कुछ योग प्रशिक्षक कपालभाति को "प्राणायाम" बताकर अभ्यास कराते हैं, जबकि अधिकतर विद्वान इसे एक शुद्धि क्रिया मानते हैं। तो सच्चाई क्या है — क्या कपालभाति एक शुद्धि क्रिया है, या यह प्राणायाम भी है? इसे समझने के लिए पहले जानना ज़रूरी है कि शुद्धि क्रिया और प्राणायाम की परिभाषा क्या है, और कपालभाति इनमें से किस श्रेणी में आती है।
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| कपालभाति — कपाल शुद्धि क्रिया का अभ्यास करते हुए एक महिला अभ्यासी |
इस आर्टिकल को English Language में पढ़ने के लिए देखें - How to do Kapalbhati?
विषय सूची
- कपालभाति: शुद्धि क्रिया या प्राणायाम?
- षट्कर्म क्या है? इसमें कपालभाति का स्थान
- प्राणायाम क्या है? पूरक-रेचक-कुम्भक का सिद्धांत
- क्या कपालभाति प्राणायाम के सिद्धांतों को पूरा करती है?
- अनुभवी अभ्यासियों के लिए — कुम्भक सहित कपालभाति
- सारांश
- FAQ
- Disclaimer
कपालभाति: शुद्धि क्रिया या प्राणायाम?
अधिकांश योग गुरु इसे "कपालभाति प्राणायाम" कहकर ही अभ्यास कराते हैं, जबकि पारंपरिक हठयोग ग्रंथों के अनुसार यह मूलतः एक शुद्धि क्रिया है। इसे समझने के लिए पहले शुद्धि क्रिया और प्राणायाम — दोनों की परिभाषा जाननी होगी।
षट्कर्म क्या है? इसमें कपालभाति का स्थान
प्राचीन काल में ऋषि-मुनि साधना में कोई अवरोध न आए, इसलिए पहले शुद्धि क्रियाएं करते थे। यही कारण है कि योग में ध्यान-साधना से पहले आसन-प्राणायाम को, और आसन-प्राणायाम से भी पहले शुद्धि क्रियाओं को स्थान दिया गया है।
हठयोग में शरीर-शुद्धि के लिए षट्कर्म (छह शुद्धि क्रियाएं) बताई गई हैं, जिनमें कपालभाति भी एक शुद्धि क्रिया है:
1. धौति
आहार-नली की शुद्धि की क्रिया — अतिरिक्त एसिड व अपचित पदार्थ बाहर निकाले जाते हैं। दो विधियां प्रचलित हैं — कुंजल क्रिया और वस्त्र-धौति। कुंजल क्रिया सरल है: सामान्य पानी पीकर, आगे झुककर, कंठ में उंगली डालकर वमन द्वारा पानी बाहर निकाला जाता है। (यह क्रिया रोज़ न करें, महीने में एक-दो बार ही करें।)
2. वस्ति
बड़ी आंत की स्वच्छता के लिए — आधुनिक चिकित्सा में इसे एनिमा कहा जाता है, योग में "शंख प्रक्षालन"। मलद्वार से नली द्वारा पानी बड़ी आंत तक पहुंचाया जाता है। ⚠️ यह क्रिया प्रशिक्षक या चिकित्सक की देखरेख में ही करें।
3. नेति
नासिका व कंठ की शुद्धि के लिए — तीन विधियां: सूत्र नेति, रबड़ नेति, और जलनेति। जलनेति सबसे सरल व सुरक्षित है — गुनगुने नमक-पानी को एक नासिका से डालकर दूसरी से निकाला जाता है, अंत में रेचक करके शेष पानी बाहर निकाला जाता है। पूरी विधि यहां पढ़ें: जलनेति क्रिया कैसे करें?
(सूत्र व रबड़ नेति प्रशिक्षक के निर्देशन में ही करें।)
4. त्राटक
नेत्र-पेशियों को सक्रिय व एकाग्रता बढ़ाने की क्रिया — पद्मासन/सुखासन में बैठकर किसी बिंदु को बिना पलक झपकाए देखा जाता है, फिर आंखें कोमलता से बंद की जाती हैं। यह क्रिया आंखों के लिए भी लाभकारी है; अन्य उपाय यहां पढ़ें: नेत्र व्यायाम के अन्य उपाय
5. नौली
अपच व वायु-विकार के लिए — खड़े होकर आगे झुकते हुए पेट की मांसपेशियों को आगे-पीछे घुमाया जाता है। ⚠️ आंत-रोग या पेट की सर्जरी हुई हो तो यह क्रिया न करें, प्रशिक्षक से सीखकर ही करें।
6. कपालभाति
कपाल भाग (मस्तिष्क) की शुद्धि की क्रिया — इससे फेफड़े सक्रिय होते हैं, श्वसनतंत्र के अवरोध दूर होते हैं और हृदय को मज़बूती मिलती है। मूल विधि में पद्मासन/सुखासन में बैठकर सामान्य गति से श्वास लेते हुए तीव्र गति से छोड़ा जाता है और पेट को अंदर खींचा जाता है। कपालभाति के बाद शरीर में आई ऊर्जा को संतुलित करने के लिए अनुलोम विलोम अवश्य करें। संपूर्ण विधि, लाभ व सावधानियों के लिए पढ़ें: कपालभाति प्राणायाम कैसे करें?
