्राणवायु को अंदर या बाहर रोकना)

आईए इसको विस्तार से समझ लेते हैं:

1. आसन की सिद्धि 

इस सूत्र मे महर्षि यह स्पष्ट बताते है कि प्राणायाम से पहले आसन का अभ्यास करना चाहिए। आसन में स्थिरता आने के बाद ही प्राणायाम करें। इसका सीधा अर्थ यह है कि योगाभ्यास में पहले आसन का अभ्यास और उसके बाद प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए।

(कारण और विस्तार से जानने के लिए देखें :- पहले आसन क्यों?)

2. श्वास (पूरक) 

यह शरीर की एक महत्वपूर्ण अवस्था है। प्राणवायु का नासिका से अंदर भरना "श्वास" कहा गया है। यह श्वास की पूरक स्थिति है। सांस भरने के बाद इस वायु में उपस्थित ऑक्सीजन रक्त में मिश्रित हो कर पूरे शरीर में पहुंच जाती है। इसी के कारण हमारे शरीर का ऑक्सीजन लेवल ठीक रहता है। श्वास की पूरक स्थिति कुछ देर रुकना चाहिए।

3. प्रश्वास (रेचक) 

पूरक की गई वायु को बाहर निकलना "प्रश्वास" है। यह रेचक स्थिति बताई गई है। श्वास अंदर भरने के बाद ऑक्सीजन पूरे शरीर में पहुंच जाती है और प्रश्वास द्वारा दूषित वायु को बाहर निकाल दिया जाता है। खाली श्वास की स्थिति में कुछ देर क्षमता अनुसार रुकना चाहिए।

4. गति विच्छेद :--  'श्वास प्रश्वास' की सामान्य गति को रोक देना "गति विच्छेद" है। अर्थात् पूरक व रेचक स्थिति मे श्वास को (क्षमता के अनुसार) रोकना प्राणायाम है। प्राणायाम में इस स्थिति को कुम्भक कहा गया है।

महर्षि पतंजलि के अनुसार योगाभ्यास मे पहले आसन और आसन के बाद प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए। श्वास की सहज गति को पूरक व रेचक स्थिति मे रोकना ही प्राणायाम बताया गया है। अर्थात् कुम्भक ही वास्तविक प्राणायाम है।

प्राणायाम के प्रकार (Types of Pranayam) पतंजलि के अनुसार 

सभी ऋषि-मुनि व योगियों ने प्राणायाम की कई विधियाँ बताई हैं। पूरा विश्व आज उन प्राणायाम विधियों को अपना रहा है। लेकिन ये कितने प्रकार के हैं? महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र में प्राणायाम चार प्रकार के बताए हैं:-
  1. बाह्य वृत्ति
  2. आभ्यन्तर वृत्ति
  3. स्तम्भवृत्ति
  4. बाह्याभ्यन्तर विषयाक्षेपि

आईए इनके बारे मे विस्तार से समझ लेते हैं।

चार प्रकार के प्राणायाम कोन से हैं?

महर्षि पतंजलि योगसूत्र "साधन पाद" के '50वे' तथा '51वे' सूत्र में इनका वर्णन किया है।

बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिर्देशकालसंख्याभि: परिदृष्टो दीर्घ सूक्ष्म: ।। 2.50 ।।

(बाह्य आभ्यन्तर स्तम्भवृत्ति देश काल संख्याभि: परिदृष्ट: दीर्घ सूक्ष्म:)

अर्थ :-- बाह्य वृत्ति, आभ्यन्तर वृति तथा स्तम्भ वृत्ति तीन प्रकार के प्राणायाम को स्थान, समय और गणना पूर्वक देख कर किए जाने से प्राण दीर्घ व सूक्ष्म हो जाता है।

सरल शब्दों मे अर्थ :-- इस सूत्र में तीन प्रकार के प्राणायाम बताए हैं। और यह भी बताया गया है कि इनको स्थान, समय तथा गणना द्वारा किए जाने पर प्राण लम्बा व हल्का हो जाता है।

इस सूत्र मे (देश) स्थान, (काल) समय और गणना का वर्णन आया है। आइए इसका अर्थ समझ लेते हैं। यहाँ स्थान का अर्थ है नासिका से लिया गया श्वास कितनी गहराई तक जाता है। समय का अर्थ है श्वास के पूरक और रेचक मे कितना समय लगता है। गणना का अर्थ उस समय की गिनती से है जो हम पूरक, रेचक व कुम्भक मे रुकते हैं।

