योग भारत की एक प्राचीन जीवन शैली है और आज पूरे विश्व में स्वास्थ्य, मानसिक शांति और संतुलित जीवन के लिए इसका अभ्यास किया जा रहा है। अक्सर यह प्रश्न पूछा जाता है कि योग का आरम्भ कब हुआ और योग के जनक कौन हैं। कई लोग महर्षि पतंजलि को योग का जनक मानते हैं, क्योंकि उन्होंने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ पतंजलि योगसूत्र में योग के सिद्धांतों को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किया।
लेकिन एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि क्या वास्तव में महर्षि पतंजलि ही योग के संस्थापक थे, या योग उनसे पहले भी अस्तित्व में था। इस लेख में हम योग की उत्पत्ति, महर्षि पतंजलि के जीवन और योग में उनके योगदान को सरल रूप में समझने का प्रयास करेंगे।
इस विषय का English article पढ़ने के लिए देखें: Why is Patanjali Called the Father of Yoga? Was He the Founder of Yoga?
विषय सूची
- आदियोगी (प्रथम योगी) भगवान शिव
- पतंजलि का काल-खण्ड
- महर्षि पतंजलि का जीवन परिचय
4. पतंजलि योगसूत्र क्या है
6. पतंजलि के सुप्रसिद्ध योगसूत्र
7. पतंजलि से पूर्व योग की स्थिति
8. महर्षि पतंजलि का योगदान
9. लेख सारांश
10. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
योग का इतिहास और उत्पत्ति
योग का इतिहास अत्यंत प्राचीन माना जाता है। भारतीय परम्परा के अनुसार योग का उल्लेख वेदों, उपनिषदों और अनेक प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। ये सभी ग्रंथ अनादि काल से हैं। इस लिए इन ग्रंथों तथा योग का काल निर्धारण करना बहुत कठिन है।
प्राचीन समय में योग मुख्य रूप से ऋषि-मुनियों, योगियों और सन्यासियों द्वारा साधना के रूप में किया जाता था। यह ज्ञान केवल गुरुकुलों और आश्रमों तक सीमित था। कठिन भाषा में होने के कारण यह आम लोगों की पहुँच में नहीं था। इसको सरल भाषा में आम-जन तक पहुंचाने का श्रेय महर्षि पतंजलि को दिया जाता है।
यदि योग महर्षि पतंजलि से पूर्व अस्तित्व में था, तो उनको योग का जनक क्यों माना जाता है? प्रथम योग गुरु कौन थे? इन विषयों को आगे विस्तार से समझ लेते हैं।
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| भारतीय परम्परा के अनुसार भगवान शिव को आदियोगी अर्थात् प्रथम योगी |
आदियोगी (प्रथम योगी) भगवान शिव
भारतीय परम्परा में भगवान शिव को आदियोगी अर्थात् प्रथम योगी माना जाता है। अनेक धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव ने ही सबसे पहले योग का ज्ञान मानव समाज को दिया था।
कहा जाता है कि सर्व प्रथम भगवान शिव ने सप्त ऋषियों को योग का ज्ञान दिया और उन्हीं के माध्यम से यह ज्ञान विश्व के विभिन्न भागों तक पहुँचा। इसलिए योग की परम्परा को अत्यंत प्राचीन और सनातन माना जाता है।
हालाँकि इतिहास के दृष्टिकोण से योग के आरम्भ का सटीक समय निर्धारित करना कठिन है, लेकिन यह निश्चित है कि योग की परम्परा महर्षि पतंजलि से पहले भी अस्तित्व में थी। यदि ऐसा है तो पतंजलि को योग जनक क्यों कहा जाता है? इसको समझने के लिए पतंजलि के विषय में जानना होगा।
महर्षि पतंजलि कौन थे?
