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योग केवल तन को ही नही बल्कि यह तन के साथ मन को भी स्वस्थ रखता है। सम्पूर्ण योग आठ चरणों वाला अष्टांगयोग बताया गया है। आसन, प्राणायाम व ध्यान इसी के अंग है। आज के समय मे स्वास्थ्य के लिये इन तीनों का अभ्यास किया जाता है। योगाभ्यास ये तीनो चरण बहुत महत्वपूर्ण हैं। शरीर के साथ मन को स्वस्थ रखने के लिये योग क्रियाएं प्रभावी हैं। आईए इनके बारे मे समझ लेते हैं।

विषय सुची :-

• आसन- शरीर के लिए।
• प्राणायाम- ऊर्जा के लिये।
• ध्यान- मानसिक शान्ति के लिये।

शरीर व मन के लिये योग।

योग का प्रभाव सर्वांगीण होता है। यह शरीर व मन दोनो को स्वस्थ रखता है। प्राण शक्ति की वृद्धि करता है। इसके लिये पहले आसन करें, आसन के बाद प्राणायाम। ये क्रियाएं करने के बाद कुछ देर ध्यान की स्थिति मे बैठें। आईए इनको और  विस्तार से समझ लेते है।

आसन - शरीर को स्वस्थ रखने के लिये।

आसन शरीर के आन्तरिक व बाह्य अंगों पर प्रभाव डालते है। ये शरीर की मासपेशियों, अस्थि जोड़ों को सक्रिय रखते हैं। मुख्य प्रभाव रीढ पर पड़ता है। यह रीढ को फ्लैक्सिबल बनाये रखते हैं। कुछ आसनों से पेट के आन्तरिक अंग प्रभाव मे आते है। ये पाचन क्रिया बढाने सहायक होते हैं। 

कमर, पीठ व पैरो के लिये आसन :

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1. ताड़ासन व हस्त पाद आसन :-  सीधे खड़े हो जाएं। धीरे-धीरे दोनों हाथ ऊपर करें। श्वास भरते हुए हाथो को ऊपर की ओर खींचें। हाथों व गर्दन को थोड़ा सा पीछे की ओर झुकाये। श्वास छोड़ते हुए आगे की ओर झुकें। माथा घुटनों के पास ले जाने का प्रयास करें। हाथों को पैरों के साथ नीचे टिकायें। अपनी क्षमता के अनुसार रुकें।

कुछ देर स्थिति मे रुकने के बाद धीरे-धीरे ऊपर उठें। ऊपर उठने के बाद हाथों को ऊपर की ओर खींचे। हाथों को नीचे ले आएँ। कुछ देर विश्राम करे और आसन पर बैठ जाएं। बैठ कर किये जाने वाले आसन करें।

सावधानी :- अपनी क्षमता के अनुसार आगे झुकें। सरलता से जितना झुक सकते है उतना ही झुकें।

आसन का प्रभाव :- ताड़ासन कंधो व गर्दन के लिये लाभदायी होता है। हस्त पाद आसन से पेट के आन्तरिक अंगों तथा पैरों की मांसपेशियां प्रभाव मे आती हैं।

2. पश्चिमोत्तान आसन :- दोनो पैरों को सीधा करके बैठें। घुटने, एड़ी व पजे मिला कर रखें। श्वास भरते हए दोनो हाथ ऊपर उठाएं। श्वास छोड़ते हुए आगे झुकें। दोनो हाथों से पैर के पंजे पकड़ने का प्रयास करें। स्थिति मे कुछ देर रुकें और धीरे-धीरे वापिस आ जाये। हाथ पीछे टिकाएं। विश्राम करें।

सावधानी :- यदि माथा घुटनों के पास नही पहुंच रहा है तो अधिक प्रयास न करें।

आसन का प्रभाव :- कमर, पेट व पैरों की मांसपेशियां प्रभाव मे आती हैं।

रीढ के लिये आसन।

रीढ शरीर का आधार है। शरीर का समस्त नाड़ी तंत्र इस से जुड़ा हुआ है। मस्तिष्क का शरीर के अंगो पर नियंत्रण रीढ से ही है। इसको स्वस्थ रखने के लिए ये आसन करें।

1. उष्ट्रासन :- वज्रासन पोज मे बैठें। दोनो घुटने मोड़ लें। दोनो एड़ियों के बीच मे बैठ जाएं। दोनो हाथ कमर पर रखते हुए घुटनों से ऊपर उठें। धीरे धीरे कमर को पीछे की  ओर झुकाये। दोनो हाथों को एड़ियों पर रखें। क्षमता के अनुसार रुकने के बाद वापिस आ जायें।

