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योगाभ्यास में अनुलोम-विलोम प्राणायाम और नाड़ी शोधन प्राणायाम महत्वपूर्ण अभ्यास हैं। इन दोनों की विधि में काफी कुछ समानताएँ हैं, इसलिए इन्हें अक्सर एक समान मान लिया जाता है। लेकिन वास्तव में इन दोनों में काफी बड़ा अंतर है। दोनों की विधि और प्रभाव में अंतर होता है। प्रस्तुत लेख में इसी विषय को विस्तार से बताया गया है।

विषय सूची

1. अनुलोम-विलोम और नाड़ी शोधन
2. अनुलोम-विलोम और नाड़ी शोधन प्राणायाम की विधि
  • विधि – अनुलोम-विलोम
  • विधि – नाड़ी शोधन
  • नाड़ी शोधन अभ्यास में सावधानी
3. अनुलोम-विलोम और नाड़ी शोधन में समानता
4. अनुलोम-विलोम और नाड़ी शोधन में अंतर
  • कुम्भक
  • प्रभाव
  • वर्जित
5. सारांश
6. FAQ
7. Disclaimer

अनुलोम-विलोम और नाड़ी शोधन

दोनों प्राणायाम एक समान मुद्रा में किए जाते हैं। दोनो का आरम्भ व समापन चंद्र नाड़ी (बाईं नासिका) से किया जाता है। दोनों क्रियाओं में बाईं नासिका (चंद्र नाड़ी) से लंबा-गहरा श्वास भरा जाता है और दाईं नासिका (सूर्य नाड़ी) से श्वास छोड़ा जाता है। फिर दाईं नासिका से श्वास का पूरक करके बाईं नासिका से रेचक किया जाता है।

एक समान दिखाई देने वाली दोनों क्रियाओं में कुछ महत्वपूर्ण अंतर भी हैं। इन दोनों का अंतर जानने से पहले इनकी सही विधि और समानता जानना जरूरी है।

दोनों प्राणायाम क्रियाओं की विधि

प्राणायाम में अनुलोम-विलोम और नाड़ी शोधन दोनों लाभकारी अभ्यास हैं। दोनों के अभ्यास की मुद्रा एक समान है। आइए आगे यह जानते हैं कि इन दोनों की सही विधि क्या है?

अनुलोम विलोम और नाड़ी शोधन प्राणायाम का अभ्यास
अनुलोम विलोम और नाड़ी शोधन प्राणायाम में अंतर

विधि – अनुलोम-विलोम

  • पद्मासन या सुखासन की स्थिति में बैठें।
  • पीठ व गर्दन को सीधा रखें।
  • आँखें कोमलता से बंद करें।
  • बायाँ हाथ बाएँ घुटने पर ज्ञान मुद्रा में रखें।
  • दाएँ हाथ से प्राणायाम मुद्रा बनाएँ (अंगूठे के साथ वाली दो उँगलियाँ मोड़ें)।
  • दायाँ हाथ नासिका के पास इस प्रकार रखें कि अंगूठा नासिका के दाईं तरफ और तीसरी उँगली नासिका के बाईं तरफ रहे।
  • अंगूठे से दाईं नासिका बंद करें।
  • बाईं नासिका से धीरे-धीरे लंबा-गहरा श्वास भरें।
  • पूरा श्वास भरने के बाद बाईं नासिका बंद करें।
  • दाईं नासिका से श्वास धीरे-धीरे खाली करें।
  • पूरी तरह श्वास खाली होने के बाद दाईं नासिका से धीरे-धीरे श्वास भरें।
  • पूरी तरह श्वास भरने के बाद दाईं नासिका बंद कर लें।
  • धीरे-धीरे बाईं नासिका से श्वास खाली करें।
  • यह एक आवृत्ति (एक राउंड) पूरी हुई।
  • सुविधानुसार चार-पाँच आवृत्तियां करें।

इस विधि का सार सरल शब्दों में :

इस क्रिया में धीरे-धीरे बाईं नासिका से लंबा-गहरा श्वास भरे और दाईं तरफ से श्वास धीरे-धीरे खाली करें। फिर दांई तरफ से धीरे-धीरे श्वास भरकर बाईं तरफ से खाली करें।

