पतंजलि योग क्या है? पतंजलि योग प्राचीन भारत की एक श्रेष्ठ जीवन शैली और शास्त्रीय योग पद्धति है, जिसे महर्षि पतंजलि ने अपने महान ग्रंथ योगसूत्र में व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किया। योग केवल कुछ आसन या प्राणायाम तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शरीर, मन और मस्तिष्क को संतुलित और स्वस्थ रखने वाला संपूर्ण अनुशासन है।
आज विश्व में प्रचलित शास्त्रीय योग का आधार महर्षि पतंजलि का योगसूत्र ही है, जिसमें योग की स्पष्ट परिभाषा और अष्टांग योग के आठ अंगों का वर्णन मिलता है। पतंजलि योग क्या है? महर्षि पतंजलि कौन थे? योगसूत्र में योग की क्या परिभाषा दी गई है? अष्टांग योग हमारे जीवन को कैसे प्रभावित करता है? इन सभी प्रश्नों की विस्तृत और सरल जानकारी इस लेख में दी जाएगी।
(If you want to understand this topic in English, you can read : What Is Patanjali Yoga?)
विषय सूची (Table Of Contents)
2. पतंजलि कौन थे?
3. पतंजलि का संक्षिप्त परिचय
4. पतंजलि की रचनाएँ
4.1 महाभाष्य
4.2 योगसूत्र
5. योगसूत्र के अनुसार पतंजलि योग
5.1 योग एक अनुशासन
5.2 चित्तवृत्ति निरोध
5.3 चित्तवृत्तियों का निरोध कैसे करें?
6. अष्टांग योग क्या है?
7. अष्टांग योग के आठ अंग
7.1 यम
7.2 नियम
7.3 आसन
7.4 प्राणायाम
7.5 प्रत्याहार
7.6 धारणा
7.7 ध्यान
7.8 समाधि
8. अष्टांग योग सरल शब्दों में
9. योग कौन कर सकता है?
10. योगाभ्यास में सावधानियाँ
11. योग किन परिस्थितियों में नहीं करना चाहिए?
12. सारांश
13. FAQ
14. Disclaimer
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| महर्षि पतंजलि के अष्टांग योग में ध्यान मन को स्थिर और शुद्ध करने की महत्वपूर्ण अवस्था है। |
पतंजलि योग क्या है?
प्राचीन काल में योग मुख्यतः ऋषि-मुनियों के आश्रमों तक सीमित था। उस समय इसे ध्यान-साधना (Meditation) और आत्मचिंतन के लिए किया जाता था। सामान्य लोगों के जीवन में इसका सीधा प्रवेश नहीं था। लेकिन आज के समय में योग को शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक संतुलन और तनाव मुक्ति की एक प्रभावी विधि के रूप में स्वीकार किया जाता है।
धार्मिक ग्रंथों में योग का विस्तार से वर्णन मिलता है, परंतु वह ज्ञान कठिन भाषा और बिखरे रूप में होने के कारण आम लोगों की पहुँच से दूर था। इस ज्ञान को व्यवस्थित, सरल और सूत्रबद्ध रूप में प्रस्तुत करने का कार्य महर्षि पतंजलि ने किया, इसी को पतंजलि योग कहा जाता है। उनके द्वारा रचित योगसूत्र एक महान कृति है, जिसमें योग को सूत्रों द्वारा परिभाषित किया गया है। यह ग्रंथ आज भी योग का प्रमुख आधार और मार्गदर्शक माना जाता है।
पतंजलि कौन थे?
पतंजलि योग क्या है, इसे समझने से पहले महर्षि पतंजलि के जीवन और उनके योगदान को जानना आवश्यक है। प्राचीन भारत में अनेक ऋषि-मुनियों ने योग को विकसित और परिभाषित किया, परंतु महर्षि पतंजलि ने इसे सरल, व्यवस्थित और सूत्रबद्ध रूप दिया। इसी लिए आज उनको योग का जनक (Founder of Yoga) कहा जाता है।
इस विषय पर विस्तृत चर्चा यहाँ पढ़ें — “क्या पतंजलि योग के जनक हैं?”