महर्षि पतंजलि प्राचीन भारत के महान ऋषि, दार्शनिक और योगाचार्य थे। उन्होंने योग के सिद्धांतों को व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया और योग को एक स्पष्ट दर्शन के रूप में स्थापित किया।
वे केवल योग के ज्ञाता ही नहीं थे, बल्कि संस्कृत भाषा के महान विद्वान और व्याकरणाचार्य भी थे। भारतीय परम्परा में उन्हें योग, व्याकरण और आयुर्वेद तीनों क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान देने वाला महान मुनि माना जाता है।
पतंजलि का काल-खण्ड
इतिहासकारों के अनुसार महर्षि पतंजलि का समय लगभग 200 ईसा पूर्व से 150 ईसा पूर्व के बीच माना जाता है। यह काल प्राचीन भारत में शुंग वंश का समय था।
यद्यपि उनके जीवन के बारे में बहुत अधिक ऐतिहासिक विवरण उपलब्ध नहीं हैं, फिर भी उनके ग्रंथों के कारण वे भारतीय दर्शन के महान विद्वानों में गिने जाते हैं।
महर्षि पतंजलि का जीवन परिचय
महर्षि पतंजलि के जीवन के बारे में सीमित जानकारी उपलब्ध है, क्योंकि उन्होंने अपने व्यक्तिगत जीवन के बारे में अधिक नहीं लिखा। परंपरागत मान्यताओं के अनुसार उनका जन्म उत्तर भारत के क्षेत्र में हुआ था।
वे एक महान योगाचार्य होने के साथ-साथ संस्कृत भाषा के विद्वान और आयुर्वेद के ज्ञाता भी थे। इस कारण उन्हें भारतीय ज्ञान परम्परा के महत्वपूर्ण आचार्यों में स्थान दिया जाता है।
पतंजलि के प्रमुख ग्रंथ
महर्षि पतंजलि ने संस्कृत भाषा मे कई ग्रंथों की रचना की है। इन मे तीन ग्रंथ मुख्य हैं:
- योगसूत्र
- अष्टाध्यायी पर महाभाष्य
- आयुर्वेद पर ग्रंथ
- समाधि पाद :-- (51 सूत्र)
- साधन पाद :-- (55 सूत्र)
- विभूति पाद :--(55 सूत्र)
- कैवल्य पाद :-- (34 सूत्र)
महाभाष्य :-- उस समय संस्कृत एक जन भाषा थी। महर्षि पाणिनि उस समय के प्रसिद्ध व्याकरणाचार्य हुए हैं। उन्होने अष्टाध्यायी नाम के एक महान ग्रंथ की रचना की है। महर्षि पतंजलि ने इस ग्रंथ पर टीका लिखी है। यह महाभाष्य के नाम से प्रसिद्ध है।
आयुर्वेद :-- वे एक महान रसायनशास्त्री भी थे। आयुर्वेद पर कई ग्रंथ लिखे हैं। चरक संहिता के लिए श्रेय उनको ही दिया जाता है।
पतंजलि योगसूत्र क्या है?
अष्टांग योग
- यम
- नियम
- आसन
- प्राणायाम
- प्रत्याहार
- धारणा
- ध्यान
- समाधि
पतंजलि के सुप्रसिद्ध योगसूत्र
महर्षि पतंजलि द्वारा रचित योगसूत्र में चार पाद (अध्याय) हैं। इन चारों पाद में 195 सूत्र हैं। इनमें कुछ सुप्रसिद्ध सूत्र इस प्रकार हैं :-
।। अथ: योगानुशासनम् ।। 1.1 ।।
अर्थ :--- अब हम योग अनुशासन का आरम्भ करते हैं।
इस सूत्र में अनुशासन को महत्व दिया गया है। केवल आसन-प्राणायाम कर लेना ही योग नहीं है। बल्कि अनुशासित जीवन योग का मुख्य अंग है। अर्थात् यदि अनुशासन है तो योग है।
।। योगश्चितवृतिनिरोध: ।। 1.2 ।।
अर्थ :-- चित्त की वृतियों का निरोध हो जाना ही योग है।
इसका अर्थ है कि जब वृत्तियों पर रोक लग जाए तो वह योग की स्थिति है।
।। अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सनसन्निधौ वैरत्याग:।। 2.35 ।।
अर्थ :--- अहिंसा की दृढ़ स्थिति हो जाने पर उस व्यक्ति (योगी) के निकट सब प्राणी वैर भाव छोड़ देते हैं।
साधन पाद के इस सूत्र में अहिंसा का महत्व बताया गया है। इसका सरलार्थ है कि जो व्यक्ति दूसरों को कष्ट न देने का भाव मन में रखता है, तो उसके निकट सभी प्राणी वैर (शत्रुता) छोड़ देते हैं।
।। स्थिर सुखमासनम् ।। 2.46 ।।
अर्थ :-- स्थिरता से और सुखपूर्वक स्थिति में ठहरना ही आसन है।
- स्थिरता
- सुख पूर्वक
यहाँ यह बताया गया है कि आसन सरलता से करें। आसन की पूर्ण स्थिति में पहुँच कर स्थिरता से सुखपूर्वक रुकें। जिस आसन में सुख की अनुभूति हो उसी का अभ्यास करें। कठिन आसन न करें।