तीन प्रकार के प्राणायाम 

1. बाह्य वृत्ति :-- श्वास को बाहर निकाल कर (या बलपूर्वक बाहर फेंक कर), श्वास को बाहर रोकना बाह्य वृत्ति प्राणायाम है। इसको बाह्य कुम्भक भी कहा जाता है। यह श्वास की रेचक स्थिति है।

2. आभ्यन्तर वृत्ति :-- श्वास को अन्दर भरके, श्वास को अन्दर रोकना। यह आभ्यन्तर वृत्ति प्राणायाम है। इसको आन्तरिक कुम्भक भी कहा जाता है। यह श्वास के पूरक स्थिति है।

3. स्तम्भ वृति :-- श्वास जिस स्थिति मे है वही पर रोक देना स्तम्भ वृत्ति है। अर्थात् श्वास अन्दर है या बाहर है, उसी स्थिति मे श्वास को रोक देना ही यह प्राणायाम है। इसे कैवल्य कुम्भक भी कहा जाता है। पहले बताए गए दोनो प्राणायाम के सिद्ध हो जाने के बाद यह स्थिति बनती है।

ये तीन प्रकार के अभ्यास सामान्य साधकों के लिए है जो स्वास्थ्य के लिए प्राणायाम अभ्यास करते हैं। अगले सूत्र में चौथा प्राणायाम का वर्णन किया गया है। चौथा प्राणायाम क्या है, आइए इसको विस्तार से समझ लेते हैं।

चौथा प्रकार का प्राणायाम (Fourth Type Pranayama)

महर्षि पतंजलि 51वे सूत्र में चौथे (Fourth) प्राणायाम का वर्णन करते हैं। इसे "चतुर्थ प्राणायाम" कहा गया है। इस के लिए योगसूत्र में कहा गया है:

बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थ:।। 2.51 ।।

(बाह्य आभ्यन्तर विषय आक्षेपी चतुर्थ:)

अर्थ :-- "श्वास को बाहर या अन्दर रोकने" के विषय के विपरीत अवस्था को चौथा प्राणायाम कहा गया है।

साधन पाद के 2.51 सूत्र इसका वर्णन है। यह पहले सूत्र मे बताए गए तीनो प्राणायामों से भिन्न है। यह बाह्य वृत्ति और आभ्यन्तर वृत्ति दोनो प्राणायाम के विषयों के विपरीत अभ्यास है।

चतुर्थ प्राणायाम कैसे करें?

जब हम बाह्य वृत्ति प्राणायाम में श्वास को बाहर निकाल कर रुकते हैं। यथा शक्ति श्वास को बाहर रोकने के कुछ देर बाद श्वास लेने की इच्छा होती है। उस समय यदि हम श्वास का पूरक करते है तो यह बाह्य वृत्ति प्राणायाम हो जाएगा। लेकिन श्वास "भरने की इच्छा" के विपरीत श्वास को बाहर की ओर धकेल कर रुकते हैं। तो यह चतुर्थ (चौथा) प्राणायाम हो जाता है।

इसी प्रकार आभ्यन्तर वृत्ति मे जब हम श्वास भरते हैं (पूरक करते हैं), और यथा शक्ति भरे श्वास में रुकते हैं। कुछ देर रुकने के बाद श्वास को "बाहर छोड़ने" की इच्छा होती है। यदि हम श्वास को बाहर छोड़ते हैं तो यह आभ्यन्तर वृत्ति प्राणायाम हो जाएगा। लेकिन श्वास "बाहर छोड़ने ने की इच्छा" के विपरीत श्वास को फिर से भरते है, तो यह चतुर्थ (चौथा) प्राणायाम है।

(और अधिक जानकारी के लिए विस्तार से देखें:- चतुर्थ प्राणायाम क्या है?)

विशेष सावधानी (चेतावनी) 

  • यदि आप नए साधक हैं, तो यह प्राणायाम न करें 
  • यदि आप प्राणायाम अभ्यास केवल स्वास्थ्य के लिए करते हैं, तो यह प्राणायाम न करें 
  • ऐसे साधकों को केवल पहले बताए गए तीन प्राणायाम ही करने चाहिए
  • यह चौथा प्राणायाम प्रवीण साधकों के लिए है

2. प्राणायाम के प्रकार - आधुनिक योग अभ्यास के आधार पर

अनुलोम विलोम प्राणायाम – प्राणायाम के प्रमुख प्रकारों में एक
अनुलोम विलोम प्राणायाम का पोज