उनका कालखंड लगभग 200 से 250 ईसा पूर्व माना जाता है। इतिहासकारों के अनुसार वे शुंग वंश के राजा पुष्यमित्र शुंग के समकालीन थे। उनको महर्षि पाणिनि का शिष्य माना जाता है। वे योगाचार्य, व्याकरणाचार्य तथा वैद्यक और रसायन शास्त्र के ज्ञाता थे।
प्रारंभिक काल में योग का ज्ञान धार्मिक ग्रंथों में बिखरा हुआ और कठिन भाषा में उपलब्ध था, जिसके कारण यह सामान्य लोगों की पहुँच से दूर था। महर्षि पतंजलि ने इस बिखरे हुए योग ज्ञान को सूत्रों में संगठित कर सरल रूप में प्रस्तुत किया। आज विश्व में प्रचलित शास्त्रीय पतंजलि-योग उन्हीं की देन माना जाता है।
पतंजलि का संक्षिप्त परिचय
महर्षि पतंजलि का काल-निर्धारण लगभग 200–250 ईसा पूर्व माना जाता है। वे शुंग वंश के काल में विद्यमान थे। वे एक महान चिकित्सक और संस्कृत व्याकरण के आचार्य थे।
इस संदर्भ में राजा राजा भोज का प्रसिद्ध श्लोक उल्लेखनीय है—
योगेन चित्तस्य पदेन वाचां मलं शरीरस्य च वैद्यकेन। योऽपाकरोत्तं प्रवरं मुनिनां पतञ्जलिं प्राञ्जलिरानतोऽस्मि॥
अर्थात — जो मुनि चित्त की शुद्धि के लिए योग, वाणी की शुद्धि के लिए व्याकरण और शरीर की शुद्धि के लिए वैद्यकशास्त्र प्रदान करते हैं, उन श्रेष्ठ मुनि पतंजलि को मैं प्रणाम करता हूँ।
पतंजलि की रचनाएँ
महर्षि पतंजलि योग विशेषज्ञ होने के साथ-साथ संस्कृत भाषा के महान विद्वान भी थे। उन्होंने व्याकरण और वैद्यक पर महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की। उनके दो प्रमुख ग्रंथ हैं – महाभाष्य तथा योगसूत्र।
1. महाभाष्य
यह ग्रंथ संस्कृत व्याकरण पर आधारित है। यह अष्टाध्यायी पर लिखी गई टीका है। आज भी इसे संस्कृत व्याकरण का प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है।
2. योगसूत्र
योगसूत्र महर्षि पतंजलि की महान रचना है, जिसे आधुनिक शास्त्रीय योग का आधार माना जाता है। इसमें कुल चार पाद (अध्याय) हैं—
- समाधि पाद (51 सूत्र)
- साधना पाद (55 सूत्र)
- विभूति पाद (55 सूत्र)
- कैवल्य पाद (34 सूत्र)
इन्हीं सूत्रों में पतंजलि ने योग की परिभाषा, अष्टांग योग तथा चित्तवृत्ति निरोध का विस्तृत वर्णन किया है।
अब आगे देखते हैं कि योगसूत्र के अनुसार योग क्या है।
योगसूत्र के अनुसार पतंजलि योग क्या है?
योगसूत्र में महर्षि पतंजलि ने योग का विस्तार से वर्णन किया है। इस ग्रंथ में योग की परिभाषा, उसकी बाधाएँ तथा अष्टांग योग का स्पष्ट प्रतिपादन मिलता है। योगसूत्र के अनुसार योग केवल शारीरिक अभ्यास नहीं, बल्कि मन और चित्त के नियंत्रण की वैज्ञानिक प्रक्रिया है। आइए समझते हैं कि इस ग्रंथ में योग को किस प्रकार परिभाषित किया गया है।
1. अनुशासन
महर्षि पतंजलि योग को एक अनुशासन मानते हैं। वे योगसूत्र का आरंभ “अथ योगानुशासनम्” से करते हैं, जिसका अर्थ है — “अब योग के अनुशासन का वर्णन किया जाता है।”
इससे स्पष्ट होता है कि पतंजलि के अनुसार योग एक व्यवस्थित और अनुशासनात्मक पद्धति है। योग केवल आसन या प्राणायाम तक सीमित नहीं है। नियमित दिनचर्या, संतुलित आहार, संयमित व्यवहार, और निरंतर अभ्यास — ये सभी योग के अंग हैं। बिना अनुशासन के योग संभव नहीं है।
2. चित्तवृत्तियाँ
पतंजलि योग का मूल आधार चित्तवृत्तियों का निरोध है। योगसूत्र के पहले अध्याय के दूसरे सूत्र में योग की परिभाषा दी गई है—
“योगश्चित्तवृत्ति निरोधः” (1.2)
अर्थात — चित्त की वृत्तियों का निरोध करना ही योग है।
यहाँ ‘चित्तवृत्तियाँ’ से तात्पर्य मन में उत्पन्न होने वाले विचार, कल्पनाएँ और भावनात्मक तरंगों से है। योगसूत्र में इन वृत्तियों का विस्तृत वर्णन किया गया है और बताया गया है कि ये पाँच प्रकार की होती हैं। इन्हें क्लिष्ट (कष्टदायक) और अक्लिष्ट (अकष्टदायक) रूप में भी विभाजित किया गया है।
चित्त की इन वृत्तियों को विस्तार से समझने के लिए “चित्त वृत्तियाँ क्या हैं?” पढ़ें।
3. चित्तवृत्तियों का निरोध कैसे करें?