प्राणायाम क्या है? पूरक-रेचक-कुम्भक का सिद्धांत
प्राणायाम अष्टांगयोग का एक महत्वपूर्ण अंग है, जिसका क्रम आसन के बाद आता है। इससे प्राणिक नाड़ियों का शोधन होता है। इसका नियमित अभ्यास प्राण-शक्ति को सुदृढ़ करता है।
महर्षि पतंजलि प्राणायाम में श्वासों की तीन अवस्थाएं बताते हैं — बाह्य वृत्ति, आभ्यंतर वृत्ति और स्तम्भ वृत्ति (योगसूत्र 2.50)। व्यावहारिक रूप से इन्हें तीन स्थितियों में समझा जाता है:
- पूरक — श्वास को अधिकतम अंदर भरना
- रेचक — श्वास को पूरी तरह बाहर निकालना
- कुम्भक — श्वास को रोकना (पूरक के बाद आंतरिक कुम्भक, रेचक के बाद बाह्य कुम्भक)
इनके साथ बंध का प्रयोग किया जाता है — मूल बंध, जलंधर बंध और उड्डियान बंध — जो प्राण-शक्ति को सही दिशा देकर एक "लॉक" का काम करते हैं। योगसूत्र के अनुसार रेचक, पूरक और कुम्भक प्राणायाम के मूल सिद्धांत हैं।
क्या कपालभाति प्राणायाम के सिद्धांतों को पूरा करती है?
कपालभाति मूलतः शुद्धि क्रिया है, लेकिन यह प्राणायाम के मूल सिद्धांत भी पूरा करती है:
- पूरक-रेचक: कपालभाति में पूरक सामान्य गति से और रेचक तीव्र गति से होता है — यह प्राणायाम का मूल आधार है।
- बंध-कुम्भक: नए अभ्यासी आरम्भ में बिना कुम्भक का अभ्यास करें; अनुभवी अभ्यासी इसे बंध व कुम्भक के साथ ही करते हैं।
क्योंकि यह क्रिया प्राणायाम के सिद्धांतों को भी पूरा करती है, इसी वजह से अधिकतर विद्वान इसे प्राणायाम भी मानते हैं। लेकिन इसकी मूल प्रकृति शुद्धि क्रिया की ही है।
अनुभवी अभ्यासियों के लिए — कुम्भक सहित कपालभाति
जब अनुभवी अभ्यासी कपालभाति में कुम्भक व त्रिबंध (मूलबंध, जलंधर बंध, उड्डियान बंध) जोड़ते हैं, तो यह अभ्यास प्राणायाम के सिद्धांतों के और करीब आ जाता है — आवृत्ति के अंत में पूर्ण रेचक करके बाह्य कुम्भक व त्रिबंध लगाया जाता है, फिर पूरक करके आंतरिक कुम्भक व बंध लगाया जाता है। (नए अभ्यासी इसे बिना कुम्भक के ही करें।) इस advanced विधि का पूरा चरण-दर-चरण विवरण ऊपर दिए गए "कपालभाति प्राणायाम कैसे करें?" आर्टिकल में पढ़ें।
सारांश
योग विवाद का विषय नहीं है। कपालभाति मूलतः एक शुद्धि क्रिया है, लेकिन पूरक-रेचक-कुम्भक के सिद्धांतों को पूरा करने के कारण इसे प्राणायाम की तरह भी अभ्यास किया जा सकता है। इसलिए इस बहस में उलझने के बजाय इसके अभ्यास और लाभ पर ध्यान देना अधिक उपयोगी है।
पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
Q1. कपालभाति शुद्धि क्रिया है या प्राणायाम?
यह मूलतः षट्कर्म की एक शुद्धि क्रिया है, लेकिन पूरक-रेचक-कुम्भक के सिद्धांतों को पूरा करने के कारण इसे प्राणायाम की तरह भी अभ्यास किया जाता है।
Q2. षट्कर्म में कौन-सी छह क्रियाएं शामिल हैं?
धौति, वस्ति, नेति, त्राटक, नौली और कपालभाति।
Q3. क्या कपालभाति में कुम्भक लगाना ज़रूरी है?
नहीं। नए अभ्यासियों को बिना कुम्भक के ही अभ्यास करना चाहिए; कुम्भक व बंध केवल अनुभवी अभ्यासियों के लिए है।
Q4. कपालभाति के बाद कौन-सा प्राणायाम करना चाहिए?
कपालभाति से मिलने वाली ऊर्जा को संतुलित करने के लिए अनुलोम विलोम अवश्य करें।
Disclaimer
किसी प्रकार के रोगों का उपचार हमारा उद्देश्य नहीं है। केवल योग के प्रति जागरूकता ही हमारा उद्देश्य है।