यद्यपि महर्षि पतंजलि ने अपने योगसूत्र में आसन प्राणायाम की मुद्राएं नहीं बताई, उन्होंने सम्पूर्ण योग को सूत्रों द्वारा परिभाषित किया है। लेकिन बाद में कई ऋषियों और योगियों ने अभ्यास के आधार पर प्राणायाम को वर्गीकृत किया। हम अभ्यास के आधार पर प्राणायाम का वर्गीकरण इस प्रकार कर सकते हैं:

कपालभाति

  • कपाल (शीर्ष) भाग की शुद्धि
  • पाचन तंत्र को सुदृढ़ करता है
  • श्वसन तंत्र की मजबूती
  • शरीर के लिए ऊर्जादायी

अनुलोम विलोम

  • ऊर्जा का संतुलन
  • कफ, वात और पित्त का संतुलन
  • मानसिक एकाग्रता
  • श्वसन तंत्र की मजबूती
  • तनाव, चिंता और अनिद्रा में लाभकारी

भ्रामरी प्राणायाम

  • स्मरण शक्ति की वृद्धि
  • श्रवण शक्ति सुदृढ़ होती है
  • मस्तिष्क (शीर्ष भाग) प्रभावित होता है 

उज्जायी प्राणायाम

  • श्वास पर नियंत्रण स्थापित करता है
  • ध्यान और साधना में सहायक
  • गले और श्वसन तंत्र के लिए उपयोगी

भस्त्रिका प्राणायाम

  • शरीर को ऊर्जा देने वाला अभ्यास
  • श्वसन तंत्र को मजबूत करता है
  • पाचन क्रिया को सुदृढ़ करता है
  • हृदय तथा श्वसन तंत्र को स्वस्थ रखता है
  • रक्तचाप का संतुलन

शीतली, शीतकारी और चन्द्र भेदी प्राणायाम

  • शीतलता देने वाले प्राणायाम
  • गर्मी के मौसम में लाभकारी अभ्यास
  • मानसिक शांति देने वाले अभ्यास 

सूर्य भेदी

  • शरीर को ऊर्जावान बनाए रखता है
  • सर्दी के मौसम में लाभदाई

नाड़ी शोधन प्राणायाम

  • बहत्तर हजार प्राणिक नाड़ियों का शोधन
  • श्वसन तंत्र की मजबूती
  • शरीर में ऑक्सीजन की पर्याप्त मात्रा में आपूर्ति 

3. प्राणायाम के प्रकार - प्रभाव के आधार पर

शरीर पर प्रभाव तथा मौसम के अनुसार भी प्राणायाम का वर्गीकरण किया जा सकता है:

ऊर्जादायी प्राणायाम --भस्त्रिका, सूर्य भेदी

ये अभ्यास शरीर को ऊर्जा देने वाले प्राणायाम हैं। इनका अभ्यास सर्दी के मौसम में करना चाहिए। गर्मी के मौसम में ये अभ्यास वर्जित हैं।

शांतिदायक प्राणायाम – अनुलोम-विलोम, भ्रामरी, नाड़ी शोधन

ये मानसिक शांति और एकाग्रता देने वाले अभ्यास हैं। इनका अभ्यास सभी प्रकार के मौसम में किया जा सकता है।

शीतल प्राणायाम – शीतली, शीतकारी, चंद्र भेदी

ये प्राणायाम गर्मी के मौसम में शरीर को शीतलता देते हैं। शरद ऋतु में इनका अभ्यास नहीं करना चाहिए।

प्राणायाम के लाभ व सावधानियां

प्राणायाम एक लाभकारी क्रिया है। इसे कुछ सावधानियों के साथ युवा-वृद्ध सब कर सकते हैं। आईए देखते है कि प्राणायाम के लाभ व सावधानियां क्या हैं?

प्राणायाम के लाभ Health benefits

प्राणायाम योग की लाभदाई क्रिया हैं। इनमे से कुछ इस प्रकार हैं :--

  • प्राणायाम श्वसनतंत्र को सुदृढ़ करता है। लंग्स को एक्टिव रखता है।
  • प्राण-शक्ति की वृद्धि करता है। शक्तियां ऊर्ध्वगामी (ऊपर की ओर विचरण करने वाली) होती हैं।
  • प्राणिक नाड़ियों मे आने वाले अवरोधों को दूर करता है। यह शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) को बढाता है।
  • प्राण-वायु (Oxygen) की पर्याप्त मात्रा मे आपूर्ति होती है। इस कारण हृदय को मजबूती मिलती है। यह श्वास-रोग मे लाभकारी होता है।
  • रक्त-चाप (BP) तथा सुगर सामान्य रहता है।
  • शरीर की रसायन-क्रिया संतुलित रहती है।
  • कफ, वात व पित्त मे संतुलन रहता है।
  • यह क्रिया ध्यान की स्थिति मे ले जाने में सहायक होती है।

