ये चित्तवृत्तियाँ क्या हैं, जो निरोध करने योग्य कही गई हैं? ये कितने प्रकार की होती हैं? क्लिष्ट तथा अक्लिष्ट चित्तवृत्तियों में क्या अंतर है?
योगदर्शन के अनुसार चित्त की पाँच प्रमुख वृत्तियाँ — प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति — क्लिष्ट तथा अक्लिष्ट दो रूपों में प्रकट होती हैं। प्रस्तुत लेख में इन सभी चित्तवृत्तियों का विस्तार से विश्लेषण किया जाएगा।
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| योगसूत्र के अनुसार चित्त की पाँच वृत्तियाँ — प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति — क्लिष्ट और अक्लिष्ट रूपों में प्रकट होती हैं। |
विषय सूची
- प्रत्यक्ष प्रमाण
- अनुमान प्रमाण
- आगम प्रमाण
क्लिष्ट और अक्लिष्ट चित्तवृत्तियाँ
क्लिष्ट और अक्लिष्ट चित्तवृत्तियों को समझने से पहले यह जानना आवश्यक है कि चित्तवृत्तियाँ क्या होती हैं। योगदर्शन के अनुसार चित्त में उत्पन्न होने वाली विभिन्न मानसिक प्रवृत्तियों को ही चित्तवृत्ति कहा जाता है। ये वृत्तियाँ मन की गतिविधियों को प्रकट करती हैं और साधक के आचरण तथा अनुभव को प्रभावित करती हैं।
योगसूत्र में इन वृत्तियों को दो प्रकार का बताया गया है — क्लिष्ट और अक्लिष्ट। इनमें से कुछ वृत्तियाँ क्लेश उत्पन्न करने वाली होती हैं, जबकि कुछ साधक को ज्ञान और वैराग्य की ओर ले जाने वाली होती हैं। इसलिए योगमार्ग में इन वृत्तियों को समझना और उनका नियंत्रण करना अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है।
चित्त की पाँच वृत्तियाँ (योगसूत्र के अनुसार)
योगदर्शन में चित्त की पाँच प्रमुख वृत्तियाँ बताई गई हैं। योगसूत्र के समाधि पाद (प्रथम अध्याय) में महर्षि पतंजलि कहते हैं —
वृत्तयः पञ्चतय्यः क्लिष्टाक्लिष्टाः ।। 1.5 ।।
अर्थात् चित्त की वृत्तियाँ पाँच प्रकार की होती हैं और इन सभी के दो भेद होते हैं — क्लिष्ट तथा अक्लिष्ट।
क्लिष्ट : — वे वृत्तियाँ जो क्लेश (दुःख) उत्पन्न करती हैं, क्लिष्ट वृत्तियाँ कहलाती हैं। ये अज्ञान, आसक्ति और अवैराग्य को बढ़ाती हैं तथा योगमार्ग में बाधा उत्पन्न करती हैं। सामान्यतः ये तमोगुण या रजोगुण से प्रभावित होती हैं।
अक्लिष्ट : — वे वृत्तियाँ जो ज्ञान, विवेक और वैराग्य की ओर ले जाती हैं तथा साधक के चित्त को शुद्ध करती हैं, अक्लिष्ट वृत्तियाँ कहलाती हैं। ये सामान्यतः सत्त्वगुण प्रधान होती हैं और योग साधना में सहायक होती हैं।
चित्तवृत्ति निरोध : — योगदर्शन के अनुसार चित्तवृत्तियों का निरोध ही योग का मुख्य लक्ष्य है। जब साधक अपने चित्त में उत्पन्न होने वाली वृत्तियों को पहचानता है और उन पर नियंत्रण प्राप्त करता है, तब चित्त की स्थिरता विकसित होती है। इसलिए योग साधना में चित्तवृत्तियों को समझना, उनका निरीक्षण करना और धीरे-धीरे उनका निरोध करना अत्यंत आवश्यक माना गया है।
चित्तवृत्ति निरोध का साधन : — योगसूत्र में चित्तवृत्तियों के निरोध का साधन अष्टांग योग बताया गया है। अष्टांग योग के आठ अंगों के अभ्यास से साधक धीरे-धीरे चित्त की अशुद्धियों को दूर करता है और मन को स्थिर बनाता है। (देखें :- अष्टाँगयोग क्या है?)