योगसूत्र में आगे चित्तवृत्तियों के निरोध का उपाय बताया गया है। इसके लिए महर्षि पतंजलि ने अष्टांग योग का प्रतिपादन किया है। अष्टांग योग को संपूर्ण योग माना जाता है, जिसमें आठ अंग बताए गए हैं—
- यम
- नियम
- आसन
- प्राणायाम
- प्रत्याहार
- धारणा
- ध्यान
- समाधि
इन आठों अंगों के क्रमिक अभ्यास से साधक चित्त की चंचल वृत्तियों पर नियंत्रण प्राप्त कर सकता है। आगे के भाग में अष्टांग योग को विस्तार से समझेंगे।
अष्टांग योग क्या है?
महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र में अष्टांग योग को विशेष महत्व दिया है। अष्टांग योग का अर्थ है — योग के आठ अंग। आधुनिक समय में प्रायः केवल आसन, प्राणायाम और ध्यान पर ही जोर दिया जाता है, जबकि पतंजलि के अनुसार संपूर्ण योग अष्टांग योग ही है।
अष्टांग योग के ये आठ अंग साधक को बाहरी आचरण से लेकर आंतरिक समाधि तक क्रमशः ले जाते हैं।
यम (Yama)
महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र (2.30) में कहा है:
“अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः”
अर्थात — अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह ये पाँच यम हैं।
यम सामाजिक नैतिकता (Social Discipline) से संबंधित नियम हैं। ये हमें समाज में संतुलित, संयमित और सदाचारी जीवन जीना सिखाते हैं।
पाँच यम (विस्तार सहित)
1. अहिंसा
किसी भी प्राणी को मन, वचन और कर्म से कष्ट न देना अहिंसा है।
केवल शारीरिक हिंसा ही नहीं, बल्कि कटु वचन, द्वेष और नकारात्मक विचार भी हिंसा माने गए हैं। योग में अहिंसा सबसे प्रथम और महत्वपूर्ण सिद्धांत है।
2. सत्य
विचार, वाणी और व्यवहार में सत्य का पालन करना ही सत्य है।
सत्य ऐसा होना चाहिए जो कल्याणकारी हो। कठोर सत्य जो दूसरों को आहत करे, वह योग के सिद्धांत के अनुरूप नहीं माना जाता।
3. अस्तेय
चोरी न करना, दूसरों की वस्तु या अधिकार का अनुचित उपयोग न करना अस्तेय है।
केवल भौतिक वस्तु ही नहीं, बल्कि समय, विचार या श्रेय (credit) की चोरी भी अस्तेय का उल्लंघन है।
4. ब्रह्मचर्य
इंद्रियों पर संयम रखना और ऊर्जा का संरक्षण करना ब्रह्मचर्य है।
इसका अर्थ केवल अविवाहित जीवन नहीं, बल्कि विचारों और आचरण में शुद्धता बनाए रखना है।
5. अपरिग्रह
अनावश्यक संग्रह न करना और लोभ से दूर रहना अपरिग्रह है।
अधिक संग्रह मानसिक अशांति का कारण बनता है, जबकि संतोष और सादगी मन को स्थिर बनाते हैं।
नियम (Niyama)
योगसूत्र (2.32) में नियम का वर्णन इस प्रकार है:
“शौचसंतोषतपः स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः”
अर्थात — शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान ये पाँच नियम हैं।
नियम व्यक्तिगत अनुशासन (Personal Discipline) और आत्मशुद्धि से संबंधित हैं। ये व्यक्ति के आंतरिक विकास के लिए आवश्यक हैं।
पाँच नियम (विस्तार सहित)
1. शौच
शरीर और मन की पवित्रता को शौच कहते हैं।
बाह्य शौच में शारीरिक स्वच्छता आती है, जबकि आंतरिक शौच में नकारात्मक विचारों से मुक्त रहना शामिल है।
2. संतोष
परिस्थितियों में संतुष्ट रहना और अनावश्यक इच्छाओं से मुक्त होना संतोष है।
संतोष मन को स्थिर और प्रसन्न रखता है, जिससे ध्यान में एकाग्रता बढ़ती है।
3. तप
अनुशासन, संयम और आत्मसंयम के द्वारा स्वयं को परिष्कृत करना तप है।