सावधानियां  Precautions

प्राणायाम सरलता से किए जाने चाहिए। इसे हर आयु-वर्ग के व्यक्ति कर सकते है। प्राणायाम कुछ सावधानियों के साथ करने चाहिए।

  • योगाभ्यास खाली पेट से करें। पहले आसन करें। आसन के बाद प्राणायाम करें।
  • आरम्भ मे नए व्यक्तियों को सरल प्राणायाम करने चाहिए।
  • यदि आप नए साधक (Beginner) हैं तो कुम्भक का प्रयोग न करे।
  • प्राणायाम अपनी आयु के अनुसार करें।
  • अपनी शारीरिक क्षमता का ध्यान रखें। 
  • श्वास रोकते समय बल प्रयोग न करें।
  • रोग की अवस्था मे प्राणायाम न करें। अस्थमा रोगी तथा हृदय रोगी "तीव्र गति" वाले प्राणायाम न करें।

प्राणायाम के विषय मे अधिक जानकारी के लिए हमारे अन्य लेखों का अवलोकन करें।

लेख सारांश

महर्षि पतंजलि के अनुसार प्राणायाम चार प्रकार के हैं। पहले तीन प्रकार के अभ्यास सामान्य अभ्यासियों के लिए और चौथा अभ्यास अनुभवी साधकों के लिए है। यह एक लाभकारी क्रिया है, लेकिन इसे सावधानी से किया जाना चाहिए।

प्राणायाम से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

प्रश्न: प्राणायाम कितने प्रकार के होते हैं?

उत्तर: महर्षि पतंजलि के अनुसार प्राणायाम चार प्रकार के होते हैं—बाह्य वृत्ति, आभ्यन्तर वृत्ति, स्तम्भ वृत्ति और चतुर्थ प्राणायाम। इन चारों का उल्लेख योगसूत्र में किया गया है।

प्रश्न: पतंजलि योग में चौथा प्राणायाम (चतुर्थ प्राणायाम) क्या है?

उत्तर: चतुर्थ प्राणायाम एक उच्च स्तर का योगिक अभ्यास है, जिसमें श्वास-प्रश्वास की गति स्वाभाविक रूप से रुक जाती है। यह अभ्यास केवल अनुभवी और प्रशिक्षित योग-साधकों के लिए उपयुक्त माना गया है। सामान्य अभ्यासियों को इसका अभ्यास नहीं करना चाहिए।

प्रश्न: पतंजलि के अनुसार प्राणायाम क्या है?

उत्तर: योगसूत्र के अनुसार श्वास लेना, छोड़ना और अपनी क्षमता के अनुसार श्वास को रोकना—इन तीनों प्रक्रियाओं का नियंत्रित अभ्यास ही प्राणायाम कहलाता है।

प्रश्न: क्या सभी लोग प्राणायाम का अभ्यास कर सकते हैं?

उत्तर: सामान्यतः स्वस्थ व्यक्ति प्राणायाम का अभ्यास कर सकते हैं। किसी रोग की अवस्था में या गंभीर स्वास्थ्य समस्या होने पर चिकित्सक या योग्य योग विशेषज्ञ से परामर्श लेना आवश्यक होता है।

प्रश्न: प्राणायाम करने का सही समय क्या है?

उत्तर: प्राणायाम का अभ्यास प्रातःकाल खाली पेट करना सर्वोत्तम माना गया है। यदि किसी अन्य समय अभ्यास किया जाए, तो भोजन के कम से कम 4–5 घंटे बाद ही करना चाहिए।

प्रश्न: प्राणायाम से कौन-से रोगों में लाभ मिलता है?

उत्तर: प्राणायाम किसी रोग का प्रत्यक्ष उपचार नहीं है, लेकिन यह श्वसन तंत्र को मजबूत करता है, मानसिक तनाव कम करता है, रक्तचाप को संतुलित करने में सहायक होता है और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मदद करता है। रोग की अवस्था में प्राणायाम का अभ्यास न करें और चिकित्सकीय सलाह अवश्य लें।

Disclaimer

यह लेख किसी प्रकार के रोग उपचार का दावा नही करता है। इसका उद्देश्य केवल योग की जानकारी देना है। लेख में बताए गए अभ्यास केवल स्वस्थ व्यक्तियों के लिए हैं।

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