सावधानी :- अपनी क्षमता के अनुसार पीछे झुकें। पीछे झुकने मे अधिक बल प्रयोग न करें।

आसन का प्रभाव :- रीढ के लिये यह उत्तम आसन है। इस आसन से रीढ पीछे की ओर प्रभावित होती है। इसके बाद बालासन करें। यह रीढ को आगे की ओर प्रभावित करता है।

2. बालासन :- यह उष्ट्रासन का विपरीत आसन है। यह उष्ट्रासन के लाभ को बढाता है। वज्रासन पोज मे बैठें। दोनो हाथ पीठ के पीछे ले जायें। बांए हाथ से दांई कलाई को पकड़ें। धीरे-धीरे आगे की ओर झुकें। हाथो मे खिंचाव बनाये रखें। माथा घुटनों के पास ले जाने का प्रयास करे। स्थिति मे कुछ देर रुकने के बाद वापिस पूर्व स्थिति मे आ जायें।

आसन का प्रभाव :- इस आसन मे रीढ आगे की ओर प्रभावित होती है। रीढ के लिये उत्तम आसन है। इस आसन से पेट के अंग भी प्रभाव मे आते हैं।

हृदय के लिये आसन।

सर्वांग आसन :- पीठ के बल लेटें। एड़ी, पंजे व घुटने मिलाएं। दोनों हाथ कमर के साथ रखें। घुटनो को सीधा रखते हुए दोनो पैरों को ऊपर उठाये। पैरो को पीछे की ओर ले जाये। दोनो हाथ कमर के नीचे रखें। हाथो से कमर को सहारा देते हुए ऊपर उठायें। पैरों को सीधा आसमान की ओर रखें। स्थिरता से रुके।

अपनी क्षमता के अनुसार रुकने के बाद धीरे से कमर को नीचे टिकाएं। घुटने सीधे रखते हुए पैरो को नीचे ले आयें। पैरो के बीच दूरी बनाये। विश्राम करें।

सावधानी :- रीढ मे तनाव है या कोई क्षति है तो यह आसन न करें।

आसन का प्रभाव :- यह आसन शरीर के रक्त-संंचार को व्यवस्थित करता है। हृदय के लिये लाभदायी आसन है।

आसन के बाद विश्राम करें।

सभी आसन करने के बाद सीधे लेट जाएँ। शरीर को ढीला छोड़ दे। कुछ देर विश्राम करें। विश्राम के बाद प्राणायाम करें।

ऊर्जा के लिये प्राणायाम करें :

प्राणायाम शरीर के लिये ऊर्जादायी होता है। यह श्वसनतंत्र को सुदृढ करता है और रक्तचाप को सामान्य रखता है। यह मन-मस्तिष्क को प्रभावित करने वाली उत्तम क्रिया है।

1. कपाल की शुद्धि - कपालभाति :

यह कपाल भाग की शुद्धि करने वाली क्रिया है। इस क्रिया से मस्तिष्क प्रभावित होता है।

विधि :- पद्मासन या सुखासन मे बैठें। दोनो हथेलियां घुटनों पर रखें। रीढ व गर्दन को सीधा रखें। पेट पर दबाव डालते हुए श्वास गति से बाहर छोड़े। श्वास भरने की क्रिया सामान्य रखे। केवल श्वास बाहर छोड़ने मे बल लगाएं। अपनी क्षमता के अनुसार क्रिया को करें।

अपनी क्षमता के अनुसार करने के बाद वापिस आ जाएं।अपने श्वासों को सामान्य करे।

लाभ कपालभाति से :- यह मुख्यत: कपाल भाग की शुद्धि के लिये किया जाता है। मन-मस्तिष्क के लिये  लाभदायी है

2. ऊर्जादायी प्राणायाम - अनुलोम विलोम :

यह  सरलता से  किया जाने  वाला प्राणायाम है। यह ऊर्जा देने वाला तथा मस्तिष्क को प्रभावित करने वाला प्राणायाम है। इसको कपालभाति के  साथ अवश्य किया जाना चाहिए।

विधि :- पद्मासन या सुखासन मे बैठें। बांया हाथ बांए घुटने पर ज्ञान-मुद्रा मे रखें। दांया हाथ नासिका के पास रखें। दांए अंगूठे से दांई नासिका को बन्ध करें। बांई नासिका से धीरे धीरे श्वास भरें। पूरा श्वास भरने के बाद बांई नासिका को बन्ध करें। दांई तरफ से श्वास खाली कर दे। पूरा श्वास खाली करने के बाद दांई तरफ से श्वास भरें। और बांई तरफ से श्वास खाली करें। यह एक आवर्ती है। इसी प्रकार अन्य आवर्तियां करें।