नियमित अभ्यास, कठिनाइयों में धैर्य और लक्ष्य के प्रति समर्पण तप का भाग हैं।
4. स्वाध्याय
शास्त्रों का अध्ययन और आत्मचिंतन स्वाध्याय कहलाता है।
स्वाध्याय से व्यक्ति अपने दोषों और गुणों को पहचानकर आत्मविकास की ओर बढ़ता है।
5. ईश्वर-प्रणिधान
अपने कर्मों को ईश्वर को समर्पित करना और अहंकार का त्याग करना ईश्वर-प्रणिधान है।
यह भक्ति और समर्पण की भावना विकसित करता है तथा मन को शांति प्रदान करता है।
आसन (Asana)
योगसूत्र (2.46) में आसन की परिभाषा दी गई है:
“स्थिरसुखमासनम्”
अर्थात — जो आसन स्थिर और सुखपूर्वक किया जाए वही आसन है।
यह शारीरिक स्वास्थ्य देने वाला अभ्यास है। पतंजलि के अनुसार आसन का उद्देश्य शरीर को ध्यान के लिए स्वस्थ और स्थिर बनाना है। आसन करते समय बल प्रयोग नहीं करना चाहिए और अपनी शारीरिक क्षमता का ध्यान रखना चाहिए।
आसन के विषय में विस्तार से जानने के लिए पढ़ें -- “सरल योगासन क्या है?”
कुछ प्रमुख आसन:
- सूर्य नमस्कार
- वज्रासन
- उष्ट्रासन
- शशांकासन
- अर्धमत्स्येन्द्रासन
- सर्वांगासन
प्राणायाम
प्राणायाम का अर्थ है — प्राण (जीवन ऊर्जा) को आयाम देना।
योगसूत्र (2.49) में प्राणायाम को परिभाषित किया गया है:
“तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः”
अर्थ — आसन सिद्ध होने के बाद श्वास-प्रश्वास की गति को नियंत्रित करना प्राणायाम है।
प्राणायाम की सरल परिभाषा: सही विधि से श्वास लेना, रोकना और छोड़ना प्राणायाम है।
प्राणायाम की अवस्थाएँ
- श्वास (अंदर लेना)
- प्रश्वास (बाहर छोड़ना)
- गति-विच्छेद (कुम्भक)
प्रमुख प्राणायाम
- कपालभाति
- अनुलोम-विलोम
- भस्त्रिका
- नाड़ी शोधन
प्राणायाम योग का एक श्वसन अभ्यास है। यह अभ्यास सभी व्यक्तियों को अपने श्वास की क्षमता अनुसार करना चाहिए।
अधिक जानकारी के लिए देखें --- प्राणायाम की सही विधि।
प्रत्याहार
प्रत्याहार का वर्णन योगसूत्र-2.54 में किया गया है:
“स्वविषयासंप्रयोगे चित्तस्वरूपानुकार इवेन्द्रियाणां प्रत्याहारः”
अर्थ — जब इन्द्रियाँ अपने विषयों से हटकर चित्त के स्वरूप में स्थित हो जाती हैं, तो वह प्रत्याहार है।
सरल शब्दों में — इन्द्रियों को अंतर्मुखी करना ही प्रत्याहार है।
धारणा
योगसूत्र 3.1 में धारणा के विषय में कहा गया है:
“देशबन्धश्चित्तस्य धारणा”
अर्थ — चित्त को किसी एक स्थान पर स्थिर करना ही धारणा है।
ध्यान
ध्यान या मेडिटेशन का अर्थ योगसूत्र 3.2 में बताया गया है:
“तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्”
अर्थ — जिस स्थान पर चित्त को स्थिर किया गया है, वहाँ निरंतर एकाग्र बने रहना ध्यान है।
समाधि
योगसूत्र 3.3 में समाधि को परिभाषित किया गया है:
“तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः”
अर्थ — जब साधक अपने स्वरूप को भूलकर ध्येय में लीन हो जाता है, वही समाधि है।
यह योग की पूर्ण अवस्था है, जहाँ चित्तवृत्तियाँ पूर्णतः निरोध हो जाती हैं।
अष्टांग योग सरल शब्दों में
अष्टांग योग को सरल रूप में इस प्रकार समझा जा सकता है:
- सही और संतुलित आहार
- अनुशासित जीवन
- सामाजिक और व्यक्तिगत नैतिकता
- नियमित योगाभ्यास
- योगाभ्यास का सही क्रम --- पहले आसन, फिर प्राणायाम और उसके बाद ध्यान
योग कौन कर सकता है?