पाँच वृत्तियाँ : — योगसूत्र में चित्त की वृत्तियों की संख्या पाँच बताई गई है। समाधि पाद के छठे सूत्र में महर्षि पतंजलि कहते हैं —
प्रमाण विपर्यय विकल्प निद्रा स्मृतयः ।। 1.6 ।।
अर्थात् प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति — ये पाँच प्रकार की चित्तवृत्तियाँ हैं।
इन सभी वृत्तियों के दो भेद बताए गए हैं — क्लिष्ट और अक्लिष्ट। अर्थात् ये पाँचों चित्तवृत्तियाँ परिस्थितियों के अनुसार क्लिष्ट (दुःखदायी) या अक्लिष्ट (सहायक) दोनों रूपों में प्रकट हो सकती हैं। अब इन पाँचों वृत्तियों को क्रम से समझते हैं।
1. प्रमाण वृत्ति
प्रमाण शब्द 'प्रमा' से बना है। इसका अर्थ है सत्य का ज्ञान। जिस साधन से या उपाय से यथार्थ का ज्ञान होता है वह प्रमाण है। यह इन्द्रियों द्वारा प्रत्यक्ष अनुभव करके, अनुमान से या शब्द द्वारा (पढ़ कर, सुन कर) अनुभव किया जाता है। यह संशयरहित यथार्थ ज्ञान होता है।
प्रत्यक्ष प्रमाण
'प्रत्यक्ष' का अर्थ है आँखों के सामने प्रत्यक्ष रूप से अनुभव किया गया ज्ञान। जब किसी घटना या स्थिति को इन्द्रियों के माध्यम से सीधे अनुभव किया जाता है, तो उसे प्रत्यक्ष प्रमाण कहा जाता है। जैसे अपनी आँखों से किसी घटना या दुर्घटना को देखना, किसी वस्तु को स्पर्श करके अनुभव करना या स्वाद से उसका ज्ञान प्राप्त करना — ये सब प्रत्यक्ष प्रमाण के उदाहरण हैं।
अनुमान प्रमाण
जब किसी स्थिति का ज्ञान अनुमान के आधार पर प्राप्त होता है, तो उसे अनुमान प्रमाण कहते हैं।
उदाहरण के लिए यदि हम किसी स्थान पर भीड़ देखते हैं, तो अनुमान लगाते हैं कि वहाँ कोई घटना या दुर्घटना हुई है। इसी प्रकार धुआँ देख कर आग लगने का, या जमीन को गीला देख कर वर्षा होने का अनुमान लगाया जाता है।
आगम प्रमाण
इसे शब्द प्रमाण भी कहा जाता है। यह ऐसा ज्ञान है जो न तो प्रत्यक्ष अनुभव से प्राप्त होता है और न ही अनुमान से, बल्कि दूसरों के कथन या ग्रंथों को पढ़कर प्राप्त होता है।
उदाहरण के लिए यदि कोई व्यक्ति बताए कि किसी दूसरे शहर में इतनी वर्षा हुई कि वहाँ बाढ़ आ गई, तो हमने उस घटना को न देखा है और न ही उसका अनुमान लगाया है। हम केवल बताने वाले के शब्दों पर विश्वास करते हैं। यह आगम प्रमाण का उदाहरण है।
इसी प्रकार यदि कोई ईश्वर के विषय मे वर्णन करता है या हम ग्रंथों में उसके बारे में पढ़ते हैं, तो यद्यपि हमने ईश्वर को प्रत्यक्ष नहीं देखा है, फिर भी बताए गए शब्दों के आधार पर चित्त में उसका एक स्वरूप बन जाता है।
2. विपर्यय वृत्ति
विपर्यय वृत्ति के विषय में महर्षि पतंजलि योगसूत्र में परिभाषा देते हैं —
विपर्ययो मिथ्याज्ञानम् अतद्रूपप्रतिष्ठम् ।। 1.8 ।।
अर्थात् विपर्यय वृत्ति मिथ्या ज्ञान है। ऐसा ज्ञान जो वास्तविक स्वरूप के विपरीत हो और जिसे बाद में प्रमाण द्वारा खण्डित किया जा सके, विपर्यय वृत्ति कहलाता है।
दूसरे शब्दों में, किसी वस्तु को उसके वास्तविक स्वरूप से भिन्न रूप में समझ लेना ही विपर्यय वृत्ति है।
विपर्यय का अर्थ है विपरीत या गलत ज्ञान। यह एक प्रकार की भ्रम की स्थिति होती है।
उदाहरण के लिए अंधेरे में रस्सी को साँप समझकर भयभीत हो जाना विपर्यय का प्रसिद्ध उदाहरण है। इसी प्रकार इन्द्रियजनित सुखों को वास्तविक और स्थायी सुख मान लेना, नित्य को अनित्य तथा अनित्य को नित्य समझ लेना भी विपर्यय वृत्ति के उदाहरण हैं।
3. विकल्प वृत्ति
विकल्प वृत्ति शब्दों की कल्पना पर आधारित होती है, जबकि वास्तव में उस वस्तु का अस्तित्व नहीं है। जैसे कि कोई कहे "सींगों वाला मनुष्य", तो यह सुनकर चित्त में सींगों वाले मनुष्य की आकृति तो बन जाती है, लेकिन साथ ही यह ज्ञान भी रहता है कि ऐसा मनुष्य वास्तव में संभव नहीं है।
विकल्प वृत्ति के विषय में योगसूत्र में कहा गया है —
"शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्प: ।।1.9।।
अर्थात् ऐसा ज्ञान जो केवल शब्दों पर आधारित हो और जिसमें उस वस्तु का वास्तविक अस्तित्व न हो, उसे विकल्प वृत्ति कहा जाता है।
4. निद्रा वृत्ति
अविद्या के कारण अज्ञान के अंधकार में स्थित रहने की अवस्था को निद्रा वृत्ति कहा गया है। सुषुप्त अवस्था को भी निद्रा की अवस्था माना जाता है।
योगसूत्र के दसवें सूत्र में इस वृत्ति को परिभाषित किया गया है —
अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्रा ।। 1.10 ।।
अर्थात् अभाव के ज्ञान का आश्रय लेने वाली वृत्ति निद्रा है। दूसरे शब्दों में, जब चित्त किसी विषय का अनुभव नहीं करता और शून्यता या अभाव की अवस्था में रहता है, तब वह निद्रा वृत्ति होती है।
5. स्मृति वृत्ति
स्मृति के विषय में महर्षि पतंजलि योगसूत्र में लिखते हैं —
"अनुभूतविषयासंप्रमोष: स्मृति ।। 1.11 ।।"
अर्थात् पहले अनुभव किए गए विषय का पुनः स्मरण होना स्मृति कहलाता है।
दूसरे शब्दों में, पहले बताई गई अन्य वृत्तियों — जैसे प्रमाण, विपर्यय, विकल्प या निद्रा — के माध्यम से प्राप्त अनुभव जब बाद में पुन: चित्त में प्रकट होता है, तो उसे स्मृति वृत्ति कहा जाता है।
सारांश
योगदर्शन के अनुसार चित्त में उत्पन्न होने वाली मानसिक गतिविधियों को चित्तवृत्ति कहा जाता है। योगसूत्र में महर्षि Patanjali ने चित्त की पाँच प्रमुख वृत्तियाँ बताई हैं — प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति। इन सभी वृत्तियों के दो भेद होते हैं — क्लिष्ट और अक्लिष्ट।
क्लिष्ट वृत्तियाँ अज्ञान, आसक्ति और क्लेश को बढ़ाकर योगमार्ग में बाधा उत्पन्न करती हैं, जबकि अक्लिष्ट वृत्तियाँ ज्ञान, विवेक और वैराग्य की ओर ले जाकर साधक के चित्त को शुद्ध करती हैं।
योग का उद्देश्य इन चित्तवृत्तियों को समझना, नियंत्रित करना और अंततः उनका निरोध करना है। जब साधक इन वृत्तियों पर नियंत्रण प्राप्त कर लेता है, तब चित्त की शुद्धि और योग साधना में वास्तविक प्रगति संभव होती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. क्लिष्ट और अक्लिष्ट चित्तवृत्तियाँ क्या हैं?
योगदर्शन के अनुसार चित्त में उत्पन्न होने वाली मानसिक गतिविधियों को चित्तवृत्ति कहा जाता है। ये वृत्तियाँ दो प्रकार की होती हैं — क्लिष्ट और अक्लिष्ट। क्लिष्ट वृत्तियाँ क्लेश, अज्ञान और आसक्ति को बढ़ाती हैं, जबकि अक्लिष्ट वृत्तियाँ ज्ञान, विवेक और वैराग्य की ओर ले जाती हैं।
2. योगसूत्र के अनुसार चित्त की कितनी वृत्तियाँ होती हैं?
महर्षि पतंजलि के योगसूत्र के अनुसार चित्त की पाँच प्रमुख वृत्तियाँ होती हैं —
- प्रमाण
- विपर्यय
- विकल्प
- निद्रा
- स्मृति
ये सभी वृत्तियाँ क्लिष्ट और अक्लिष्ट दोनों प्रकार की हो सकती हैं।
3. क्लिष्ट वृत्तियाँ क्या होती हैं?
वे चित्तवृत्तियाँ जो क्लेश, अज्ञान, आसक्ति और दुख को बढ़ाती हैं, क्लिष्ट वृत्तियाँ कहलाती हैं। ये साधक के मन को अशांत करती हैं और योग साधना में बाधा उत्पन्न करती हैं।
4. अक्लिष्ट वृत्तियाँ क्या होती हैं?
जो चित्तवृत्तियाँ ज्ञान, विवेक और वैराग्य की ओर ले जाती हैं, उन्हें अक्लिष्ट वृत्तियाँ कहा जाता है। ये वृत्तियाँ साधक के चित्त को शुद्ध करती हैं और योग साधना में सहायक होती हैं।
5. चित्तवृत्ति निरोध का क्या अर्थ है?
योगसूत्र में कहा गया है — योगश्चित्तवृत्ति निरोधः।
अर्थात् चित्त की वृत्तियों का नियंत्रण और निरोध करना ही योग है। जब साधक चित्त की वृत्तियों को नियंत्रित कर लेता है, तब मन स्थिर और शांत हो जाता है।
6. चित्तवृत्ति निरोध का साधन क्या है?
महर्षि पतंजलि ने चित्तवृत्ति निरोध का प्रमुख साधन अष्टांग योग बताया है। अष्टांग योग के अभ्यास से साधक धीरे-धीरे चित्त की वृत्तियों को नियंत्रित कर सकता है।