अर्थ :-- स्थिति के सिद्ध हो जाने पर, श्वास (पूरक) तथा प्रश्वास (रेचक) की सहज गति को स्थिर कर देना या रोक देना ही प्राणायाम है।
साधन पाद के इस सूत्र में "प्राणायाम" को परिभाषित किया है। प्राणायाम के बारे में सरलता से बताया है। इसका भवार्थ है कि श्वास लेने व छोड़ने की सहज गति रोक देना (विराम देना) ही प्राणायाम है।
पतंजलि से पूर्व योग की स्थिति
महर्षि पतंजलि से पहले भी योग अस्तित्व मे था। लेकिन उस समय यह बिखरी हुई स्थिति में तथा कठिन भाषा में था। इसका प्रयोग केवल ऋषि- मुनि ध्यान साधना के लिए करते थे। पतंजलि से पहले योग गुरुकुलों व आश्रमों तक सीमित था। इसकी पहुंच जन-साधारण तक नहीं थी।
महर्षि पतंजलि ने उस बिखरे हुए योग को संकलित किया। तथा सरलता से परिभाषित किया। उनसे पहले और भी कई ऋषि, मुनि व योगी हुए हैं। उन सब ने योग को आगे बढाने का काम किया है। लेकिन योग का सरलीकरण करने का श्रेय पतंजलि को ही दिया जाता है।
महर्षि पतंजलि का योगदान
यह सत्य है कि भारत मे योग बहुत पुरातन है। यह हमारे धार्मिक ग्रंथो में पतंजलि से पहले भी था। महर्षि पतंजलि से पूर्व कई योगाचार्य हुए हैं। उन सब ने योग को नई दिशा देने का काम किया है। लेकिन इसमें पतंजलि का मुख्य योगदान है। यही कारण है कि महर्षि पतंजलि को योग का जनक माना जाता है।
लेख सारांश
भरत में योग आदि काल से है। महर्षि पतंजलि से पहले यह बिखरी हुई अवस्था में था। महर्षि पतंजलि ने इसे संकलित किया और सरल रूप से परिभाषित करके इसे जन-साधारण तक पहुंचाया। इसी लिए पतंजलि को योग का जनक कहा जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
योग का आरम्भ कब हुआ?
योग का आरम्भ अत्यंत प्राचीन काल में भारत में हुआ माना जाता है। इसके उल्लेख वेदों, उपनिषदों और अन्य प्राचीन भारतीय ग्रंथों में मिलते हैं। इसलिए योग की उत्पत्ति का सटीक समय निर्धारित करना कठिन है।
प्रथम योगी या प्रथम योग गुरु कौन थे?
भारतीय परम्परा के अनुसार भगवान शिव को आदियोगी अर्थात् प्रथम योगी और प्रथम योग गुरु माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव ने ही सबसे पहले योग का ज्ञान सप्त ऋषियों को दिया और उन्हीं के माध्यम से यह ज्ञान संसार में फैल गया।
योग के जनक कौन हैं?
महर्षि पतंजलि को सामान्यतः योग का जनक कहा जाता है। उन्होंने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ पतंजलि योगसूत्र में योग के सिद्धांतों को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किया, इसलिए उन्हें योग दर्शन का प्रमुख आचार्य माना जाता है।
क्या महर्षि पतंजलि ही योग के संस्थापक थे?
नहीं, योग महर्षि पतंजलि से पहले भी अस्तित्व में था। लेकिन पतंजलि ने योग के सिद्धांतों को संकलित करके उन्हें एक व्यवस्थित दर्शन के रूप में प्रस्तुत किया, इसलिए उन्हें योग का जनक कहा जाता है।
पतंजलि योगसूत्र क्या है?
पतंजलि योगसूत्र योग दर्शन का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इसमें योग के सिद्धांतों और साधना के मार्ग को 195 सूत्रों में समझाया गया है। यह ग्रंथ चार भागों (पाद) में विभाजित है – समाधि पाद, साधन पाद, विभूति पाद और कैवल्य पाद।
अष्टांग योग क्या है?
अष्टांग योग महर्षि पतंजलि द्वारा बताए गए योग के आठ चरणों का मार्ग है। इसमें यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि शामिल हैं। इन आठ अंगों के माध्यम से व्यक्ति आत्मिक और मानसिक विकास की ओर बढ़ता है।
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