योग एक सार्वभौमिक साधना पद्धति है। सभी युवा-वृद्ध, स्त्री-पुरुष अपनी शारीरिक क्षमता और स्वास्थ्य अवस्था के अनुसार योग का अभ्यास कर सकते हैं। योग किसी विशेष धर्म, जाति या संप्रदाय तक सीमित नहीं है।
सामान्य रूप से स्वस्थ व्यक्ति नियमित और संतुलित योगाभ्यास कर सकते हैं। प्रारंभ में सरल आसनों और हल्के प्राणायाम से शुरुआत करना उचित होता है।
योगाभ्यास में सावधानियाँ
योग करते समय निम्न बातों का ध्यान रखना आवश्यक है—
- अपनी शारीरिक अवस्था और क्षमता के अनुसार अभ्यास करें।
- अस्वस्थ होने पर या बुखार आदि की स्थिति में योग न करें।
- शरीर की स्थिति के अनुसार ही आसन और प्राणायाम चुनें।
- सरल और सहज अभ्यास से शुरुआत करें।
- किसी भी क्रिया को बलपूर्वक न करें।
- सही विधि और संयम के साथ किया गया योगाभ्यास ही लाभदायक होता है।
योग किन परिस्थितियों में नहीं करना चाहिए?
कुछ विशेष परिस्थितियों में सावधानी आवश्यक है—
- गंभीर रोग की अवस्था में योगाभ्यास रोक देना चाहिए।
- हृदय रोग, अस्थमा या उच्च रक्तचाप (High BP) से पीड़ित व्यक्ति चिकित्सक की सलाह से ही अभ्यास करें।
- हाल ही में सर्जरी हुई हो तो पूर्ण स्वस्थ होने के बाद ही योग प्रारंभ करें।
- गर्भवती महिलाएँ विशेषज्ञ मार्गदर्शन में ही योग करें।
- सुरक्षित और संतुलित अभ्यास ही दीर्घकालीन लाभ देता है।
सारांश
आज पूरा विश्व महर्षि पतंजलि द्वारा प्रतिपादित योग पद्धति को अपना रहा है। योगसूत्र उनकी महान रचना है, जिसमें चित्तवृत्ति-निरोध और अष्टांग योग का विस्तार से वर्णन मिलता है। आसन, प्राणायाम और ध्यान इसके महत्वपूर्ण अंग हैं, परंतु संपूर्ण योग अष्टांग मार्ग का समन्वित अभ्यास है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. पतंजलि योग क्या है?
महर्षि पतंजलि द्वारा प्रतिपादित शास्त्रीय योग पद्धति को पतंजलि योग कहा जाता है। यह योगसूत्र पर आधारित है, जिसमें योग को सूत्रों के माध्यम से व्यवस्थित और सरल रूप में प्रस्तुत किया गया है।
2. योगश्चित्तवृत्ति निरोधः का क्या अर्थ है?
योगसूत्र के अनुसार “योगश्चित्तवृत्ति निरोधः” का अर्थ है — मन की चंचल वृत्तियों का नियंत्रण ही योग है। चित्त की पाँच प्रकार की वृत्तियाँ होती हैं, जिन्हें क्लिष्ट और अक्लिष्ट रूप में विभाजित किया गया है।
3. अष्टांग योग के आठ अंग कौन-कौन से हैं?
अष्टांग योग के आठ अंग हैं — यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। इन्हें मिलाकर संपूर्ण योग मार्ग कहा जाता है।
4. पतंजलि को योग का जनक क्यों कहा जाता है?
महर्षि पतंजलि से पहले योग का ज्ञान बिखरे और कठिन रूप में उपलब्ध था। उन्होंने योग को सूत्रबद्ध और व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया, इसलिए उन्हें योग का जनक माना जाता है।
5. क्या योग केवल आसन और प्राणायाम है?
नहीं, योग केवल आसन और प्राणायाम तक सीमित नहीं है। यह एक संपूर्ण जीवन-पद्धति है, जिसमें नैतिकता, अनुशासन, ध्यान और आत्मविकास शामिल हैं।
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