विधि – नाड़ी शोधन

  • नाड़ी शोधन प्राणायाम के लिए पद्मासन या सुखासन में बैठें।
  • पीठ व गर्दन को सीधा रखें।
  • आँखें कोमलता से बंद करें।
  • बायाँ हाथ बाएँ घुटने पर ज्ञान मुद्रा में रखें।
  • दाएँ हाथ से प्राणायाम मुद्रा बनाएँ।
  • दाएँ हाथ को नासिका के पास इस प्रकार रखें कि अंगूठा नासिका के दाईं तरफ और तीसरी उँगली नासिका के बाईं तरफ रहे।
  • अंगूठे से दाईं नासिका बंद करें।
  • बाईं नासिका से धीरे-धीरे श्वास भरें।
  • पूरा श्वास भरने के बाद बाईं नासिका को भी बंद करें और भरे हुए श्वास में रुकें (आन्तरिक कुम्भक)।
  • यथा शक्ति आन्तरिक कुम्भक में रुकने के बाद दाईं नासिका से श्वास खाली करें।
  • दाईं नासिका से श्वास पूरी तरह खाली करने के बाद खाली श्वास में रुककर बाह्य कुम्भक लगाएँ।
  • यथा शक्ति खाली श्वास में रुकने के बाद धीरे-धीरे दाईं तरफ से श्वास भरें।
  • पूरी तरह श्वास भरने के बाद दाईं नासिका बंद करके यथा शक्ति आन्तरिक कुम्भक में रुकें।
  • कुछ देर भरे श्वास में रुकने के बाद धीरे-धीरे बाईं तरफ से श्वास को खाली करें।
  • यह एक आवृत्ति (एक राउंड) हुई। इस प्रकार क्षमता के अनुसार 3-4 आवृत्तियाँ करें।

इस विधि का सार सरल शब्दों में :

इस क्रिया में बाईं तरफ से धीरे-धीरे श्वास भरें, यथा शक्ति श्वास रोकें और धीरे-धीरे दूसरी ओर से श्वास खाली कर दें। कुछ देर खाली श्वास में रुकें। उसी प्रकार धीरे-धीरे दाईं तरफ से श्वास भरके यथा शक्ति रुकें और बाईं तरफ से श्वास खाली करें।

आरम्भ में नए व्यक्ति अपने श्वास को क्षमता के अनुसार रोकें। अभ्यास बढने के बाद यह क्रिया अनुपातिक क्रम से करें।

(आनुपातिक क्रम: श्वास भरने में जितना समय लगता है उस से लगभग दुगना समय कुम्भक में लगाएं और उतना ही समय श्वास छोड़ने में लगाएं।)

नाड़ी शोधन अभ्यास में सावधानी

  • यह अभ्यास केवल योग के नियमित अभ्यासियों के लिए है।
  • नए व्यक्ति आरम्भ में कुम्भक अपने श्वास की क्षमता के अनुसार लगाएँ।
  • हृदय रोगी, श्वास रोगी इस प्राणायाम को न करें।

दोनों में समानता

  • दोनों की मुद्रा एक समान है।
  • दोनों का आरम्भ और समापन बाईं नासिका (चंद्र नाड़ी) से किया जाता है।
  • दोनों ही लाभकारी प्राणायाम हैं।
  • दोनों प्राणायाम Lungs और श्वसनतंत्र को सुदृढ करते हैं।

दोनों में अंतर

एक जैसी लगने वाली दोनों क्रियाओं में अंतर इस प्रकार हैं :

1. कुम्भक 

दोनों क्रियाओं में मुख्य अंतर कुम्भक का है। श्वास को अन्दर या बाहर रोकने की क्रिया को कुम्भक कहते हैं।

  • अनुलोम-विलोम : इस क्रिया मे कुम्भक नहीं लगाया जाता है। इस क्रिया में केवल एक नासिका से लंबा-गहरा श्वास भरना और दूसरी नासिका से छोड़ना होता है।
  • नाड़ी शोधन : इस क्रिया में कुम्भक लगाया जाता है। नए व्यक्ति आरम्भ में अपने श्वासों की क्षमता के अनुसार कुम्भक लगाएँ। अभ्यास बढ़ने के बाद अनुपातिक अभ्यास करें। (अनुपातिक क्रम--यदि श्वास भरने मे  5 सेकंड लगते हैं, तो श्वास रोकने मे 10 सेकंड लगें और खाली करने मे भी 10 सेकंड लगें। यह 1:2:2 का अनुपात है।)

