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बहुत से लोग प्राणायाम तो करते हैं, लेकिन सही क्रम और नियम न जानने के कारण उन्हें पूरा लाभ नहीं मिलता। कुछ लोग बिना आसन किए सीधे कपालभाति शुरू कर देते हैं, तो कुछ गर्मी के मौसम में भस्त्रिका करते रहते हैं। ये छोटी-छोटी गलतियाँ प्राणायाम को लाभकारी की जगह हानिकारक बना देती हैं।

प्राणायाम केवल साँस लेने-छोड़ने की क्रिया नहीं है। यह एक सुव्यवस्थित अभ्यास है जिसका अपना क्रम, अपना नियम और अपनी सीमा है। इस लेख में हम समझेंगे कि प्राणायाम किस क्रम में करें, कौन से नियम पालन करें, मौसम का ध्यान कैसे रखें और अपनी शारीरिक स्थिति के अनुसार अभ्यास कैसे करें।

प्राणायाम के नियम और सही क्रम से अभ्यास करती महिला
नियम और सही क्रम से किया गया प्राणायाम अधिक लाभकारी होता है।

प्राणायाम के मूल नियम

प्राणायाम का पूरा लाभ तभी मिलता है जब इसे कुछ मूल नियमों का पालन करते हुए किया जाए। ये नियम कोई कठोर बंधन नहीं हैं — ये आपके अभ्यास को सुरक्षित और प्रभावशाली बनाने की व्यवस्था हैं।

  • खाली पेट अभ्यास करें। भोजन के कम से कम दो घंटे बाद ही प्राणायाम करें।
  • आसन के बाद ही प्राणायाम करें। पहले शरीर को आसन से तैयार करें, फिर श्वास-साधना करें।
  • मौसम के अनुसार प्राणायाम चुनें। हर प्राणायाम हर मौसम में उचित नहीं होता।
  • अपनी क्षमता से अधिक न करें। श्वासों पर बलपूर्वक दबाव न डालें।
  • नियमितता जरूरी है। रोज थोड़ा करना, कभी-कभी अधिक करने से बेहतर है।
  • मन को शांत रखें। प्राणायाम से पहले कुछ क्षण आँखें बंद करके बैठें और श्वास को सामान्य होने दें।

समय और स्थान का चयन

प्राणायाम का पूरा लाभ पाने के लिए सही समय और सही स्थान का चुनाव भी उतना ही जरूरी है जितना सही विधि। अनुकूल वातावरण में किया गया अभ्यास शरीर और मन दोनों पर गहरा प्रभाव डालता है।

सही समय कौन सा है?

प्राणायाम के लिए ब्रह्ममुहूर्त अर्थात सूर्योदय से पहले का समय सर्वोत्तम माना जाता है। इस समय वातावरण शांत होता है और वायु भी स्वच्छ होती है। यदि सुबह संभव न हो तो सायंकाल सूर्यास्त से पहले भी अभ्यास किया जा सकता है।

दिन के किसी भी समय यदि करना हो तो ध्यान रखें — भोजन के कम से कम दो घंटे बाद ही करें।

स्थान कैसा होना चाहिए?

खुला, स्वच्छ और हवादार स्थान सबसे उपयुक्त है। पार्क, बगीचा या घर की खुली छत अच्छे विकल्प हैं। यदि बाहर न जा सकें तो घर के किसी हवादार कमरे में खिड़की खोलकर अभ्यास करें।

वर्षा ऋतु में बाहर खुले में न करें — भीगे वातावरण में प्राणायाम करने से श्वसन संबंधी समस्या हो सकती है।

आसन के बाद ही प्राणायाम क्यों?

यह प्रश्न अनेक अभ्यासी पूछते हैं। इसका उत्तर सरल है — आसन से शरीर की नाड़ियाँ और माँसपेशियाँ सक्रिय होती हैं, रक्त संचार बढ़ता है। इस तैयारी के बाद जब प्राणायाम किया जाता है तो प्राण-वायु शरीर में गहराई तक पहुँचती है। बिना आसन किए सीधे कपालभाति या भस्त्रिका करना श्वसन तंत्र पर अनावश्यक दबाव डाल सकता है।

आसन के बाद 2 से 5 मिनट शवासन या विश्राम करें, फिर प्राणायाम शुरू करें।

प्राणायाम का सही क्रम

प्राणायाम का क्रम सही होना उतना ही जरूरी है जितना अभ्यास स्वयं। सही क्रम से किया गया अभ्यास अधिक प्रभावी होता है, जबकि असंतुलित क्रम से किया गया अभ्यास कभी-कभी हानिकारक भी हो सकता है।