लाभ, अनुलोम विलोम से :- यह चंद्र नाड़ी व सूर्य नाड़ी को प्रभावित करता है। यह श्वसन तंत्र तथा  मस्तिष्क के लिये उत्तम आसन है।

3. श्रवण शक्ति व मस्तिष्क के लिये - भ्रामरी प्राणायाम :

भ्रामरी प्राणायाम सुनने की शक्ति को बढाता है। यह मस्तिष्क व शीर्ष भाग को प्रभावित करता है।

विधि :- पद्मासन या सुखासन मे बैठें। आँखें कोमलता से बन्ध करें। कोहनियों से दोनो हाथो को मोड़ कर हथेलियां चेहरे के सामने रखें। ऊपर की दो उंगलियां नेत्रों के सामने तथा नीचे की दो उंगलियां होठों के पास रखें। अंगूठों से दोनो कान बन्ध करें। लम्बा श्वास भरें और होठों को बन्द रखते हुए कण्ठ से आवाज निकालते हुए गुंजन करें। श्वास पूरा होने के बाद फिर श्वास भरें और गुंजन करें। ये तीन-चार आवर्तियां करें।

भ्रामरी प्राणायाम का लाभ :- सुनने की शक्ति बढाता है। शीर्ष भाग के लिये लाभदायी है।

4. नाङियों का शुद्धिकरण - नाड़ी शोधन प्राणायाम :

हमारे शरीर मे 72,000 प्राणिक नाड़ियां हैं। इन मे प्राण ऊर्जा का प्रवाह होता है। यह प्राणायाम इन नाड़ियों के अवरोधों को दूर करता है।

विधि :- पद्मासन या सुखासन मे बैठें। आँखें कोमलता से बन्ध करें। बांया हाथ बांए घुटने पर ज्ञान मुद्रा मे रखें। दांया हाथ नासिका के पास रखेें। दांये अंगूठे से दांई नासिका बंध करें। बांई नासिका से श्वास भरें। पूरा श्वास भरने के बाद बांई नासिक को बंध करें। अपनी क्षमता के अनुसार श्वास को रोकें और दांई तरफ से श्वास खाली करें। पूरा श्वास खाली होने के बाद दांई नासिका से श्वास भरें। अपनी क्षमता के अनुसार श्वास रोके और बांई तरफ से श्वास खाली करें।

इस प्राणायाम की आरम्भ मे दो-तीन आवर्तियां करें। धीरे धीरे इसका अभ्यास बढाएं।

सावधानी नाड़ी शोधन मे :- इस प्राणायाम मे श्वास अपनी क्षमता के अनुसार रोकें। श्वास रोकने मे बल प्रयोग न करें। श्वास रोगी व हृदय रोगी इस प्राणायाम को न करें।

नाड़ी शोधन के लाभ :- यह प्राणायाम मुख्यत: नाड़ीतंत्र को प्रभावित करता है। यह श्वसन तंत्र को सुदृढ करने वाला प्राणायाम है।

ध्यान - मानसिक शान्ति के लिये :

"ध्यान" या Meditation मानसिक शान्ति देने वाली क्रिया है। आसन व प्राणायाम करने के बाद "ध्यान" अवश्य किया जाना चाहिए।

विधि :- पद्मासन या सुखासन की स्थिति मे बैठें। आँखें कोमलता से बंध रखें। पहले ध्यान को श्वासों पर केंद्रित करें। आती-जाती श्वासों का अवलोकन करें। इसके बाद ध्यान को श्वासों से हटा कर आज्ञा चक्र (माथे के बीच) मे केंद्रित करें। यहां ज्योतिपुंज या अपने ईष्ट के दर्शन करे। कुछ देर बाद ध्यान को यहां से भी हटाये और निर्विचार होकर बैठे। कोई विचार मन मे न आने दे। कुछ देर ध्यान की स्थिति मे ठहरने के बाद वापिस आ जाये। 

सारांश :

शरीर व मन को स्वस्थ रखने के लिये योग क्रियाएं सहायक होती है। इसके लिये आसन, प्राणायाम व ध्यान का अभ्यास किया जाना चाहिए। आसन शरीर को मजबूती देते हैं। प्राणायाम शरीर के लिये ऊर्जादायी  हैं। ध्यान मानसिक शान्ति देता है।

Disclaimer :

लेख मे बताई गई सभी क्रयाएं स्वस्थ व्यक्तियों के लिये हैं।अस्वस्थ व्यक्ति इनको न करें। योग की प्रत्येक क्रिया अपनी क्षमता के अनुसार करे। क्षमता से अधिक या बलपूर्वक करना हानिकारक हो सकता है। यह लेख किसी प्रकार के रोग उपचार का दावा नही करता है।

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