2. प्रभाव 

दोनों क्रियाओं के प्रभाव में भी अंतर है।

  • अनुलोम-विलोम : इस अभ्यास से हमारी चंद्र नाड़ी, सूर्य नाड़ी तथा मस्तिष्क विशेष प्रभावित होते हैं। कपालभाति करने के बाद अनुलोम-विलोम करना विशेष लाभकारी होता है।
  • नाड़ी शोधन : इस प्राणायाम के अभ्यास से 72,000 प्राणिक नाड़ियों को शोधन होता है। प्राणिक नाड़ियों में आने वाले अवरोधों (रुकावटों) को इस प्राणायाम से ठीक किया जा सकता है। नाड़ियों के शुद्धिकरण के लिए यह एक उत्तम प्राणायाम है।

 3. वर्जित 

  • अनुलोम-विलोम : यह एक सरल प्राणायाम है। इस क्रिया को सभी व्यक्ति सरलता से कर सकते हैं।
  • नाड़ी शोधन : यह प्राणायाम कुछ व्यक्तियों  के लिए वर्जित होता है। श्वास रोगी तथा हृदय रोगी व्यक्तियों को यह क्रिया नहीं करनी चाहिए। इस प्राणायाम को केवल ऐसे व्यक्ति ही करें जिनके श्वासों की स्थिति ठीक है।

सारांश

दोनों प्राणायाम क्रियाओं में समानता दिखाई देती है, लेकिन दोनों में काफी बड़ा अंतर है। अनुलोम विलोम और नाड़ी शोधन प्राणायाम में मुख्य कुम्भक का है। दोनों के प्रभाव में भी अंतर है।

प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

अनुलोम विलोम और नाड़ी शोधन प्राणायाम में क्या अंतर है?

अनुलोम-विलोम और नाड़ी शोधन प्राणायाम देखने में समान लगते हैं, लेकिन इनके अभ्यास में मुख्य अंतर कुम्भक का होता है। अनुलोम-विलोम में श्वास को रोका नहीं जाता, जबकि नाड़ी शोधन में श्वास को कुछ समय के लिए रोकने की क्रिया (कुम्भक) की जाती है।

क्या अनुलोम विलोम और नाड़ी शोधन प्राणायाम एक ही हैं?

नहीं, अनुलोम-विलोम और नाड़ी शोधन प्राणायाम अलग-अलग अभ्यास हैं। इनकी विधि में कुछ समानताएँ होती हैं, लेकिन नाड़ी शोधन में कुम्भक का अभ्यास किया जाता है, जबकि अनुलोम-विलोम में केवल श्वास का नियंत्रित आदान-प्रदान किया जाता है।

क्या नाड़ी शोधन प्राणायाम सभी लोग कर सकते हैं?

नाड़ी शोधन प्राणायाम अपेक्षाकृत उन्नत अभ्यास माना जाता है। नए अभ्यासी इसे किसी योग विशेषज्ञ के मार्गदर्शन में करें। हृदय रोग या श्वास संबंधी रोग से पीड़ित व्यक्तियों को यह प्राणायाम नहीं करना चाहिए।

अनुलोम विलोम प्राणायाम कब करना चाहिए?

अनुलोम-विलोम प्राणायाम प्रातःकाल खाली पेट करना सबसे लाभकारी माना जाता है। इसे कपालभाति प्राणायाम के बाद करना भी उपयोगी माना जाता है, क्योंकि इससे श्वास संतुलन और मानसिक शांति प्राप्त होती है।

नाड़ी शोधन प्राणायाम का मुख्य उद्देश्य क्या है?

नाड़ी शोधन प्राणायाम का मुख्य उद्देश्य शरीर की प्राणिक नाड़ियों का शुद्धिकरण करना है। यह प्राणायाम श्वास को नियंत्रित करके शरीर और मन के संतुलन को बनाए रखने में सहायता करता है।

Disclaimer

यह आर्टिकल किसी प्रकार की चिकित्सा के लिए नहीं है। यह प्राणायाम अभ्यास की एक सामान्य जानकारी है। आर्टिकल में बताए गए अभ्यास केवल स्वस्थ व्यक्तियों के लिए हैं। नए अभ्यासी किसी कुशल निर्देशन में अभ्यास करें।

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