प्राणायाम की सही मुद्रा — सुखासन और ज्ञान मुद्रा
प्राणायाम में सुखासन और ज्ञान मुद्रा सही बैठने की स्थिति है।
पहला चरण — बैठने की स्थिति पद्मासन, सिद्धासन या सुखासन में बैठें। पीठ और गर्दन सीधी रखें। हाथ ज्ञान मुद्रा में रखें। आँखें कोमलता से बंद करें। कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास को सामान्य होने दें।
दूसरा चरण — पूरक-रेचक (श्वास को जागृत करना) सबसे पहले 4-5 बार गहरा दीर्घ श्वास लें और पूरी तरह छोड़ें। यह श्वसन तंत्र को प्राणायाम के लिए तैयार करता है — इसे श्वास का "warming up" समझें।
तीसरा चरण — कपालभाति या भस्त्रिका श्वास जागृत होने के बाद कपालभाति का अभ्यास करें। यह सभी मौसमों में किया जा सकता है।

यदि सर्दी का मौसम हो तो भस्त्रिका प्राणायाम करें। यह सर्दियों में शरीर को ऊर्जा देता है। गर्मी के मौसम में भस्त्रिका न करें।
चौथा चरण — अनुलोम-विलोम इसके बाद अनुलोम-विलोम का अभ्यास करें। कपालभाति के बाद श्वास नलिकाएँ साफ हो चुकी होती हैं, इसलिए इस चरण में अनुलोम-विलोम का प्रभाव अधिक गहरा होता है। यह शरीर की ऊर्जा को संतुलित करता है।
पाँचवाँ चरण — मौसम के अनुसार प्राणायाम इस चरण में अपनी आवश्यकता और मौसम के अनुसार कोई एक अभ्यास चुनें —
  • शीतली, शीतकारी और चंद्रभेदी — केवल गर्मी के मौसम में
  • सूर्यभेदी — केवल सर्दी के मौसम में
  • भ्रामरी — सभी मौसमों में, विशेषकर तनाव और अनिद्रा में लाभकारी
छठा और अंतिम चरण — नाड़ी शोधन अभ्यास का समापन नाड़ी शोधन प्राणायाम से करें। यह प्राणिक नाड़ियों का शुद्धिकरण करता है और पूरे अभ्यास के प्रभाव को संतुलित करते हुए श्वास को सामान्य गति में लाता है।

सभी चरण पूरे होने के बाद कुछ क्षण शांत बैठें और आँखें धीरे से खोलें।

मौसम के अनुसार प्राणायाम

मौसम के अनुसार प्राणायाम का चुनाव करना अनिवार्य है। कुछ अभ्यास सर्दियों में लाभकारी होते हैं तो वही अभ्यास गर्मियों में हानिकारक हो सकते हैं। इसलिए ऋतु के अनुसार सही प्राणायाम चुनना जरूरी है। विस्तृत जानकारी के लिए देखें: मौसम के अनुसार प्राणायाम

शरद ऋतु (सर्दियों) में

सर्दियों में शरीर को ऊर्जा और गर्मी देने वाले प्राणायाम करें।

प्राणायाम प्रभाव करें या न करें?
भस्त्रिकाशरीर को ऊर्जा और गर्मी देता हैकरें
सूर्यभेदीसूर्य नाड़ी सक्रिय, शरीर को गर्मी देता हैकरें
शीतलीशरीर को ठंडक देता हैन करें
शीतकारीशरीर को ठंडक देता हैन करें
चंद्रभेदीचंद्र नाड़ी से शीतलता देता हैन करें

ग्रीष्म ऋतु (गर्मियों) में

गर्मियों में शरीर को शीतलता देने वाले प्राणायाम करें।

प्राणायाम प्रभाव करें या न करें?
शीतलीशरीर को ठंडक देता हैकरें
शीतकारीशरीर को ठंडक देता हैकरें
चंद्रभेदीचंद्र नाड़ी से शीतलता देता हैकरें
भस्त्रिकाशरीर में गर्मी बढ़ाता हैन करें
सूर्यभेदीशरीर में गर्मी बढ़ाता हैन करें

वर्षा ऋतु में

वर्षा ऋतु में बाहर खुले स्थान पर अभ्यास न करें। घर के अंदर हवादार स्थान पर करें। भीगे वातावरण में प्राणायाम करने से सर्दी-खाँसी या श्वसन की समस्या हो सकती है।

हर मौसम में किए जाने वाले प्राणायाम

ये चार प्राणायाम किसी भी ऋतु में किए जा सकते हैं —

  • कपालभाति
  • अनुलोम-विलोम
  • भ्रामरी
  • नाड़ी शोधन

शरीर की क्षमता के अनुसार अभ्यास

प्राणायाम सबके लिए है — लेकिन सबके लिए एक जैसा नहीं है। अपनी शारीरिक स्थिति को पहचानना और उसके अनुसार अभ्यास करना बहुत जरूरी है।

वृद्ध व्यक्तियों के लिए

जो वृद्ध व्यक्ति पहली बार प्राणायाम शुरू कर रहे हैं, वे धीरे-धीरे शुरुआत करें।

  • अनुलोम-विलोम और भ्रामरी जैसे सरल प्राणायाम से शुरू करें।
  • आरंभिक अभ्यास में कुम्भक (श्वास रोकना) न करें।
  • यदि श्वासों की स्थिति ठीक हो तो धीमी गति से कपालभाति कर सकते हैं।
  • अस्थमा या हृदय रोग से पीड़ित वृद्ध व्यक्ति चिकित्सक की सलाह के बाद ही करें।

रोगी व्यक्तियों के लिए

उच्च रक्तचाप (High BP):
रक्तचाप में तीव्र गति के प्राणायाम न करें। धीमी गति से अनुलोम-विलोम और भ्रामरी लाभकारी हैं। विस्तार के लिए देखें: रक्तचाप नियंत्रण के लिए प्राणायाम

अस्थमा:
कुम्भक न लगाएँ। श्वास को अधिक देर तक रोकना इस रोग में हानिकारक हो सकता है। बिना कुम्भक के सरल प्राणायाम करें।

हृदय रोग:
तीव्र गति के प्राणायाम बिल्कुल न करें। सरल और धीमी गति के प्राणायाम करें। कुम्भक का प्रयोग केवल चिकित्सक की सलाह के बाद करें।

आँत रोग / पेट का ऑपरेशन:
पेट पर दबाव डालने वाली कोई क्रिया न करें। कपालभाति, भस्त्रिका, नौलि और उड्डियान बंध वर्जित हैं।

गर्भवती महिलाओं के लिए

  • आरामदायक स्थिति में बैठें — कुर्सी पर बैठकर भी अभ्यास किया जा सकता है।
  • पेट पर दबाव डालने वाला कोई अभ्यास न करें।
  • अनुलोम-विलोम और भ्रामरी सुरक्षित हैं।
  • कुम्भक न करें।

बंध और कुम्भक का महत्व

प्राणायाम का गहरा लाभ बंध और कुम्भक से प्राप्त होता है। शास्त्रों में इन्हें प्राणायाम का अभिन्न अंग माना गया है।

कुम्भक अर्थात श्वास को रोकना — यह प्राण-शक्ति को शरीर में स्थिर करता है। जब श्वास रुकती है तो प्राण-वायु सूक्ष्म नाड़ियों तक पहुँचती है।

बंध कुम्भक को और प्रभावशाली बनाते हैं। मूलबंध, जालंधर बंध और उड्डियान बंध — ये तीनों मिलकर प्राण को ऊर्ध्वगामी करते हैं।

लेकिन ध्यान रखें —

  • यदि श्वास सामान्य है तो धीरे-धीरे कुम्भक का अभ्यास शुरू करें।
  • यदि श्वसन या हृदय रोग है तो कुम्भक न करें।
  • शुरुआत में बिना कुम्भक के भी प्राणायाम पूरा लाभ देता है।

सारांश

प्राणायाम करना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है उसे सही ढंग से करना। सही समय, सही स्थान, सही क्रम और मौसम का ध्यान रखने से प्राणायाम का लाभ कई गुना बढ़ जाता है। अपने शरीर की स्थिति को समझें, जल्दबाजी न करें और नियमित अभ्यास जारी रखें। यही प्राणायाम का असली नियम है।

FAQ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्र. प्राणायाम या आसन — पहले क्या करना चाहिए?

उ. पहले आसन का अभ्यास करें, फिर 2 से 5 मिनट विश्राम करें। इसके बाद ही प्राणायाम शुरू करें। यह क्रम शरीर को प्राणायाम के लिए पूरी तरह तैयार करता है।

प्र. कौन सा प्राणायाम सबसे अधिक लाभकारी होता है?

उ. सभी प्राणायाम अपने-अपने उद्देश्य के अनुसार लाभकारी हैं। लेकिन प्रत्येक व्यक्ति की शारीरिक स्थिति अलग होती है। सरल प्राणायाम जैसे अनुलोम-विलोम और भ्रामरी सदैव सुरक्षित और लाभकारी हैं।

प्र. क्या रोज प्राणायाम करना जरूरी है?

उ. हाँ, नियमितता सबसे महत्वपूर्ण है। रोज 15 से 20 मिनट का नियमित अभ्यास, सप्ताह में एक-दो बार लंबे अभ्यास करने से अधिक लाभकारी है।

प्र. क्या गर्मियों में भस्त्रिका प्राणायाम कर सकते हैं?

उ. नहीं। भस्त्रिका शरीर में गर्मी बढ़ाता है, इसलिए गर्मी के मौसम में यह वर्जित है। इसे केवल शरद ऋतु में करें।

प्र. क्या बीमार व्यक्ति प्राणायाम कर सकता है?

उ. हाँ, लेकिन रोग के अनुसार सही प्राणायाम का चयन जरूरी है। उच्च रक्तचाप, अस्थमा और हृदय रोगियों के लिए विशेष सावधानियाँ हैं। विस्तार के लिए ऊपर "शरीर की क्षमता के अनुसार अभ्यास" अनुभाग देखें।

Disclaimer: प्रत्येक व्यक्ति की शारीरिक स्थिति और श्वास क्षमता अलग-अलग होती है। यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है। किसी रोग की अवस्था में प्राणायाम शुरू करने से पहले अपने चिकित्सक की सलाह अवश्य लें। बलपूर्वक या क्षमता से अधिक किया गया अभ्यास हानिकारक हो सकता है।

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